Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- بَأْسَنَا: हमारा कठोर दंड या यातना।
- تَخْرُصُونَ: झूठ बोलते हो, अटकलें लगाते हो, बिना किसी प्रमाण के बातें गढ़ते हो।
विस्तृत व्याख्या:
यह आयत उन मुशरिकों (बहुदेववादियों) की उस दलील का उत्तर देती है जो वे पैगंबर ﷺ से झगड़ते समय दिया करते थे। जब उन्हें शिर्क और हराम चीज़ों के बारे में समझाया जाता था, तो वे कहते थे: "अगर अल्लाह चाहता, तो हम शिर्क न करते और न ही हमारे बाप-दादा करते, और न ही हम किसी चीज़ को हराम ठहराते।" यानी वे अपने कुकर्मों को अल्लाह की मर्ज़ी पर थोपकर खुद को बेगुनाह साबित करना चाहते थे।
अल्लाह तआला ने उनकी इस बात का जवाब देते हुए फ़रमाया कि यह बहाना कोई नया नहीं है। उनसे पहले की उम्मतों ने भी अपने पैगंबरों से ठीक यही कहा था कि "अगर अल्लाह चाहता तो हम तुम्हें झुठलाते नहीं।" लेकिन यह बहाना उनके काम नहीं आया और आख़िरकार जब उन्होंने हठधर्मी जारी रखी, तो अल्लाह का दंड उन पर आ गया। यानी अल्लाह की मर्ज़ी का हवाला देकर गुनाहों को जायज़ ठहराना किसी के काम नहीं आया।
फिर अल्लाह तआला पैगंबर ﷺ से कहता है कि इनसे पूछो: "क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान या प्रमाण है कि अल्लाह ने तुम्हें शिर्क करने और चीज़ों को हराम ठहराने का हुक्म दिया है? अगर है, तो उसे हमारे सामने पेश करो।" हक़ीक़त यह है कि वे सिर्फ़ अपने अटकलों और ख़्वाहिशों पर चल रहे हैं, और अल्लाह के नाम पर झूठ बोल रहे हैं। उनके पास न कोई इल्म है, न कोई दलील, बल्कि सिर्फ़ झूठ और धोखा है।
शिक्षाएँ और लाभ:
- अल्लाह की मर्ज़ी का गलत इस्तेमाल: अल्लाह की क़ुदरत और मर्ज़ी का यह मतलब नहीं है कि इंसान अपनी गलतियों को अल्लाह पर थोप दे। अल्लाह ने इंसान को इख़्तियार (चुनने की आज़ादी) दी है, और उसे अच्छे और बुरे की पहचान कराके भेजा है। गुनाह करके यह कहना कि "अल्लाह ने ऐसा चाहा था" एक बड़ा धोखा है।
- बहाने कबूल नहीं होते: क़यामत के दिन अल्लाह के सामने यह बहाना पेश नहीं किया जा सकता कि हमें पता ही नहीं था या हमारी क़िस्मत में यही लिखा था। हर इंसान से उसके किए का हिसाब होगा।
- इल्म और दलील की अहमियत: इस्लाम में हर बात इल्म और दलील पर आधारित होनी चाहिए। अटकलों और ख़्वाहिशों पर चलना मना है। अल्लाह ने हलाल-हराम साफ़ तौर पर बयान कर दिया है, उसमें किसी को अपनी मर्ज़ी से तब्दीली का हक़ नहीं।
- पिछली उम्मतों से सबक: जिन लोगों ने पैगंबरों को झुठलाया और अपनी ज़िद पर अड़े रहे, उन पर अल्लाह का दंड आया। यह हमारे लिए चेतावनी है कि हम अपनी ज़िद और हठधर्मी पर न अड़ें, बल्कि सच्चाई को कबूल करें।
- सच्चाई की पहचान: यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई को मानने में देर न करें। जब दलील साफ़ हो जाए, तो उसे कबूल कर लेना चाहिए, वरना अंजाम बुरा होगा।
📜 आयत 146-150 — सूरा अल-अनआम
अनुवाद — अल-अनआम 148
सूरा अल-अनआम आयत 148 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : अनक़रीब मुशरेकीन कहेंगें कि अगर ख़ुदा चाहता तो न हम…सूरा आयत 148/165 — सूरा अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-अनआम सुनें, सूरा अल-अनआम अनुवाद, सूरा अल-अनआम mp3, सूरा अल-अनआम pdf. आयत 146–150. हिंदी अर्थ: اردو.
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Friday, October 2, 2026
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