Wa minhum mai yastami`u ilaika wa ja`alnaa `alaa quloobihim akinnatan ai yafqahoohu wa feee aazaanihim waqraa; wa ai yaraw kulla Aayatil laa yu`minoo bihaa; hattaaa izaa jaaa`oka yujaadiloonaka yaqoolul lazeena kafaroo in haazaa illaaa asaateerul awwaleen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
वह सब ग़ायब हो गयी और बाज़ उनमें के ऐसे भी हैं जो तुम्हारी (बातों की) तरफ कान लगाए रहते हैं और (उनकी हठ धर्मी इस हद को पहुँची है कि गोया हमने ख़ुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं और उनके कानों में बहरापन पैदा कर दिया है कि उसे समझ न सकें और अगर वह सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े भी देखे लें तब भी ईमान न लाएंगें यहाँ तक (हठ धर्मी पहुची) कि जब तुम्हारे पास तुम से उलझे हुए आ निकलते हैं तो कुफ्फ़ार (क़ुरान लेकर) कहा बैठे है (कि भला इसमें रखा ही क्या है) ये तो अगलों की कहानियों के सिवा कुछ भी नहीं
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اور ان میں بعض ایسے ہیں کہ تمہاری (باتوں کی) طرف کان رکھتے ہیں۔ اور ہم نے ان کے دلوں پر تو پردے ڈال دیئے ہیں کہ ان کو سمجھ نہ سکیں اور کانوں میں ثقل پیدا کردیا ہے (کہ سن نہ سکیں) اور اگر یہ تمام نشانیاں بھی دیکھ لیں تب بھی ان پر ایمان نہ لائیں۔ یہاں تک کہ جب تمہارے پاس تم سے بحث کرنے کو آتے ہیں تو جو کافر ہیں کہتے ہیں یہ (قرآن) اور کچھ بھی نہیں صرف پہلے لوگوں کی کہانیاں ہیں
वह सब ग़ायब हो गयी और बाज़ उनमें के ऐसे भी हैं जो तुम्हारी (बातों की) तरफ कान लगाए रहते हैं और (उनकी हठ धर्मी इस हद को पहुँची है कि गोया हमने ख़ुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं और उनके कानों में बहरापन पैदा कर दिया है कि उसे समझ न सकें और अगर वह सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े भी देखे लें तब भी ईमान न लाएंगें यहाँ तक (हठ धर्मी पहुची) कि जब तुम्हारे पास तुम से उलझे हुए आ निकलते हैं तो कुफ्फ़ार (क़ुरान लेकर) कहा बैठे है (कि भला इसमें रखा ही क्या है) ये तो अगलों की कहानियों के सिवा कुछ भी नहीं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
أَكِنَّةً: पर्दे, आवरण (यहाँ: दिलों पर पड़े हुए आवरण)।
يَفْقَهُوهُ: उसे समझें, उसकी गहराई तक पहुँचें।
وَقْرًا: बहरापन, भारीपन (कानों में)।
أَسَاطِيرُ: कहानियाँ, मिथक, बेबुनियाद बातें (जो पुराने लोगों ने लिख दीं)।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ न रसूल! इन मुशरिकों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आपके पास आकर क़ुरआन सुनते हैं, लेकिन यह सुनना उनके लिए किसी काम का नहीं होता। उनके दिलों पर हमने परदे डाल दिए हैं, जिससे वे क़ुरआन की बातों को समझ ही नहीं पाते। यह परदा उनके अपने हठ, अहंकार और सत्य से मुँह मोड़ने की वजह से है। उनके कानों में भी हमने बहरापन और भारीपन डाल दिया है, जिससे वे न तो ठीक से सुनते हैं और न ही सुनकर फ़ायदा उठाते हैं। अगर वे तमाम निशानियाँ और सबूत देख लें, जो आपकी सच्चाई पर गवाही देते हैं, तो भी वे उन पर ईमान नहीं लाएँगे। यहाँ तक कि जब वे आपके पास आते हैं और आपसे झगड़ने लगते हैं, तो ये काफ़िर लोग कहते हैं: "यह (क़ुरआन) तो बस पुराने लोगों की कहानियाँ हैं, जिन्हें नक़ल करके पेश किया जा रहा है।" वे इसे ईश्वरीय वचन नहीं मानते, बल्कि बेबुनियाद किस्से-कहानियाँ समझते हैं।
फ़ायदे (सबक):
यह आयत बताती है कि हिदायत (मार्गदर्शन) पाना सिर्फ़ सुनने या देखने पर निर्भर नहीं है, बल्कि दिल की पाकीज़गी और सच्चाई की तलाश पर निर्भर है। जो लोग हठ और अहंकार में डूबे रहते हैं, उनके लिए सबसे बड़ी निशानियाँ भी बेकार हो जाती हैं।
इससे हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपने दिलों को साफ़ रखना चाहिए और हक़ (सत्य) को कबूल करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। जो दिल इबादत और अच्छाई से जुड़ा होता है, वही क़ुरआन की रौशनी से मुनव्वर होता है।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि क़ुरआन को सिर्फ़ सुनना काफ़ी नहीं, बल्कि उस पर अमल करना और उसे अपनी ज़िंदगी में उतारना ज़रूरी है। जो लोग इसे महज़ कहानियाँ समझते हैं, वे असल में अपनी ही बर्बादी का सामान करते हैं।
आख़िर में, यह आयत हमें अल्लाह के कलाम की अज़मत (महानता) का एहसास दिलाती है कि यह कोई इंसानी किताब नहीं, बल्कि रहमत और हिदायत का खज़ाना है। जो इसे समझकर अमल करता है, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब होता है।
वह सब ग़ायब हो गयी और बाज़ उनमें के ऐसे भी हैं जो तुम्हारी (बातों की) तरफ कान लगाए रहते हैं और (उनकी हठ धर्मी इस हद को पहुँची है कि गोया हमने ख़ुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं और उनके कानों में बहरापन पैदा कर दिया है कि उसे समझ न सकें और अगर वह सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े भी देखे लें तब भी ईमान न लाएंगें यहाँ तक (हठ धर्मी पहुची) कि जब तुम्हारे पास तुम से उलझे हुए आ निकलते हैं तो कुफ्फ़ार (क़ुरान लेकर) कहा बैठे है (कि भला इसमें रखा ही क्या है) ये तो अगलों की कहानियों के सिवा कुछ भी नहीं
और ये लोग (दूसरों को भी) उस के (सुनने से) से रोकते हैं और ख़ुद तो अलग थलग रहते ही हैं और (इन बातों से) बस आप ही अपने को हलाक करते हैं और (अफसोस) समझते नहीं
(ऐ रसूल) अगर तुम उन लोगों को उस वक्त देखते (तो ताज्जुब करते) जब जहन्नुम (के किनारे) पर लाकर खड़े किए जाओगे तो (उसे देखकर) कहेगें ऐ काश हम (दुनिया में) फिर (दुबारा) लौटा भी दिए जाते और अपने परवरदिगार की आयतों को न झुठलाते और हम मोमिनीन से होते (मगर उनकी आरज़ू पूरी न होगी)
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