Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- تَدْعُوهُمْ: तुम उन्हें पुकारो / बुलाओ
- الْهُدَى: सीधा मार्ग, सत्य की ओर मार्गदर्शन
- لَا يَسْمَعُوا: वे सुनते नहीं
- تَرَاهُمْ: तुम उन्हें देखते हो
- يَنظُرُونَ إِلَيْكَ: वे तुम्हारी ओर देखते हुए प्रतीत होते हैं
- لَا يُبْصِرُونَ: वे देखते नहीं (उनमें देखने की शक्ति नहीं)
विस्तृत व्याख्या:
यह आयत उन मूर्तियों और झूठे देवताओं की स्थिति को स्पष्ट करती है जिन्हें मुश्किलों में लोग अपना सहारा बनाते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐ मुशरिको! यदि तुम अपनी इन मूर्तियों को सीधे मार्ग की ओर बुलाओ, उनसे सत्य और भलाई की कोई बात कहो, तो वे तुम्हारी पुकार बिल्कुल नहीं सुन सकतीं। उनके पास न कान हैं जो सुनें, न दिमाग़ जो समझें।
फिर अल्लाह अपने नबी ﷺ को संबोधित करते हुए फ़रमाता है कि ऐ नबी! तुम इन मूर्तियों को देखते हो तो ऐसा प्रतीत होता है मानो वे तुम्हारी ओर देख रही हैं, क्योंकि मूर्ति बनाने वालों ने उन्हें आँखों वाली बनाया है, कभी-कभी उनकी आँखों में नकली पुतलियाँ भी लगाई जाती हैं। लेकिन वास्तव में वे कुछ नहीं देखतीं। उनकी आँखें सिर्फ़ बनावटी हैं, उनमें कोई रोशनी नहीं, कोई जीवन नहीं। वे न सुन सकती हैं, न देख सकती हैं, न किसी की मदद कर सकती हैं।
यह आयत उन लोगों के लिए एक बड़ी फटकार है जो बेजान चीज़ों को पुकारते हैं, उनसे मदद माँगते हैं, उनके आगे सिर झुकाते हैं। अगर वे मूर्तियाँ अपने भक्तों की पुकार भी सुन लें, तो भी वे कुछ नहीं कर सकतीं, क्योंकि उनमें कोई शक्ति ही नहीं है।
आयत से मिलने वाली शिक्षाएँ और लाभ:
- अकेले अल्लाह ही सुनने वाला और देखने वाला है: यह आयत हमें सिखाती है कि जो सचमुच सुनता और देखता है, वह केवल अल्लाह है। वही हर पुकार को सुनता है, हर हालत में अपने बंदों की मदद करता है। इसलिए हमें अपनी हर ज़रूरत में सिर्फ़ उसी से माँगना चाहिए।
- मूर्तियों और झूठे देवताओं की निरर्थकता: जो चीज़ें न सुन सकें, न देख सकें, न किसी भलाई या बुराई की मालिक हों, उन्हें पूजना और उनसे उम्मीद रखना कितनी बड़ी नादानी है। यह आयत इस नादानी से बचाती है।
- तौहीद (एकेश्वरवाद) की सुंदरता: इस्लाम हमें सिखाता है कि अपनी सभी ज़रूरतें, दुआएँ और भरोसा केवल उसी ज़ात पर रखो जो सब कुछ सुनती, देखती और कर सकती है। यही सच्ची आज़ादी है — किसी बेजान चीज़ के आगे सिर न झुकाना, बल्कि सीधे उस मालिक से जुड़ना जो सब कुछ अपने हाथ में रखता है।
- अक्ल का इस्तेमाल: यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जो इंसान अपने ही हाथों से बनाई हुई मूर्ति की पूजा करे, वह अपनी अक्ल का कितना बुरा इस्तेमाल कर रहा है। इस्लाम हमें अक्ल और समझ से काम लेने की तालीम देता है।
- नबी ﷺ की दावत की सच्चाई: यह आयत यह भी बताती है कि नबी ﷺ का पैग़ाम सच्चा और स्पष्ट था, क्योंकि वे ऐसी चीज़ों की निरर्थकता बयान कर रहे थे जिन्हें लोग सदियों से पूजते आ रहे थे। यह उनकी हिम्मत और सच्चाई का सबूत है।
📜 आयत 196-200 — सूरा अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 198
सूरा अल-आराफ आयत 198 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अगर उन्हें हिदायत की तरफ बुलाएगा भी तो ये…सूरा आयत 198/206 — सूरा अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-आराफ सुनें, सूरा अल-आराफ अनुवाद, सूरा अल-आराफ mp3, सूरा अल-आराफ pdf. आयत 196–200. हिंदी अर्थ: اردو.
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Friday, October 2, 2026
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