अल-आराफ · 32/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ ۚ قُلْ هِيَ لِلَّذِينَ آمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا خَالِصَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ۝٣٢
Qul man harrama zeenatal laahil lateee akhraja li`ibaadihee wattaiyibaati minar rizq; qul hiya lillazeena aamanoo fil hayaatid dunyaa khaalisatany Yawmal Qiyaamah; kazaalika nufassihul Aayaati liqawminy ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल से) पूछो तो कि जो ज़ीनत (के साज़ों सामान) और खाने की साफ सुथरी चीज़ें ख़ुदा ने अपने बन्दो के वास्ते पैदा की हैं किसने हराम कर दी तुम ख़ुद कह दो कि सब पाक़ीज़ा चीज़े क़यामत के दिन उन लोगों के लिए ख़ास हैं जो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी में ईमान लाते थे हम यूँ अपनी आयतें समझदार लोगों के वास्ते तफसीलदार बयान करतें हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • زِينَةَ اللهِ: अल्लाह की वह सजावट और सुंदरता जो उसने अपने बंदों के लिए पैदा की, जैसे अच्छे कपड़े, पहनावा और शरीर को ढकने वाली चीज़ें।
  • الطَّيِّبَاتِ: पवित्र और हलाल चीज़ें, जैसे अच्छा भोजन, पेय और अन्य आजीविका की वस्तुएँ।
  • خَالِصَةً: विशेष रूप से केवल उन्हीं के लिए, जिसमें कोई साझेदार न हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! उन लोगों से कहो जो अल्लाह की दी हुई नेमतों को हराम ठहराते हैं—जैसे सुंदर कपड़े पहनना और अच्छी हलाल चीज़ें खाना-पीना—कि किसने इन्हें हराम किया है? क्या अल्लाह ने ये चीज़ें अपने बंदों के लिए पैदा नहीं कीं? ये तो उसकी देन हैं जिनसे वह अपने बंदों को सजाता है और उनकी ज़िंदगी को आसान बनाता है। फिर किसे अधिकार है कि वह इन्हें हराम करे? यह तो अल्लाह का हक़ है कि वह हलाल और हराम का फ़ैसला करे, और उसने इन चीज़ों को हलाल किया है।

फिर कहो: ये सुंदर चीज़ें और पवित्र आजीविका दुनिया में सभी लोगों के लिए हैं—चाहे वे मोमिन हों या काफ़िर—सब इनसे लाभ उठाते हैं। लेकिन क़ियामत के दिन ये नेमतें केवल उन्हीं लोगों के लिए होंगी जो ईमान लाए, क्योंकि जन्नत की सारी नेमतें सिर्फ़ मोमिनों के लिए हैं, और काफ़िर उनसे महरूम रहेंगे। इस तरह अल्लाह अपनी आयतों को स्पष्ट रूप से समझाता है उन लोगों के लिए जो ज्ञान रखते हैं और समझना चाहते हैं।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. इस्लाम दीन-ए-फ़ितरत है—यह नेमतों को हराम नहीं करता, बल्कि उन्हें हलाल ठहराकर बंदों पर रहमत करता है। अल्लाह की दी हुई सुंदरता और अच्छी चीज़ों का इस्तेमाल करना जायज़ है, बशर्ते वह हलाल हो और अल्लाह की इताअत में हो।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें उन लोगों की बात नहीं माननी चाहिए जो अल्लाह की नेमतों को हराम ठहराते हैं—चाहे वे कितने भी बड़े दिखने वाले हों। हलाल और हराम का फ़ैसला सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल का अधिकार है।
  3. मोमिन की पहचान यह है कि वह दुनिया की नेमतों का इस्तेमाल करते हुए भी उन्हें अल्लाह की याद से नहीं भूलता, और उसकी नज़र आख़िरत पर रहती है—जहाँ उसे ये नेमतें ख़ालिस तौर पर मिलेंगी।
  4. यह आयत हमें अल्लाह के एहसानों का शुक्र अदा करने की तरग़ीब देती है, क्योंकि ये सब उसी की देन हैं, और शुक्र अदा करने से नेमतें बढ़ती हैं।
  5. अल्लाह का तरीक़ा यह है कि वह अपने बंदों के लिए चीज़ों को आसान बनाता है और उन पर सख़्ती नहीं करता—यही इस्लाम की रूह है: आसानी और मध्यमता।
🎧 सुनें

📜 आयत 30-34 — अल-आराफ

30فَرِيقًا هَدَىٰ وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيْهِمُ الضَّلَالَةُ ۗ إِنَّهُمُ اتَّخَذُوا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ اللَّهِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
उसी तरह फिर (दोबारा) ज़िन्दा किये जाओगे उसी ने एक फरीक़ की हिदायत की और एक गिरोह (के सर) पर गुमराही सवार हो गई उन लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर शैतानों को अपना सरपरस्त बना लिया और बावजूद उसके गुमराह करते हैं कि वह राह रास्ते पर है
31۞ يَا بَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ
ऐ औलाद आदम हर नमाज़ के वक्त बन सवर के निखर जाया करो और खाओ और पियो और फिज़ूल ख़र्ची मत करो (क्योंकि) ख़ुदा फिज़ूल ख़र्च करने वालों को दोस्त नहीं रखता
32قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ ۚ قُلْ هِيَ لِلَّذِينَ آمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا خَالِصَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल से) पूछो तो कि जो ज़ीनत (के साज़ों सामान) और खाने की साफ सुथरी चीज़ें ख़ुदा ने अपने बन्दो के वास्ते पैदा की हैं किसने हराम कर दी तुम ख़ुद कह दो कि सब पाक़ीज़ा चीज़े क़यामत के दिन उन लोगों के लिए ख़ास हैं जो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी में ईमान लाते थे हम यूँ अपनी आयतें समझदार लोगों के वास्ते तफसीलदार बयान करतें हैं
33قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّيَ الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَالْإِثْمَ وَالْبَغْيَ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَأَن تُشْرِكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَأَن تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि हमारे परवरदिगार ने तो तमाम बदकारियों को ख्वाह (चाहे) ज़ाहिरी हो या बातिनी और गुनाह और नाहक़ ज्यादती करने को हराम किया है और इस बात को कि तुम किसी को ख़ुदा का शरीक बनाओ जिनकी उनसे कोई दलील न ही नाज़िल फरमाई और ये भी कि बे समझे बूझे ख़ुदा पर बोहतान बॉधों
34وَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
और हर गिरोह (के न पैदा होने) का एक ख़ास वक्त है फिर जब उनका वक्त आ पहुंचता है तो न एक घड़ी पीछे रह सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं
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अनुवाद — अल-आराफ 32

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Tuesday, August 18, 2026

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