अल-जिन्न · 14/28
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-जिन्न
وَأَنَّا مِنَّا الْمُسْلِمُونَ وَمِنَّا الْقَاسِطُونَ ۖ فَمَنْ أَسْلَمَ فَأُولَٰئِكَ تَحَرَّوْا رَشَدًا ۝١٤
Wa annaa minnal muslimoona wa minnal qaasitoona faman aslama fa ulaaa`ika taharraw rashadaa
📖 हिंदी अर्थ
और ये कि हम में से कुछ लोग तो फ़रमाबरदार हैं और कुछ लोग नाफ़रमान तो जो लोग फ़रमाबरदार हैं तो वह सीधे रास्ते पर चलें और रहें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْمُسْلِمُونَ: अल्लाह के आगे आज्ञाकारिता में सिर झुकाने वाले, उसकी इबादत करने वाले।
  • الْقَاسِطُونَ: जो सत्य मार्ग से भटक गए, अत्याचारी और अन्यायी।
  • تَحَرَّوْا: उन्होंने जान-बूझकर खोजा, इरादा किया और चुना।
  • رَشَدًا: भलाई, सीधा मार्ग और मार्गदर्शन।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में जिन्नात की उस टोली का ज़िक्र है जिसने नबी करीम ﷺ की तिलावत सुनी और ईमान ले आया। वे कह रहे हैं कि हम में से कुछ लोग मुसलमान हैं, यानी अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाने वाले और उसकी इबादत में लगे हुए हैं, और हम में से कुछ क़ासितून हैं, यानी सत्य से भटके हुए, जिन्होंने अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराया और रास्ते से हट गए।

फिर अल्लाह तआला ने इसका नतीजा बयान किया कि जिसने भी इस्लाम क़बूल किया और अल्लाह की आज्ञाकारिता को अपनाया, उसने जान-बूझकर सीधे रास्ते को चुना और अपने लिए भलाई और हिदायत का दरवाज़ा खोल लिया। ऐसे लोगों ने अपनी समझ और इरादे से सही रास्ते की तलाश की, और अल्लाह ने उन्हें उस तक पहुँचा दिया।

यह आयत हमें सिखाती है कि हर इंसान के सामने दो रास्ते हैं: एक इस्लाम और आज्ञाकारिता का, और दूसरा ज़ुल्म और भटकाव का। जो कोई भी सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ लौटता है और उसके दीन को अपनाता है, वह अपने लिए सबसे बेहतरीन चीज़ चुनता है। यह चुनाव उसकी अपनी भलाई के लिए है, क्योंकि हिदायत और सीधा रास्ता ही असली कामयाबी है।

प्यारे भाइयों और बहनों! याद रखें, अल्लाह ने हमें अक़्ल और समझ दी है ताकि हम सही और गलत में फ़र्क कर सकें। जो लोग इस्लाम की रोशनी को अपनाते हैं, वे दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब होते हैं। और जो इससे मुँह मोड़ते हैं, वे अपना ही नुक़सान करते हैं। अल्लाह तआला हम सबको सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 12-16 — सूरा अल-जिन्न

12وَأَنَّا ظَنَنَّا أَن لَّن نُّعْجِزَ اللَّهَ فِي الْأَرْضِ وَلَن نُّعْجِزَهُ هَرَبًا
और ये कि हम समझते थे कि हम ज़मीन में (रह कर) ख़ुदा को हरगिज़ हरा नहीं सकते हैं और न भाग कर उसको आजिज़ कर सकते हैं
13وَأَنَّا لَمَّا سَمِعْنَا الْهُدَىٰ آمَنَّا بِهِ ۖ فَمَن يُؤْمِن بِرَبِّهِ فَلَا يَخَافُ بَخْسًا وَلَا رَهَقًا
और ये कि जब हमने हिदायत (की किताब) सुनी तो उन पर ईमान लाए तो जो शख़्श अपने परवरदिगार पर ईमान लाएगा तो उसको न नुक़सान का ख़ौफ़ है और न ज़ुल्म का
14وَأَنَّا مِنَّا الْمُسْلِمُونَ وَمِنَّا الْقَاسِطُونَ ۖ فَمَنْ أَسْلَمَ فَأُولَٰئِكَ تَحَرَّوْا رَشَدًا
और ये कि हम में से कुछ लोग तो फ़रमाबरदार हैं और कुछ लोग नाफ़रमान तो जो लोग फ़रमाबरदार हैं तो वह सीधे रास्ते पर चलें और रहें
15وَأَمَّا الْقَاسِطُونَ فَكَانُوا لِجَهَنَّمَ حَطَبًا
नाफरमान तो वह जहन्नुम के कुन्दे बने
16وَأَن لَّوِ اسْتَقَامُوا عَلَى الطَّرِيقَةِ لَأَسْقَيْنَاهُم مَّاءً غَدَقًا
और (ऐ रसूल तुम कह दो) कि अगर ये लोग सीधी राह पर क़ायम रहते तो हम ज़रूर उनको अलग़ारों पानी से सेराब करते
अल-जिन्नकुरान सूची
28आयत
मक्कीअवतरण स्थान
14आयत

अनुवाद — अल-जिन्न 14

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Monday, September 28, 2026

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