Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ – वे एक-दूसरे की ओर मुखातिब हुए।
- يَتَلَاوَمُونَ – एक-दूसरे को मलामत (उलाहना) करने लगे, एक-दूसरे पर दोषारोपण करने लगे।
तफ़सीर:
जब उन बाग़ वालों ने अपने बाग़ को जला हुआ और तबाह देखा, तो उनकी आँखों के सामने उनकी सारी मेहनत और उम्मीदें मिट्टी में मिल चुकी थीं। उस विनाशकारी दृश्य ने उन्हें झकझोर दिया, और उनकी नींद टूटी। अब वे एक-दूसरे की ओर मुड़े और एक-दूसरे को उलाहना देने लगे। हर एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहा था कि तूने ही यह सलाह दी थी, तूने ही ग़लत फ़ैसला किया। यह वही लोग थे जिन्होंने रात में यह क़सम खाई थी कि सुबह होते ही फ़क़ीरों और मिस्कीनों को बाग़ से कुछ न देंगे, और अल्लाह की इच्छा (इंशा अल्लाह) कहना भूल गए थे। उनकी यह कंजूसी और बुरी नीयत ही उनके लिए अज़ाब का सबब बनी।
यह उलाहना और मलामत उनके दिलों में पैदा हुए पछतावे का इज़हार था। जब इंसान ग़लती करता है और उसका नतीजा सामने आता है, तो वह दूसरों को दोष देता है, लेकिन असल में दोष उसी का होता है। ये लोग भी एक-दूसरे को दोष दे रहे थे, लेकिन उनका दिल जानता था कि असल क़सूरवार वे ख़ुद हैं। उनका यह आपसी उलाहना उनके लिए एक सबक़ बना, और आख़िरकार उन्होंने अपनी ग़लती का इक़रार किया और अल्लाह से तौबा की।
दावती पहलू:
यह क़िस्सा हमारे लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है। यह बताता है कि अल्लाह की दी हुई नेअमतों में कंजूसी करना, और उसके बंदों का हक़ रोकना, कितना बड़ा गुनाह है। अल्लाह तआला ने हमें जो कुछ दिया है, उसमें दूसरों का भी हक़ है। जब हम अपनी नेअमतों को अल्लाह के बंदों के साथ बाँटते हैं, तो अल्लाह हमारी बरकत में इज़ाफ़ा करता है। और जब हम कंजूसी करते हैं, तो हम ख़ुद अपने ऊपर अज़ाब बुलाते हैं। याद रखिए, अल्लाह की नेअमतें उसी वक़्त क़ायम रहती हैं जब हम उसका शुक्र अदा करें और उसके बंदों का हक़ दें। यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि हर काम में "इंशा अल्लाह" कहना चाहिए, क्योंकि हमें नहीं पता कल क्या होगा। अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत बहुत बड़ी है — जब ये लोग अपनी ग़लती पर शर्मिंदा हुए और तौबा की, तो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया और उन्हें बेहतर इनाम देने का वादा किया। तो आइए, हम भी अपनी ग़लतियों से सबक़ सीखें, अल्लाह की नेअमतों का शुक्र अदा करें, और दूसरों के हक़ों का ख़याल रखें। अल्लाह हमें हिदायत दे और हमें कंजूसी और बुरी नीयत से बचाए। आमीन।
📜 आयत 28-32 — सूरा अल-क़लम
अनुवाद — अल-क़लम 30
सूरा अल-क़लम आयत 30 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर लगे एक दूसरे के मुँह दर मुँह मलामत करनेसूरा आयत 30/52 — सूरा अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-क़लम सुनें, सूरा अल-क़लम अनुवाद, सूरा अल-क़लम mp3, सूरा अल-क़लम pdf. आयत 28–32. हिंदी अर्थ: اردو.
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Thursday, October 1, 2026
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