अल-आराफ · 198/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَسْمَعُوا ۖ وَتَرَاهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ ۝١٩٨
Wa in tad`oohum ilal hudaa laa yasm`oo wa taraahum yanzuroona ilaika wa hum laa yubsiroon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर उन्हें हिदायत की तरफ बुलाएगा भी तो ये सुन ही नहीं सकते और तू तो समझता है कि वह तुझे (ऑखें खोले) देख रहे हैं हालॉकि वह देखते नहीं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَدْعُوهُمْ: तुम उन्हें पुकारो / बुलाओ
  • الْهُدَى: सीधा मार्ग, सत्य की ओर मार्गदर्शन
  • لَا يَسْمَعُوا: वे सुनते नहीं
  • تَرَاهُمْ: तुम उन्हें देखते हो
  • يَنظُرُونَ إِلَيْكَ: वे तुम्हारी ओर देखते हुए प्रतीत होते हैं
  • لَا يُبْصِرُونَ: वे देखते नहीं (उनमें देखने की शक्ति नहीं)

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत उन मूर्तियों और झूठे देवताओं की स्थिति को स्पष्ट करती है जिन्हें मुश्किलों में लोग अपना सहारा बनाते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐ मुशरिको! यदि तुम अपनी इन मूर्तियों को सीधे मार्ग की ओर बुलाओ, उनसे सत्य और भलाई की कोई बात कहो, तो वे तुम्हारी पुकार बिल्कुल नहीं सुन सकतीं। उनके पास न कान हैं जो सुनें, न दिमाग़ जो समझें।

फिर अल्लाह अपने नबी ﷺ को संबोधित करते हुए फ़रमाता है कि ऐ नबी! तुम इन मूर्तियों को देखते हो तो ऐसा प्रतीत होता है मानो वे तुम्हारी ओर देख रही हैं, क्योंकि मूर्ति बनाने वालों ने उन्हें आँखों वाली बनाया है, कभी-कभी उनकी आँखों में नकली पुतलियाँ भी लगाई जाती हैं। लेकिन वास्तव में वे कुछ नहीं देखतीं। उनकी आँखें सिर्फ़ बनावटी हैं, उनमें कोई रोशनी नहीं, कोई जीवन नहीं। वे न सुन सकती हैं, न देख सकती हैं, न किसी की मदद कर सकती हैं।

यह आयत उन लोगों के लिए एक बड़ी फटकार है जो बेजान चीज़ों को पुकारते हैं, उनसे मदद माँगते हैं, उनके आगे सिर झुकाते हैं। अगर वे मूर्तियाँ अपने भक्तों की पुकार भी सुन लें, तो भी वे कुछ नहीं कर सकतीं, क्योंकि उनमें कोई शक्ति ही नहीं है।


आयत से मिलने वाली शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अकेले अल्लाह ही सुनने वाला और देखने वाला है: यह आयत हमें सिखाती है कि जो सचमुच सुनता और देखता है, वह केवल अल्लाह है। वही हर पुकार को सुनता है, हर हालत में अपने बंदों की मदद करता है। इसलिए हमें अपनी हर ज़रूरत में सिर्फ़ उसी से माँगना चाहिए।
  2. मूर्तियों और झूठे देवताओं की निरर्थकता: जो चीज़ें न सुन सकें, न देख सकें, न किसी भलाई या बुराई की मालिक हों, उन्हें पूजना और उनसे उम्मीद रखना कितनी बड़ी नादानी है। यह आयत इस नादानी से बचाती है।
  3. तौहीद (एकेश्वरवाद) की सुंदरता: इस्लाम हमें सिखाता है कि अपनी सभी ज़रूरतें, दुआएँ और भरोसा केवल उसी ज़ात पर रखो जो सब कुछ सुनती, देखती और कर सकती है। यही सच्ची आज़ादी है — किसी बेजान चीज़ के आगे सिर न झुकाना, बल्कि सीधे उस मालिक से जुड़ना जो सब कुछ अपने हाथ में रखता है।
  4. अक्ल का इस्तेमाल: यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जो इंसान अपने ही हाथों से बनाई हुई मूर्ति की पूजा करे, वह अपनी अक्ल का कितना बुरा इस्तेमाल कर रहा है। इस्लाम हमें अक्ल और समझ से काम लेने की तालीम देता है।
  5. नबी ﷺ की दावत की सच्चाई: यह आयत यह भी बताती है कि नबी ﷺ का पैग़ाम सच्चा और स्पष्ट था, क्योंकि वे ऐसी चीज़ों की निरर्थकता बयान कर रहे थे जिन्हें लोग सदियों से पूजते आ रहे थे। यह उनकी हिम्मत और सच्चाई का सबूत है।
🎧 सुनें

📜 आयत 196-200 — अल-आराफ

196إِنَّ وَلِيِّيَ اللَّهُ الَّذِي نَزَّلَ الْكِتَابَ ۖ وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِحِينَ
(फिर देखो मेरा क्या बना सकते हो) बेशक मेरा मालिक व मुमताज़ तो बस ख़ुदा है जिस ने किताब क़ुरान को नाज़िल फरमाया और वही (अपने) नेक बन्दों का हाली (मददगार) है
197وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
और वह लोग (बुत) जिन्हें तुम ख़ुदा के सिवा (अपनी मदद को) पुकारते हो न तो वह तुम्हारी मदद की कुदरत रखते हैं और न ही अपनी मदद कर सकते हैं
198وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَسْمَعُوا ۖ وَتَرَاهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
और अगर उन्हें हिदायत की तरफ बुलाएगा भी तो ये सुन ही नहीं सकते और तू तो समझता है कि वह तुझे (ऑखें खोले) देख रहे हैं हालॉकि वह देखते नहीं
199خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ
(ऐ रसूल) तुम दरगुज़र करना एख्तियार करो और अच्छे काम का हुक्म दो और जाहिलों की तरफ से मुह फेर लो
200وَإِمَّا يَنزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۚ إِنَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
अगर शैतान की तरफ से तुम्हारी (उम्मत के) दिल में किसी तरह का (वसवसा (शक) पैदा हो तो ख़ुदा से पनाह मॉगों (क्योंकि) उसमें तो शक़ ही नहीं कि वह बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है
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अनुवाद — अल-आराफ 198

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Tuesday, August 18, 2026

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