अत-तौबा · 125/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَىٰ رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ ۝١٢٥
Wa ammal lazeena fee quloobihim maradun fazaadat hum rijsan ilaa rijsihim wa maatoo wa hum kaafiroon
📖 हिंदी अर्थ
मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है तो उन (पिछली) ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ़्र ही की हालत में मर गए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • मरज़ (मर्ज़): दिल का रोग, अर्थात् निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी) और शक।
  • रिज्स: गंदगी, अशुद्धि, कुफ़्र और निफ़ाक़ की अधिकता।
  • मातू: वे मर गए।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जिन लोगों के दिलों में निफ़ाक़ और शक की बीमारी है, उनके लिए क़ुरआन की आयतों का उतरना हिदायत का ज़रिया नहीं बनता, बल्कि उल्टा उनकी बीमारी को और बढ़ा देता है। जब भी कोई सूरत या आयत उतरती है, तो वे उसे झुठलाते हैं, उस पर शक करते हैं और उसका मज़ाक उड़ाते हैं। इस तरह हर नई आयत के साथ उनके दिल में कुफ़्र और निफ़ाक़ की गंदगी और बढ़ जाती है, और वे अपनी पिछली गंदगी के साथ और अधिक गंदे हो जाते हैं। यह हालत उन पर इस क़दर हावी हो जाती है कि आख़िरकार वे इसी कुफ़्र और इन्कार की हालत में मर जाते हैं। यानी उनका अंजाम कुफ़्र पर मौत है, और उनके लिए कोई नजात नहीं।

यह आयत बताती है कि क़ुरआन हिदायत और शिफ़ा का ज़रिया है, लेकिन यह उन्हीं के लिए है जिनके दिल साफ़ हों और वे सच्चाई को क़बूल करने के लिए तैयार हों। जिनके दिल बीमार हैं, वे इससे और बीमार हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे एक ही दवा किसी के लिए शिफ़ा बनती है और किसी के लिए ज़हर।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि दिल की पवित्रता और सच्चाई की तलब ही असल चीज़ है। जो इंसान सच्चाई को मानने की नीयत रखता है, क़ुरआन उसके लिए रहनुमा बनता है, और जो अहंकार और हठधर्मी पर अड़ा रहता है, उसके लिए हिदायत का दरवाज़ा बंद हो जाता है।
  2. हमें अपने दिलों को निफ़ाक़, हसद और शक से पाक रखना चाहिए, क्योंकि ये बीमारियाँ इंसान को सच्चाई से दूर कर देती हैं और आख़िर में उसे बर्बाद कर देती हैं।
  3. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की किताब को सिर्फ़ पढ़ना काफ़ी नहीं, बल्कि उसे दिल से क़बूल करना और उस पर अमल करना ज़रूरी है। क़ुरआन से दूर रहने वाला इंसान धीरे-धीरे अपने दिल की सफ़ाई खो देता है।
  4. इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हम अपनी ज़िंदगी में किस हालत पर मर रहे हैं, यह सबसे अहम सवाल है। हमें चाहिए कि हम ईमान और नेक अमल पर साबित-क़दम रहें, ताकि हमारा अंजाम कुफ़्र और इन्कार पर मौत न हो, बल्कि ईमान और अल्लाह की रहमत पर हो।


📜 आयत 123-127 — अत-तौबा

123يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قَاتِلُوا الَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ الْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا فِيكُمْ غِلْظَةً ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ
ऐ ईमानदारों कुफ्फार में से जो लोग तुम्हारे आस पास के है उन से लड़ों और (इस तरह लड़ना) चाहिए कि वह लोग तुम में करारापन महसूस करें और जान रखो कि बेशुबहा ख़ुदा परहेज़गारों के साथ है
124وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ فَمِنْهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمْ زَادَتْهُ هَٰذِهِ إِيمَانًا ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا فَزَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से (एक दूसरे से) पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहां उसकी ख़ुशियाँ मनाते है
125وَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَىٰ رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ
मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है तो उन (पिछली) ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ़्र ही की हालत में मर गए
126أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٍ مَّرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
127وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ نَّظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ هَلْ يَرَاكُم مِّنْ أَحَدٍ ثُمَّ انصَرَفُوا ۚ صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा (और ये कहकर कि) तुम को कोई मुसलमान देखता तो नहीं है फिर (अपने घर) पलट जाते हैं (ये लोग क्या पलटेगें गोया) ख़ुदा ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
अत-तौबाकुरान सूची
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अनुवाद — अत-तौबा 125

सूरा अत-तौबा आयत 125 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है…

सूरा आयत 125/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 123–127. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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