अत-तौबा · 84/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ ۝٨٤
Wa laa tusalli `alaaa ahadim minhum maata abadanw wa laa taqum `alaa qabriheee innahum kafaroo billaahi wa Rasoolihee wa maatoo wa hum faasiqoon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खडे होना इन लोगों ने यक़ीनन ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَلا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا: और तुम उनमें से किसी भी मृत व्यक्ति पर कभी भी (जनाज़े की) नमाज़ न पढ़ो।
  • وَلا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ: और न उसकी क़ब्र पर (दफ़न के समय या दुआ के लिए) खड़े होओ।
  • فَاسِقُونَ: अवज्ञाकारी, आज्ञा से निकल जाने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे पैगंबर! आप उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) में से किसी की भी मृत्यु पर कभी जनाज़े की नमाज़ न पढ़ें, और न ही उसकी क़ब्र के पास खड़े होकर उसके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें। यह आदेश उन लोगों के बारे में है जिनका निफ़ाक़ (पाखंड) स्पष्ट रूप से जान लिया गया हो। इसका कारण यह है कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के साथ कुफ़्र किया और इसी हालत में दुनिया से गए, जबकि वे अल्लाह की आज्ञा से निकले हुए (फ़ासिक़) थे। जो व्यक्ति इस हालत पर मरे, उसके लिए नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना और उसकी क़ब्र पर खड़े होकर दुआ करना उचित नहीं, क्योंकि यह उसके कुफ़्र और निफ़ाक़ की माफ़ी की दुआ के समान है, जबकि अल्लाह ने उनके कुफ़्र को स्पष्ट कर दिया है। यह एक सामान्य नियम है कि जिसकी मृत्यु कुफ़्र और निफ़ाक़ पर साबित हो, उसके लिए ये कार्य नहीं किए जाने चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ ने इस आदेश के बाद किसी भी मुनाफ़िक़ पर जनाज़े की नमाज़ नहीं पढ़ी और न ही उसकी क़ब्र पर खड़े हुए, यहाँ तक कि आपकी वफ़ात हो गई।


फ़ायदे (लाभ और सबक):

  1. वफ़ादारी और बराअत (बरी होने) का सबक: यह आयत सिखाती है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुहब्बत में किसी भी दुश्मन या मुनाफ़िक़ के साथ नरमी नहीं होनी चाहिए। जब अल्लाह ने किसी के कुफ़्र का फ़ैसला कर दिया, तो उसके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करना भी उचित नहीं।
  2. अक़ीदे की पवित्रता: यह सिखाती है कि मुसलमान को अपने अक़ीदे (विश्वास) में स्पष्ट और पुख़्ता होना चाहिए। किसी व्यक्ति की ज़ाहिरी मुसलमानी उसे मुनाफ़िक़ होने से नहीं बचा सकती, और अल्लाह के दुश्मनों के साथ मोहब्बत का इज़हार नहीं करना चाहिए।
  3. अल्लाह के हुक्म की पैरवी: रसूलुल्लाह ﷺ ने इस आदेश का पूर्ण रूप से पालन किया, जो हमारे लिए नमूना है कि अल्लाह के हुक्म को बिना किसी दबाव या रिश्तेदारी के मानना चाहिए, चाहे वह किसी भी व्यक्ति से संबंधित हो।
  4. इस्लाम में नमाज़-ए-जनाज़ा की अहमियत: यह आयत स्पष्ट करती है कि नमाज़-ए-जनाज़ा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि मृतक के लिए दुआ और उसके अक़ीदे की गवाही है। इसलिए यह केवल उन्हीं के लिए जायज़ है जो ईमान और इस्लाम पर मरे हों।
  5. मुनाफ़िक़ों से सावधानी: यह आयत मुनाफ़िक़ों के खतरे से आगाह करती है और सिखाती है कि उनके साथ व्यवहार में सावधानी बरती जाए, ताकि उनके कुप्रभाव से समाज और उम्मत महफ़ूज़ रहे।


📜 आयत 82-86 — अत-तौबा

82فَلْيَضْحَكُوا قَلِيلًا وَلْيَبْكُوا كَثِيرًا جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
अगर वह कुछ समझें जो कुछ वह किया करते थे उसके बदले उन्हें चाहिए कि वह बहुत कम हॅसें और बहुत रोएँ
83فَإِن رَّجَعَكَ اللَّهُ إِلَىٰ طَائِفَةٍ مِّنْهُمْ فَاسْتَأْذَنُوكَ لِلْخُرُوجِ فَقُل لَّن تَخْرُجُوا مَعِيَ أَبَدًا وَلَن تُقَاتِلُوا مَعِيَ عَدُوًّا ۖ إِنَّكُمْ رَضِيتُم بِالْقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةٍ فَاقْعُدُوا مَعَ الْخَالِفِينَ
तो (ऐ रसूल) अगर ख़ुदा तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ (जिहाद से सहीसालिम) वापस लाए फिर तुमसे (जिहाद के वास्ते) निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ (जिहाद के वास्ते) हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा (घर में) बैठे रहना पसन्द किया तो (अब भी) पीछे रह जाने वालों के साथ (घर में) बैठे रहो
84وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ
और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खडे होना इन लोगों ने यक़ीनन ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए
85وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَأَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ
और उनके माल और उनकी औलाद (की कसरत) तुम्हें ताज्जुब (हैरत) में न डाले (क्योकि) ख़ुदा तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक्त भी ये काफ़िर (के काफ़िर ही) रहें
86وَإِذَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ آمِنُوا بِاللَّهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَأْذَنَكَ أُولُو الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُن مَّعَ الْقَاعِدِينَ
और जब कोई सूरा इस बारे में नाज़िल हुआ कि ख़ुदा को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें (यहीं छोड़ दीजिए) कि हम भी (घर बैठने वालो के साथ (बैठे) रहें
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अनुवाद — अत-तौबा 84

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Tuesday, August 18, 2026

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