अल-जिन्न · 11/28
अनुवाद उच्चारण — अल-जिन्न
وَأَنَّا مِنَّا الصَّالِحُونَ وَمِنَّا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ كُنَّا طَرَائِقَ قِدَدًا ۝١١
Wa annaa minnas saalihoona wa minnaa doona zaalika kunnaa taraaa`ilqa qidadaa
📖 हिंदी अर्थ
और ये कि हममें से कुछ लोग तो नेकोकार हैं और कुछ लोग और तरह के हम लोगों के भी तो कई तरह के फिरकें हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الصَّالِحُونَ: नेक और परहेज़गार लोग।
  • دُونَ ذَٰلِكَ: उससे नीचे या कम दर्जे के।
  • طَرَائِقَ قِدَدًا: अलग-अलग रास्ते, विभिन्न समूह और अलग-अलग विचारधाराएँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में जिन्नात की एक जमात अपनी कौम की सच्ची और ईमानदार गवाही दे रही है। वे कहते हैं: "हम जिन्नात में से कुछ नेक और परहेज़गार हैं, जो अल्लाह के आज्ञाकारी हैं और उसकी राह पर चलते हैं। और हम में से कुछ इससे नीचे दर्जे के हैं, यानी काफ़िर, फ़ासिक़ और गुनाहगार हैं। हम अलग-अलग रास्तों और विभिन्न समूहों में बँटे हुए थे — कोई सीधी राह पर था, तो कोई गुमराही में भटका हुआ था।"

यह कथन उस समय का है जब जिन्नात के एक समूह ने पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) का क़ुरआन सुना और उससे प्रभावित होकर ईमान लाया। उन्होंने अपनी कौम की हालत बयान की कि हम में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग थे, और हमारे विचार और रास्ते अलग-अलग थे। यह एक सच्चाई का इज़हार है कि हर समुदाय में नेक और बदकार लोग होते हैं, लेकिन जो लोग सच्चाई को सुनकर उसे क़बूल कर लेते हैं, वही कामयाब होते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान और जिन्नात दोनों में अच्छे और बुरे लोग होते हैं, लेकिन अल्लाह की रहमत और हिदायत उन्हें मिलती है जो सच्चाई सुनकर उसे अपनाते हैं। जिन्नात के उस समूह ने जब क़ुरआन सुना, तो उन्होंने तुरंत ईमान लाया और अपनी कौम को सीधी राह की दावत दी। यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सबक़ है कि हमें भी चाहिए कि जब हमें सच्चाई मिले, तो उसे न सिर्फ़ क़बूल करें, बल्कि दूसरों तक पहुँचाने का ज़रिया बनें। अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए है जो अपने अंदर की बुराइयों को छोड़कर नेकी की राह अपनाते हैं। याद रखें, अल्लाह हर उस बंदे को हिदायत देता है जो सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजू करता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 9-13 — अल-जिन्न

9وَأَنَّا كُنَّا نَقْعُدُ مِنْهَا مَقَاعِدَ لِلسَّمْعِ ۖ فَمَن يَسْتَمِعِ الْآنَ يَجِدْ لَهُ شِهَابًا رَّصَدًا
और ये कि पहले हम वहाँ बहुत से मक़ामात में (बातें) सुनने के लिए बैठा करते थे मगर अब कोई सुनना चाहे तो अपने लिए शोले तैयार पाएगा
10وَأَنَّا لَا نَدْرِي أَشَرٌّ أُرِيدَ بِمَن فِي الْأَرْضِ أَمْ أَرَادَ بِهِمْ رَبُّهُمْ رَشَدًا
और ये कि हम नहीं समझते कि उससे अहले ज़मीन के हक़ में बुराई मक़सूद है या उनके परवरदिगार ने उनकी भलाई का इरादा किया है
11وَأَنَّا مِنَّا الصَّالِحُونَ وَمِنَّا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ كُنَّا طَرَائِقَ قِدَدًا
और ये कि हममें से कुछ लोग तो नेकोकार हैं और कुछ लोग और तरह के हम लोगों के भी तो कई तरह के फिरकें हैं
12وَأَنَّا ظَنَنَّا أَن لَّن نُّعْجِزَ اللَّهَ فِي الْأَرْضِ وَلَن نُّعْجِزَهُ هَرَبًا
और ये कि हम समझते थे कि हम ज़मीन में (रह कर) ख़ुदा को हरगिज़ हरा नहीं सकते हैं और न भाग कर उसको आजिज़ कर सकते हैं
13وَأَنَّا لَمَّا سَمِعْنَا الْهُدَىٰ آمَنَّا بِهِ ۖ فَمَن يُؤْمِن بِرَبِّهِ فَلَا يَخَافُ بَخْسًا وَلَا رَهَقًا
और ये कि जब हमने हिदायत (की किताब) सुनी तो उन पर ईमान लाए तो जो शख़्श अपने परवरदिगार पर ईमान लाएगा तो उसको न नुक़सान का ख़ौफ़ है और न ज़ुल्म का
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अनुवाद — अल-जिन्न 11

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Tuesday, August 18, 2026

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