और ये लोग उन बाग़ों में हमेशा अब्दआलाबाद (हमेशा हमेशा) तक रहेंगे बेशक ख़ुदा के पास तो बड़ा बड़ा अज्र व (सवाब) है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
خَالِدِينَ: सदैव रहने वाले, हमेशा के लिए ठहरने वाले।
أَبَدًا: हमेशा, अनंत काल तक, जिसका कोई अंत न हो।
أَجْرٌ عَظِيمٌ: बहुत बड़ा प्रतिफल, अपार इनाम।
व्याख्या:
यह आयत उन ईमानवालों के उस सुखद परिणाम का वर्णन कर रही है जो अपने जीवन में ईमान और सत्कर्मों पर स्थिर रहे। वे उन जन्नतों में सदैव रहेंगे—ऐसा ठहराव जिसका कोई अंत नहीं, कोई समाप्ति नहीं। उनकी यह अमर जीवन और निरंतर आनंद की स्थिति उनके उन अच्छे कर्मों का प्रतिफल है जो उन्होंने दुनिया की ज़िंदगी में अल्लाह के आदेशों का पालन करते हुए और उसकी मनाही से बचते हुए किए। अल्लाह ने उन्हें यह सम्मान इसलिए दिया कि उन्होंने अपने रब के सामने पूर्ण आज्ञाकारिता और ईमानदारी का प्रदर्शन किया।
फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है कि उसके पास उन लोगों के लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है जो उस पर ईमान लाए और अच्छे कर्म करते रहे। यह प्रतिफल केवल दुनिया तक सीमित नहीं, बल्कि आख़िरत में उन्हें वह मिलेगा जो किसी आँख ने नहीं देखा, किसी कान ने नहीं सुना और किसी दिल ने नहीं सोचा। यह अल्लाह की ओर से एक ऐसा उपहार है जो उसकी असीम दया और उदारता का प्रमाण है। इस आयत में "ख़ालिदीन" और "अबदन" दोनों शब्दों से ख़ुलूद (हमेशा रहने) को पुख़्ता किया गया है, ताकि कोई यह न समझे कि यह ठहराव सीमित है—बल्कि यह अनंत और अटल है।
फ़ायदे:
इस आयत से मुसलमान को यह बात समझनी चाहिए कि दुनिया की ज़िंदगी के छोटे-से कर्मों का अंजाम आख़िरत में कितना बड़ा और अनंत हो सकता है। यह ईमानवाले के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है कि वह अपने अच्छे कामों में कभी ढील न करे।
अल्लाह का वादा सच्चा है—उसने जो वादा किया है वह अवश्य पूरा होगा। इससे दिल को सुकून मिलता है कि हमारी मेहनत और अच्छे कर्म कभी बेकार नहीं जाते।
यह आयत हमें सिखाती है कि असली सफलता दुनिया के अस्थायी सुखों में नहीं, बल्कि उस स्थायी जीवन में है जो अल्लाह ने अपने नेक बंदों के लिए तैयार किया है। इसलिए हमें अपनी प्राथमिकताएँ सही रखनी चाहिए।
अल्लाह की रहमत और उसका इनाम इतना विशाल है कि उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यह बात मुसलमान के दिल में अल्लाह के प्रति मोहब्बत और उसकी इबादत में लगन पैदा करती है।
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और (ख़ुदा के लिए) हिजरत एख्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद किया वह लोग ख़ुदा के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग (आला दर्जे पर) फायज़ होने वाले हैं
ऐ ईमानदारों अगर तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे (बहन) भाई ईमान के मुक़ाबले कुफ़्र को तरजीह देते हो तो तुम उनको (अपना) ख़ैर ख्वाह (हमदर्द) न समझो और तुममें जो शख़्स उनसे उलफ़त रखेगा तो यही लोग ज़ालिम है
(ऐ रसूल) तुम कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें ख़ुदा से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि ख़ुदा अपना हुक्म (अज़ाब) मौजूद करे और ख़ुदा नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
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