अल-आराफ · 199/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ ۝١٩٩
khuzil `afwa waamur bil`urfi waa`rid `anil jaahileen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम दरगुज़र करना एख्तियार करो और अच्छे काम का हुक्म दो और जाहिलों की तरफ से मुह फेर लो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خُذِ الْعَفْوَ (ख़ुज़िल-अफ़्व) : अर्थात क्षमा को अपनाओ, लोगों से आसानी और नरमी के साथ पेश आओ, उनके स्वभाव की कमजोरियों को सहन करो और उनसे वही लो जो वे आसानी से दे सकें।
  • الْعُرْفِ (अल-उर्फ़) : हर वह अच्छा काम, अच्छी बात और नेक आदत जिसे अक़्ल और शरीअत अच्छा समझे।
  • الْجَاهِلِينَ (अल-जाहिलीन) : अज्ञानी लोग, जो बेवजह झगड़ते हैं, बुरा बोलते हैं या नासमझी से पेश आते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! तुम और तुम्हारी उम्मत लोगों के अच्छे स्वभाव और नेक आमाल को क़बूल करो। लोगों से वही उम्मीद रखो जो उनके लिए आसान हो, उन पर ऐसी ज़िम्मेदारियाँ मत डालो जो उनकी ताक़त से बाहर हों, क्योंकि सख़्ती लोगों को दूर भगाती है। लोगों को हमेशा अच्छी बात कहने और अच्छे काम करने का हुक्म दो। और जो लोग जहालत की वजह से तुमसे बुरा सलूक करें, उनसे मुँह मोड़ लो, यानी उनकी जहालत का जवाब जहालत से मत दो। जो तुम्हें तकलीफ़ दे, उसे तकलीफ़ मत पहुँचाओ; जो तुम्हें महरूम करे, उसे महरूम मत करो। बल्कि दरगुज़र करो और अल्लाह की राह में नेकी पर क़ायम रहो। यह हुक्म उस वक़्त दिया गया जब कुछ मुशरिकीन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से बदसलूकी करते थे, जैसे अबू जहल और उसके साथी, तो अल्लाह ने फ़रमाया कि इनसे अलग रहो और अपना काम जारी रखो।

फ़ायदे (सबक़):

  • यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम नरमी, आसानी और अच्छे अख़लाक़ का दीन है। हमें लोगों से नरमी से पेश आना चाहिए और उनकी कमज़ोरियों पर सख़्ती नहीं करनी चाहिए।
  • हमें हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए और अच्छे कामों का हुक्म देना चाहिए, चाहे सामने वाला हमारा दुश्मन ही क्यों न हो।
  • जहालत और बुरे सलूक का जवाब बुराई से नहीं, बल्कि दरगुज़र और अच्छाई से देना चाहिए। यही अल्लाह को पसंद है और यही इंसान को बुलंदी देता है।
  • यह आयत हमें सिखाती है कि ग़ुस्से और झगड़े से बचना चाहिए, और अपनी एनर्जी नेक कामों में लगानी चाहिए, ताकि समाज में मुहब्बत और भाईचारा बढ़े।


📜 आयत 197-201 — सूरा अल-आराफ

197وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
और वह लोग (बुत) जिन्हें तुम ख़ुदा के सिवा (अपनी मदद को) पुकारते हो न तो वह तुम्हारी मदद की कुदरत रखते हैं और न ही अपनी मदद कर सकते हैं
198وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَسْمَعُوا ۖ وَتَرَاهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
और अगर उन्हें हिदायत की तरफ बुलाएगा भी तो ये सुन ही नहीं सकते और तू तो समझता है कि वह तुझे (ऑखें खोले) देख रहे हैं हालॉकि वह देखते नहीं
199خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ
(ऐ रसूल) तुम दरगुज़र करना एख्तियार करो और अच्छे काम का हुक्म दो और जाहिलों की तरफ से मुह फेर लो
200وَإِمَّا يَنزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۚ إِنَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
अगर शैतान की तरफ से तुम्हारी (उम्मत के) दिल में किसी तरह का (वसवसा (शक) पैदा हो तो ख़ुदा से पनाह मॉगों (क्योंकि) उसमें तो शक़ ही नहीं कि वह बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है
201إِنَّ الَّذِينَ اتَّقَوْا إِذَا مَسَّهُمْ طَائِفٌ مِّنَ الشَّيْطَانِ تَذَكَّرُوا فَإِذَا هُم مُّبْصِرُونَ
बेशक लोग परहेज़गार हैं जब भी उन्हें शैतान का ख्याल छू भी गया तो चौक पड़ते हैं फिर फौरन उनकी ऑखें खुल जाती हैं
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
199आयत

अनुवाद — अल-आराफ 199

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Thursday, October 1, 2026

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