अल-अनआम · 147/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
فَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل رَّبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ وَاسِعَةٍ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ ۝١٤٧
Fa in kazzabooka faqur Rabbukum zoo rahmatinw waasi`atinw waasi`atinw wa laa yuraddu baasuhoo `anil qawmil mujrimeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) पर अगर वह तुम्हें झुठलाएं तो तुम (जवाब) में कहो कि (अगरचे) तुम्हारा परवरदिगार बड़ी वसीह रहमत वाला है मगर उसका अज़ाब गुनाहगार लोगों से टलता भी नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • बअसुहू (بَأْسُهُ): उसकी यातना, उसका कठोर दंड।
  • मुजरिमीन (الْمُجْرِمِينَ): अपराधी, वे लोग जो पाप और गुनाह कमाते हैं।

व्याख्या:

हे नबी! यदि आपके विरोधी—चाहे वे मुशरिक हों, यहूदी हों या अन्य—आपको झुठलाएँ और आपके द्वारा लाए गए सत्य को स्वीकार न करें, तो आप उनसे कहें: "मेरा रब अत्यंत दयालु है, उसकी रहमत बहुत विस्तृत है।" उसकी रहमत का एक पहलू यह भी है कि वह तुम्हें मोहलत दे रहा है और तुम्हारे कुकर्मों के बावजूद तुम पर तुरंत यातना नहीं भेज रहा। यह उसकी दया और सहनशीलता का प्रमाण है। लेकिन साथ ही यह भी जान लो कि जब उसकी यातना आएगी, तो उसे कोई टालने या वापस करने वाला नहीं होगा। उसका दंड उन लोगों से नहीं टलेगा जो अपराध करते हैं, पाप कमाते हैं और अपने कुकर्मों में लिप्त रहते हैं। यह एक ओर उनके लिए डरावनी चेतावनी है कि वे अपनी मुखालिफत से बाज़ आएँ, और दूसरी ओर उन्हें तौबा और रहमत की ओर बुलाने का ज़रिया भी है।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दावत और पैग़ाम पहुँचाने के दौरान अगर लोग झुठलाएँ, तो निराश न हों और न ही कठोरता से पेश आएँ, बल्कि उन्हें अल्लाह की रहमत की याद दिलाएँ, क्योंकि रहमत की तरफ़ बुलाना दिलों को नरम करता है।
  2. अल्लाह की रहमत असीम है, और उसकी दया का एक रूप यह भी है कि वह गुनाहगारों को फौरन पकड़ नहीं लेता, बल्कि उन्हें तौबा और सुधार का मौका देता है। यह हमें अल्लाह की महान क्षमा और सहनशीलता की ओर ध्यान दिलाता है।
  3. साथ ही, यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की यातना जब आती है, तो उसे कोई रोक नहीं सकता। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपने कर्मों की जाँच करे, गुनाहों से बचे और अल्लाह की रहमत का दामन थामे, क्योंकि रहमत तो सबके लिए है, लेकिन अंजाम अपराधियों के लिए बहुत भयानक हो सकता है।
  4. यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी बातचीत का अंदाज़ नरम और दयालु होना चाहिए, और साथ में सचेत करने वाला भी, ताकि लोग सीधे रास्ते पर आ सकें।


📜 आयत 145-149 — अल-अनआम

145قُل لَّا أَجِدُ فِي مَا أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلَىٰ طَاعِمٍ يَطْعَمُهُ إِلَّا أَن يَكُونَ مَيْتَةً أَوْ دَمًا مَّسْفُوحًا أَوْ لَحْمَ خِنزِيرٍ فَإِنَّهُ رِجْسٌ أَوْ فِسْقًا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ ۚ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(ऐ रसूल) तुम कहो कि मै तो जो (क़ुरान) मेरे पास वही के तौर पर आया है उसमें कोई चीज़ किसी खाने वाले पर जो उसको खाए हराम नहीं पाता मगर जबकि वह मुर्दा या बहता हुआ ख़़ून या सूअर का गोश्त हो तो बेशक ये (चीजे) नापाक और हराम हैं या (वह जानवर) नाफरमानी का बाएस हो कि (वक्ते ़ज़िबहा) ख़ुदा के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो फिर जो शख्स (हर तरह) बेबस हो जाए (और) नाफरमान व सरकश न हो और इस हालत में खाए तो अलबत्ता तुम्हारा परवरदिगार बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
146وَعَلَى الَّذِينَ هَادُوا حَرَّمْنَا كُلَّ ذِي ظُفُرٍ ۖ وَمِنَ الْبَقَرِ وَالْغَنَمِ حَرَّمْنَا عَلَيْهِمْ شُحُومَهُمَا إِلَّا مَا حَمَلَتْ ظُهُورُهُمَا أَوِ الْحَوَايَا أَوْ مَا اخْتَلَطَ بِعَظْمٍ ۚ ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِبَغْيِهِمْ ۖ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ
और हमने यहूदियों पर तमाम नाख़ूनदार जानवर हराम कर दिये थे और गाय और बकरी दोनों की चरबियां भी उन पर हराम कर दी थी मगर जो चरबी उनकी दोनों पीठ या आतों पर लगी हो या हडड्ी से मिली हुई हो (वह हलाल थी) ये हमने उन्हें उनकी सरक़शी की सज़ा दी थी और उसमें तो शक ही नहीं कि हम ज़रूर सच्चे हैं
147فَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل رَّبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ وَاسِعَةٍ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ
(ऐ रसूल) पर अगर वह तुम्हें झुठलाएं तो तुम (जवाब) में कहो कि (अगरचे) तुम्हारा परवरदिगार बड़ी वसीह रहमत वाला है मगर उसका अज़ाब गुनाहगार लोगों से टलता भी नहीं
148سَيَقُولُ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكْنَا وَلَا آبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن شَيْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ حَتَّىٰ ذَاقُوا بَأْسَنَا ۗ قُلْ هَلْ عِندَكُم مِّنْ عِلْمٍ فَتُخْرِجُوهُ لَنَا ۖ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَإِنْ أَنتُمْ إِلَّا تَخْرُصُونَ
अनक़रीब मुशरेकीन कहेंगें कि अगर ख़ुदा चाहता तो न हम लोग शिर्क करते और न हमारे बाप दादा और न हम कोई चीज़ अपने ऊपर हराम करते उसी तरह (बातें बना बना के) जो लोग उनसे पहले हो गुज़रे हैं (पैग़म्बरों को) झुठलाते रहे यहाँ तक कि उन लोगों ने हमारे अज़ाब (के मज़े)े को चख़ा (ऐ रसूल) तुम कहो कि तुम्हारे पास कोई दलील है (अगर है) तो हमारे (दिखाने के) वास्ते उसको निकालो (दलील तो क्या) पेश करोगे तुम लोग तो सिर्फ अपने ख्याल ख़ाम की पैरवी करते हो और सिर्फ अटकल पच्चू बातें करते हो
149قُلْ فَلِلَّهِ الْحُجَّةُ الْبَالِغَةُ ۖ فَلَوْ شَاءَ لَهَدَاكُمْ أَجْمَعِينَ
(ऐ रसूल) तुम कहो कि (अब तुम्हारे पास कोई दलील नहीं है) ख़ुदा तक पहुंचाने वाली दलील ख़ुदा ही के लिए ख़ास है
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अनुवाद — अल-अनआम 147

सूरा अल-अनआम आयत 147 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) पर अगर वह तुम्हें झुठलाएं तो तुम (जवाब)…

सूरा आयत 147/165 — अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अनआम सुनें, अल-अनआम अनुवाद, अल-अनआम mp3, अल-अनआम pdf. आयत 145–149. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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