अल-आराफ · 192/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَلَا يَسْتَطِيعُونَ لَهُمْ نَصْرًا وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ ۝١٩٢
Wa laa yastatee`oona lahum nasranw wa laaa anfusahum yansuroon
📖 हिंदी अर्थ
और न उनकी मदद की कुदरत रखते हैं और न आप अपनी मदद कर सकते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَا يَسْتَطِيعُونَ: वे सामर्थ्य नहीं रखते
  • نَصْرًا: सहायता करना
  • أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ: स्वयं अपनी सहायता करना

व्याख्या:

यह आयत उन मूर्तियों और झूठे देवताओं की विवशता और लाचारी को स्पष्ट करती है जिन्हें मुश्किलों में लोग पुकारते हैं और जिनकी पूजा करते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये मूर्तियाँ न तो अपने पूजा करने वालों की कोई सहायता कर सकती हैं, और न ही स्वयं अपनी ही रक्षा कर सकती हैं। यदि कोई इन्हें तोड़ दे, इन्हें नुक़सान पहुँचाए, या इन्हें गिरा दे, तो ये अपनी रक्षा के लिए कुछ नहीं कर सकतीं। यहाँ तक कि इनकी पूजा करने वाले ही इन्हें गिरने से बचाते हैं, इन्हें उठाते हैं, इनकी देखभाल करते हैं। अर्थात् पूजा करने वाला अपने देवता से अधिक ताक़तवर है, क्योंकि वह देवता की रक्षा करता है, जबकि देवता उसकी कोई सहायता नहीं कर सकता। जब हाल यह है कि ये मूर्तियाँ न किसी की मदद कर सकती हैं और न अपनी ही मदद कर सकती हैं, तो फिर इन्हें पूजा के योग्य कैसे ठहराया जा सकता है? यह सबसे बड़ा अन्याय और सबसे बड़ी मूर्खता है कि इंसान ऐसी बेबस चीज़ों को अल्लाह के साथ साझीदार बनाए।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची सहायता और मदद केवल अल्लाह ही से माँगनी चाहिए, क्योंकि वही सब कुछ कर सकता है।
  2. हमें अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना चाहिए और उन चीज़ों की पूजा नहीं करनी चाहिए जो न तो किसी को फ़ायदा पहुँचा सकें और न नुक़सान से बचा सकें।
  3. यह आयत हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाती है और शिर्क (बहुदेववाद) की बुराई से आगाह करती है।
  4. इस्लाम एक ऐसा दीन है जो इंसान को बेबस और लाचार चीज़ों की गुलामी से आज़ाद करके उस सर्वशक्तिमान अल्लाह की इबादत की ओर ले जाता है जो सुनता है, देखता है और हर मुश्किल में मदद कर सकता है।


📜 आयत 190-194 — सूरा अल-आराफ

190فَلَمَّا آتَاهُمَا صَالِحًا جَعَلَا لَهُ شُرَكَاءَ فِيمَا آتَاهُمَا ۚ فَتَعَالَى اللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
फिर जब ख़ुदा ने उनको नेक (फरज़न्द) अता फ़रमा दिया तो जो (औलाद) ख़ुदा ने उन्हें अता किया था लगे उसमें ख़ुदा का शरीक बनाने तो ख़ुदा (की शान) शिर्क से बहुत ऊँची है
191أَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ
क्या वह लोग ख़ुदा का शरीक ऐसों को बनाते हैं जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते बल्कि वह ख़ुद (ख़ुदा के) पैदा किए हुए हैं
192وَلَا يَسْتَطِيعُونَ لَهُمْ نَصْرًا وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
और न उनकी मदद की कुदरत रखते हैं और न आप अपनी मदद कर सकते हैं
193وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَتَّبِعُوكُمْ ۚ سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنتُمْ صَامِتُونَ
और अगर तुम उन्हें हिदायत की तरफ बुलाओंगे भी तो ये तुम्हारी पैरवी नहीं करने के तुम्हारे वास्ते बराबर है ख्वाह (चाहे) तुम उनको बुलाओ या तुम चुपचाप बैठे रहो
194إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ ۖ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا لَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
बेशक वह लोग जिनकी तुम ख़ुदा को छोड़कर हाजत करते हो वह (भी) तुम्हारी तरह (ख़ुदा के) बन्दे हैं भला तुम उन्हें पुकार के देखो तो अगर तुम सच्चे हो तो वह तुम्हारी कुछ सुन लें
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
192आयत

अनुवाद — अल-आराफ 192

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Wednesday, September 30, 2026

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