Awalaa yarawna annahum yuftanoona fee kulli `aamim marratan aw marrataini summa laa yatooboona wa laa hum yazzakkkaroon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
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کیا یہ دیکھتے نہیں کہ یہ ہر سال ایک یا دو بار بلا میں پھنسا دیئے جاتے ہیں پھر بھی توبہ نہیں کرتے اور نہ نصیحت پکڑتے ہیں
يُفْتَنُونَ: उन्हें परीक्षा में डाला जाता है, उन्हें सताया जाता है, या उनकी परीक्षा ली जाती है।
يَذَّكَّرُونَ: वे सीख लेते हैं, नसीहत पकड़ते हैं, या याद दिलाए जाने पर ध्यान देते हैं।
तफसीर (व्याख्या):
क्या ये मुनाफ़िक़ (दिखावटी मुसलमान) यह नहीं देखते कि उन्हें हर साल एक या दो बार परीक्षा में डाला जाता है? अल्लाह उन्हें कभी अकाल और तंगी के ज़रिए, कभी बीमारी के ज़रिए, और कभी उनके छिपे हुए नफ़ाक़ (पाखंड) को उजागर करके आज़माता है। यह सब इसलिए होता है ताकि उनका असली चेहरा लोगों के सामने आ जाए और वे अपनी गलतियों से सबक़ सीखें। लेकिन इन सबके बावजूद, वे न तो अपने कुफ़्र और नफ़ाक़ से तौबा करते हैं, और न ही इन आज़माइशों से कोई सबक़ सीखते हैं। वे हर बार परीक्षा में असफल होते हैं, फिर भी उनके दिल सख्त बने रहते हैं और वे अल्लाह की निशानियों से आँखें बंद किए रहते हैं। यह उनकी हालत की बड़ी तरस खाने वाली बात है कि अल्लाह उन्हें बार-बार मौक़ा देता है, लेकिन वे हर बार उसे ठुकरा देते हैं।
फ़ायदे (सीख):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह अपने बंदों को मुसीबतों और परीक्षाओं के ज़रिए जगाता है, ताकि वे अपनी गलतियों से बाज़ आएं। यह अल्लाह की रहमत है कि वह हमें सज़ा देने से पहले आगाह करता है।
हर मुसीबत या परेशानी में एक सबक़ छिपा होता है। अगर हम उस पर ग़ौर करें, तो यह हमारे लिए आध्यात्मिक तरक़्क़ी का ज़रिया बन सकती है।
तौबा (पश्चाताप) का दरवाज़ा हमेशा खुला है। चाहे हम कितनी भी गलतियाँ कर लें, अल्लाह हमें मौक़ा देता है कि हम उसकी ओर लौटें। यह हमारे लिए उम्मीद की बड़ी ख़बर है।
यह आयत हमें दिखाती है कि अल्लाह अपने बंदों पर कितना मेहरबान है—वह उन्हें बार-बार आज़माता है ताकि वे सीधे रास्ते पर आएं, लेकिन अगर वे नहीं सीखते, तो यह उनकी अपनी बदकिस्मती है।
एक मोमिन को चाहिए कि वह हर हालत में अल्लाह की तरफ़ ध्यान दे और अपनी ज़िंदगी के हर पहलू में उसकी रहनुमाई तलाश करे, ताकि वह उन लोगों में से न हो जो नसीहत के बावजूद बेख़बर रहते हैं।
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से (एक दूसरे से) पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहां उसकी ख़ुशियाँ मनाते है
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा (और ये कहकर कि) तुम को कोई मुसलमान देखता तो नहीं है फिर (अपने घर) पलट जाते हैं (ये लोग क्या पलटेगें गोया) ख़ुदा ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
लोगों तुम ही में से (हमारा) एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका (जिसकी शफ़क्क़त (मेहरबानी) की ये हालत है कि) उस पर शाक़ (दुख) है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी बेहूदी का हौका है ईमानदारो पर हद दर्जे रफ़ीक़ मेहरबान हैं
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