अल-आराफ · 193/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَتَّبِعُوكُمْ ۚ سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنتُمْ صَامِتُونَ ۝١٩٣
Wa in tad`oohum ilalhudaa laa yattabi`ookum; sawaaa`un `alaikum a-da`awtumoohum am antum saamitoon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर तुम उन्हें हिदायत की तरफ बुलाओंगे भी तो ये तुम्हारी पैरवी नहीं करने के तुम्हारे वास्ते बराबर है ख्वाह (चाहे) तुम उनको बुलाओ या तुम चुपचाप बैठे रहो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَدْعُوهُمْ: तुम उन्हें पुकारो / बुलाओ
  • الْهُدَى: सीधा मार्ग, इस्लाम
  • لَا يَتَّبِعُوكُمْ: वे तुम्हारा अनुसरण नहीं करेंगे
  • سَوَاءٌ: बराबर, समान
  • صَامِتُونَ: चुप रहने वाले, ख़ामोश

व्याख्या:

हे मुशरिको! ये मूर्तियाँ जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ, तो वे न तो तुम्हारी पुकार सुनती हैं और न ही तुम्हारा अनुसरण कर सकती हैं। तुम्हारे लिए बराबर है—चाहे तुम उन्हें पुकारो या चुप रहो। क्योंकि ये तो केवल निर्जीव वस्तुएँ हैं; इनमें न सुनने की शक्ति है, न बोलने की, न समझने की। वे न किसी को हिदायत दे सकती हैं और न स्वयं हिदायत पा सकती हैं।

कुछ मुफ़स्सिरीन के अनुसार यहाँ "उन्हें" से मुराद मुशरिकीन भी हो सकते हैं, यानी यदि तुम मुशरिकों को इस्लाम की ओर बुलाओ तो वे तुम्हारा अनुसरण नहीं करेंगे, और तुम्हारे लिए बराबर है कि तुम उन्हें बुलाओ या चुप रहो—क्योंकि उनके दिलों पर मुहर लग चुकी है और वे हक़ को क़बूल करने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन पहला अर्थ (मूर्तियों के संदर्भ में) अधिक प्रचलित और स्पष्ट है, क्योंकि आगे की आयतों में भी यही विषय जारी है।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि केवल अल्लाह ही सुनने, देखने और हिदायत देने वाला है। उसके सिवा जिन्हें हम पुकारते हैं, वे हमारी मदद नहीं कर सकते। इसलिए अपनी सारी उम्मीदें और प्रार्थनाएँ केवल अल्लाह से ही जोड़नी चाहिए।
  2. यह तौहीद की सच्चाई को उजागर करती है—जो चीज़ें निर्जीव हैं, वे न किसी को फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न नुक़सान। उनकी पूजा करना सरासर बेकार है।
  3. इस आयत से दावत-ए-दीन की हक़ीक़त भी मालूम होती है कि हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है; नबी और दावत देने वालों का काम केवल पहुँचाना है। अगर कोई हक़ को क़बूल न करे, तो दावत देने वाले पर कोई मलामत नहीं।
  4. मुसलमानों के लिए यह सबक़ है कि वे अपनी दावत में सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखें और नतीजे की चिंता न करें; उनका काम पहुँचाना है, फ़तह अल्लाह के हाथ में है।
  5. यह आयत हमें मूर्तिपूजा और शिर्क की बेबुनियादी से बचाती है और हमारे दिलों में अल्लाह की महानता और उसकी क़ुदरत का एहसास पैदा करती है कि वही अकेला सुनने, देखने और जवाब देने वाला है।


📜 आयत 191-195 — सूरा अल-आराफ

191أَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ
क्या वह लोग ख़ुदा का शरीक ऐसों को बनाते हैं जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते बल्कि वह ख़ुद (ख़ुदा के) पैदा किए हुए हैं
192وَلَا يَسْتَطِيعُونَ لَهُمْ نَصْرًا وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
और न उनकी मदद की कुदरत रखते हैं और न आप अपनी मदद कर सकते हैं
193وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَتَّبِعُوكُمْ ۚ سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنتُمْ صَامِتُونَ
और अगर तुम उन्हें हिदायत की तरफ बुलाओंगे भी तो ये तुम्हारी पैरवी नहीं करने के तुम्हारे वास्ते बराबर है ख्वाह (चाहे) तुम उनको बुलाओ या तुम चुपचाप बैठे रहो
194إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ ۖ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا لَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
बेशक वह लोग जिनकी तुम ख़ुदा को छोड़कर हाजत करते हो वह (भी) तुम्हारी तरह (ख़ुदा के) बन्दे हैं भला तुम उन्हें पुकार के देखो तो अगर तुम सच्चे हो तो वह तुम्हारी कुछ सुन लें
195أَلَهُمْ أَرْجُلٌ يَمْشُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ أَيْدٍ يَبْطِشُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ أَعْيُنٌ يُبْصِرُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ آذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَا ۗ قُلِ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ ثُمَّ كِيدُونِ فَلَا تُنظِرُونِ
क्या उनके ऐसे पॉव भी हैं जिनसे चल सकें या उनके ऐसे हाथ भी हैं जिनसे (किसी चीज़ को) पकड़ सके या उनकी ऐसी ऑखे भी है जिनसे देख सकें या उनके ऐसे कान हैं जिनसे सुन सकें (ऐ रसूल उन लोगों से) कह दो कि तुम अपने बनाए हुए शरीको को बुलाओ फिर सब मिलकर मुझ पर दॉव चले फिर (मुझे) मोहलत न दो
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
193आयत

अनुवाद — अल-आराफ 193

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Friday, October 2, 2026

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