अल-आराफ · 31/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
۞ يَا بَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ ۝٣١
Yaa Banneee Adama khuzoo zeenatakum `inda kulli masjidinw wa kuloo washraboo wa laa tusrifoo; innahoo laa yuhibbul musrifeen
📖 हिंदी अर्थ
ऐ औलाद आदम हर नमाज़ के वक्त बन सवर के निखर जाया करो और खाओ और पियो और फिज़ूल ख़र्ची मत करो (क्योंकि) ख़ुदा फिज़ूल ख़र्च करने वालों को दोस्त नहीं रखता

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अनुवाद — Tafsir

### معاني الكلمات

  • زِينَتَكُمْ: अपना पहनावा और वह चीज़ें जिनसे आप सुंदर दिखें, जैसे साफ़ और ढकने वाले कपड़े।
  • عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ: हर नमाज़ और इबादत के समय, विशेषकर मस्जिद में जाने और तवाफ़ (काबा की परिक्रमा) के वक़्त।
  • لَا تُسْرِفُوا: हद से आगे न बढ़ो, न खाने-पीने में न कपड़ों में, और न ही किसी और मामले में।

### تفسير الآية

ऐ आदम की संतानो! जब भी तुम इबादत के लिए जाओ, चाहे वह नमाज़ हो, तवाफ़ हो या किसी मस्जिद में जाना हो, तो अपनी शान और सजावट का ख़याल रखो। यानी साफ़, पाक और शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनो, और अपने आपको अच्छी हालत में रखो। यह हुक्म उस वक़्त दिया गया जब अरब के कुछ लोग नंगे होकर काबा का तवाफ़ करते थे, जो बिल्कुल ग़लत और शर्मनाक काम था। अल्लाह ने उन्हें इस बुरी आदत से रोका और सिखाया कि इबादत के लिए साफ़ सुथरे और शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना ज़रूरी है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: खाओ और पियो उन पाक और हलाल चीज़ों से जो मैंने तुम्हें दी हैं, लेकिन हद से आगे न बढ़ो। यानी न तो इतना खाओ कि पेट खराब हो जाए, न इतना पियो कि सेहत को नुक़सान पहुँचे, और न ही हलाल चीज़ों को छोड़कर हराम की तरफ़ जाओ। अल्लाह उन लोगों को पसंद नहीं करता जो हद से बढ़ जाते हैं, चाहे वह खाने-पीने में हो, कपड़ों में हो, या किसी और मामले में। इसलिए हर काम में संतुलन और अच्छाई को अपनाओ।


### فوائد

  1. इबादत की शान: यह आयत सिखाती है कि अल्लाह की इबादत के लिए साफ़ सुथरे और अच्छे कपड़े पहनना चाहिए। यह इस्लाम की ख़ूबसूरती है कि वह हर काम में सफ़ाई और सुंदरता को पसंद करता है।
  2. संतुलन की शिक्षा: खाने-पीने में भी हद से आगे नहीं बढ़ना चाहिए। यह हमें सेहत और शुक्र की नेमत की तरफ़ ले जाता है, क्योंकि ज़्यादती बर्बादी और बीमारी का सबब बनती है।
  3. हराम से बचाव: यह आयत हलाल और पाक चीज़ों को इस्तेमाल करने की तरग़ीब देती है और हराम से दूर रहने की ताकीद करती है, जिससे इंसान की ज़िंदगी पाक और बरकत वाली बनती है।
  4. अल्लाह की मुहब्बत: अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो हर काम में अच्छाई और संतुलन अपनाते हैं। यह हमें अल्लाह की मुहब्बत हासिल करने का रास्ता दिखाता है, जो सबसे बड़ी कामयाबी है।


📜 आयत 29-33 — अल-आराफ

29قُلْ أَمَرَ رَبِّي بِالْقِسْطِ ۖ وَأَقِيمُوا وُجُوهَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۚ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार ने तो इन्साफ का हुक्म दिया है और (ये भी क़रार दिया है कि) हर नमाज़ के वक्त अपने अपने मुँह (क़िबले की तरफ़) सीधे कर लिया करो और इसके लिए निरी खरी इबादत करके उससे दुआ मांगो जिस तरह उसने तुम्हें शुरू शुरू पैदा किया था
30فَرِيقًا هَدَىٰ وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيْهِمُ الضَّلَالَةُ ۗ إِنَّهُمُ اتَّخَذُوا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ اللَّهِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
उसी तरह फिर (दोबारा) ज़िन्दा किये जाओगे उसी ने एक फरीक़ की हिदायत की और एक गिरोह (के सर) पर गुमराही सवार हो गई उन लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर शैतानों को अपना सरपरस्त बना लिया और बावजूद उसके गुमराह करते हैं कि वह राह रास्ते पर है
31۞ يَا بَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ
ऐ औलाद आदम हर नमाज़ के वक्त बन सवर के निखर जाया करो और खाओ और पियो और फिज़ूल ख़र्ची मत करो (क्योंकि) ख़ुदा फिज़ूल ख़र्च करने वालों को दोस्त नहीं रखता
32قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ ۚ قُلْ هِيَ لِلَّذِينَ آمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا خَالِصَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल से) पूछो तो कि जो ज़ीनत (के साज़ों सामान) और खाने की साफ सुथरी चीज़ें ख़ुदा ने अपने बन्दो के वास्ते पैदा की हैं किसने हराम कर दी तुम ख़ुद कह दो कि सब पाक़ीज़ा चीज़े क़यामत के दिन उन लोगों के लिए ख़ास हैं जो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी में ईमान लाते थे हम यूँ अपनी आयतें समझदार लोगों के वास्ते तफसीलदार बयान करतें हैं
33قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّيَ الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَالْإِثْمَ وَالْبَغْيَ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَأَن تُشْرِكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَأَن تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि हमारे परवरदिगार ने तो तमाम बदकारियों को ख्वाह (चाहे) ज़ाहिरी हो या बातिनी और गुनाह और नाहक़ ज्यादती करने को हराम किया है और इस बात को कि तुम किसी को ख़ुदा का शरीक बनाओ जिनकी उनसे कोई दलील न ही नाज़िल फरमाई और ये भी कि बे समझे बूझे ख़ुदा पर बोहतान बॉधों
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अनुवाद — अल-आराफ 31

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Tuesday, August 18, 2026

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