Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- मरज़ (मर्ज़): दिल का रोग, अर्थात् निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी) और शक।
- रिज्स: गंदगी, अशुद्धि, कुफ़्र और निफ़ाक़ की अधिकता।
- मातू: वे मर गए।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जिन लोगों के दिलों में निफ़ाक़ और शक की बीमारी है, उनके लिए क़ुरआन की आयतों का उतरना हिदायत का ज़रिया नहीं बनता, बल्कि उल्टा उनकी बीमारी को और बढ़ा देता है। जब भी कोई सूरत या आयत उतरती है, तो वे उसे झुठलाते हैं, उस पर शक करते हैं और उसका मज़ाक उड़ाते हैं। इस तरह हर नई आयत के साथ उनके दिल में कुफ़्र और निफ़ाक़ की गंदगी और बढ़ जाती है, और वे अपनी पिछली गंदगी के साथ और अधिक गंदे हो जाते हैं। यह हालत उन पर इस क़दर हावी हो जाती है कि आख़िरकार वे इसी कुफ़्र और इन्कार की हालत में मर जाते हैं। यानी उनका अंजाम कुफ़्र पर मौत है, और उनके लिए कोई नजात नहीं।
यह आयत बताती है कि क़ुरआन हिदायत और शिफ़ा का ज़रिया है, लेकिन यह उन्हीं के लिए है जिनके दिल साफ़ हों और वे सच्चाई को क़बूल करने के लिए तैयार हों। जिनके दिल बीमार हैं, वे इससे और बीमार हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे एक ही दवा किसी के लिए शिफ़ा बनती है और किसी के लिए ज़हर।
फ़ायदे (उपदेश):
- यह आयत हमें सिखाती है कि दिल की पवित्रता और सच्चाई की तलब ही असल चीज़ है। जो इंसान सच्चाई को मानने की नीयत रखता है, क़ुरआन उसके लिए रहनुमा बनता है, और जो अहंकार और हठधर्मी पर अड़ा रहता है, उसके लिए हिदायत का दरवाज़ा बंद हो जाता है।
- हमें अपने दिलों को निफ़ाक़, हसद और शक से पाक रखना चाहिए, क्योंकि ये बीमारियाँ इंसान को सच्चाई से दूर कर देती हैं और आख़िर में उसे बर्बाद कर देती हैं।
- यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की किताब को सिर्फ़ पढ़ना काफ़ी नहीं, बल्कि उसे दिल से क़बूल करना और उस पर अमल करना ज़रूरी है। क़ुरआन से दूर रहने वाला इंसान धीरे-धीरे अपने दिल की सफ़ाई खो देता है।
- इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हम अपनी ज़िंदगी में किस हालत पर मर रहे हैं, यह सबसे अहम सवाल है। हमें चाहिए कि हम ईमान और नेक अमल पर साबित-क़दम रहें, ताकि हमारा अंजाम कुफ़्र और इन्कार पर मौत न हो, बल्कि ईमान और अल्लाह की रहमत पर हो।
📜 आयत 123-127 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 125
सूरा अत-तौबा आयत 125 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है…सूरा आयत 125/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 123–127. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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