Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- يَا وَيْلَنَا – हाय हमारी बर्बादी! (विलाप और पछतावे का शब्द)
- طَاغِينَ – हद से बढ़ने वाले, सीमा का उल्लंघन करने वाले, ज़ालिम
विस्तृत तफ़सीर:
जब उन बाग़ वालों ने अपना बाग़ जला हुआ और तबाह देखा, तो पहले तो उन्हें यक़ीन नहीं हुआ और वे कहने लगे कि शायद हम रास्ता भूल गए हैं। लेकिन जब उन्होंने अच्छी तरह पहचान लिया कि यही उनका बाग़ है, तो उनके होश उड़ गए और वे समझ गए कि यह अल्लाह की ओर से सज़ा है। उनमें से जो सबसे अच्छा और समझदार था, उसने उन्हें याद दिलाया कि मैंने तो तुमसे कहा था कि "इंशा अल्लाह" कहा करो, यानी अल्लाह की मर्ज़ी पर भरोसा रखो और अपनी ताक़त पर घमंड मत करो।
फिर जब उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वे होश में आए, तो वे एक-दूसरे को मलामत करने लगे और पछतावे के साथ कहने लगे: "हाय हमारी बर्बादी! बेशक हम हद से बढ़ने वाले थे।"
यानी उन्होंने अपनी ग़लती कबूल की कि हमने ग़रीबों और मिस्कीनों का हक़ रोककर, अल्लाह के हुक्म की ख़िलाफ़वरज़ी करके और अपनी ज़ात पर भरोसा करके हद से तजावुज़ किया। हमने सोचा था कि हम अपनी मेहनत और तदबीर से यह बाग़ पैदा कर सकते हैं, लेकिन हम भूल गए कि असली मालिक तो अल्लाह है और उसकी अता के बिना कुछ भी हासिल नहीं हो सकता।
यह क़बूलिए-ख़ता उनके लिए रहमत का ज़रिया बनी, क्योंकि उन्होंने तौबा की और अल्लाह से उम्मीद की। उन्होंने कहा कि उम्मीद है हमारा रब हमें इससे बेहतर बाग़ अता करेगा, क्योंकि हम अपने रब ही की तरफ़ रुजू करने वाले हैं।
दावती पहलू और सबक:
यह क़िस्सा हमारे लिए बहुत बड़ी नसीहत है। अल्लाह तआला ने इस घटना को क़ुरआन में बयान किया ताकि हम सीखें कि:
- अल्लाह की नेअमतों का शुक्र अदा करना चाहिए और उसकी राह में ख़र्च करना चाहिए। जो लोग नेअमतों को अपनी कमाई समझकर घमंड करते हैं और ग़रीबों का हक़ रोकते हैं, वे अल्लाह के अज़ाब के हक़दार बनते हैं।
- "इंशा अल्लाह" कहने की बरकत – हमें हर काम में अल्लाह की मर्ज़ी को मुक़द्दम रखना चाहिए और अपनी तदबीर पर नाज़ नहीं करना चाहिए। यह अदब हमें अल्लाह के साथ अपने रिश्ते में नम्रता सिखाता है।
- तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है – भले ही इंसान कितनी भी बड़ी ग़लती कर बैठे, अगर वह सच्चे दिल से तौबा करे और अपनी ग़लती कबूले, तो अल्लाह उसे माफ़ कर सकता है और उससे बेहतर अता कर सकता है। यह अल्लाह की रहमत की वसीअत को दिखाता है।
- आख़िरत की सज़ा इस दुनिया की सज़ा से कहीं बड़ी है – अगर हम इस क़िस्से से इबरत हासिल करें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के हुक्म के मुताबिक ढालें, तो हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब होंगे।
अल्लाह हमें अपनी नेअमतों का शुक्र अदा करने, ग़रीबों का हक़ देने और हर मामले में उसकी मर्ज़ी को पेश नज़र रखने की तौफ़ीक़ अता करे। आमीन।
📜 आयत 29-33 — सूरा अल-क़लम
अनुवाद — अल-क़लम 31
सूरा अल-क़लम आयत 31 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (आख़िर) सबने इक़रार किया कि हाए अफसोस बेशक हम ही…सूरा आयत 31/52 — सूरा अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-क़लम सुनें, सूरा अल-क़लम अनुवाद, सूरा अल-क़लम mp3, सूरा अल-क़लम pdf. आयत 29–33. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


