अल-आराफ · 34/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ ۝٣٤
Wa likulli ummatin ajalun fa izaa jaaa`a ajaluhum laa yastaakhiroona saa`atanw wa laa yastaqdimoon
📖 हिंदी अर्थ
और हर गिरोह (के न पैदा होने) का एक ख़ास वक्त है फिर जब उनका वक्त आ पहुंचता है तो न एक घड़ी पीछे रह सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
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A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُمَّةٍ (उम्मत): यहाँ इससे आशय उस समुदाय या जनसमूह से है जो किसी नबी के पास भेजे गए संदेश को झुठलाने और कुफ्र पर इकट्ठा होने वाला हो।
  • أَجَلٌ (अजल): निर्धारित समय, मियाद, वह वक्त जो अल्लाह ने किसी क़ौम के लिए तय कर दिया हो।
  • لَا يَسْتَأْخِرُونَ (ला यस्तख़िरून): वे पीछे नहीं हटेंगे, न ही उसमें देर होगी।
  • يَسْتَقْدِمُونَ (यस्तक़दिमून): वे आगे नहीं बढ़ेंगे, न ही उससे पहले आएगा।

तफ़सीर:

हर उम्मत और हर ज़माने के लोगों के लिए अल्लाह ने एक निश्चित समय और मियाद तय कर रखी है। यह मियाद उनकी ज़िंदगी की अवधि भी हो सकती है और उन पर अज़ाब के नाज़िल होने का वक्त भी। जब वह निर्धारित समय आ जाता है, तो न तो वे उससे एक पल के लिए भी पीछे हट सकते हैं और न ही उससे पहले उन पर कोई आफत आ सकती है। यह बात उन काफिरों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो अल्लाह के अज़ाब को जल्दी मांगते थे और मज़ाक उड़ाते थे। अल्लाह फ़रमाता है कि हर क़ौम के लिए एक मुकर्रर वक्त है, जब वह आ जाएगा, तो उसमें एक घड़ी की भी देर या जल्दी नहीं होगी। यह अल्लाह की सुन्नत (क़ानून) है जो कभी बदलती नहीं। इसी तरह जब किसी क़ौम का अंतिम समय आता है, तो उसे टाला नहीं जा सकता, चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें।


फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह का फैसला और उसकी तय की हुई मियाद अटल है। उसमें कोई बदलाव या टाल-मटोल नहीं हो सकती। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह के हुक्मों को माने और उसकी पकड़ से डरे।
  2. यह आयत हमें सब्र और भरोसे की तालीम देती है। जिस तरह अज़ाब के लिए एक वक्त मुकर्रर है, उसी तरह रिज़्क़, कामयाबी और हर चीज़ के लिए अल्लाह ने एक वक्त तय कर रखा है। इसलिए हमें जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए और अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।
  3. यह आयत हमें याद दिलाती है कि ज़िंदगी की मुहलत को ग़नीमत समझना चाहिए। जब तक हमारा वक्त बाकी है, हमें तौबा कर लेनी चाहिए और अच्छे काम करने चाहिए, क्योंकि जब अजल आ जाएगी, तो एक पल की भी मोहलत नहीं मिलेगी।
  4. इस आयत से मालूम होता है कि अल्लाह की रहमत और उसका इंसाफ़ दोनों पूरे हैं। वह किसी पर जल्दी अज़ाब नहीं भेजता, बल्कि हर क़ौम को उसकी मुकर्रर मुद्दत तक मोहलत देता है, ताकि वे सुधर जाएँ। यह अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है।


📜 आयत 32-36 — सूरा अल-आराफ

32قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ ۚ قُلْ هِيَ لِلَّذِينَ آمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا خَالِصَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल से) पूछो तो कि जो ज़ीनत (के साज़ों सामान) और खाने की साफ सुथरी चीज़ें ख़ुदा ने अपने बन्दो के वास्ते पैदा की हैं किसने हराम कर दी तुम ख़ुद कह दो कि सब पाक़ीज़ा चीज़े क़यामत के दिन उन लोगों के लिए ख़ास हैं जो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी में ईमान लाते थे हम यूँ अपनी आयतें समझदार लोगों के वास्ते तफसीलदार बयान करतें हैं
33قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّيَ الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَالْإِثْمَ وَالْبَغْيَ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَأَن تُشْرِكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَأَن تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि हमारे परवरदिगार ने तो तमाम बदकारियों को ख्वाह (चाहे) ज़ाहिरी हो या बातिनी और गुनाह और नाहक़ ज्यादती करने को हराम किया है और इस बात को कि तुम किसी को ख़ुदा का शरीक बनाओ जिनकी उनसे कोई दलील न ही नाज़िल फरमाई और ये भी कि बे समझे बूझे ख़ुदा पर बोहतान बॉधों
34وَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
और हर गिरोह (के न पैदा होने) का एक ख़ास वक्त है फिर जब उनका वक्त आ पहुंचता है तो न एक घड़ी पीछे रह सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं
35يَا بَنِي آدَمَ إِمَّا يَأْتِيَنَّكُمْ رُسُلٌ مِّنكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آيَاتِي ۙ فَمَنِ اتَّقَىٰ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
ऐ औलादे आदम जब तुम में के (हमारे) पैग़म्बर तुम्हारे पास आए और तुमसे हमारे एहकाम बयान करे तो (उनकी इताअत करना क्योंकि जो शख्स परहेज़गारी और नेक काम करेगा तो ऐसे लोगों पर न तो (क़यामत में) कोई ख़ौफ़ होगा और न वह आर्ज़दा ख़ातिर (परेशान) होंगे
36وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे सरताबी कर बैठे वह लोग जहन्नुमी हैं कि वह उसमें हमेशा रहेगें
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
34आयत

अनुवाद — अल-आराफ 34

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Monday, September 28, 2026

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