अत-तौबा · 85/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَأَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ ۝٨٥
Wa laa tu`jibka amwaa luhum wa awlaaduhum; innamaa yureedul laahu ai yu`az zibahum bihaa fid dunyaa wa tazhaqa anfusuhum wa hum kaafiroon
📖 हिंदी अर्थ
और उनके माल और उनकी औलाद (की कसरत) तुम्हें ताज्जुब (हैरत) में न डाले (क्योकि) ख़ुदा तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक्त भी ये काफ़िर (के काफ़िर ही) रहें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُعْجِبْكَ — तुझे आश्चर्य में डाल दे, तुझे लुभा ले।
  • تَزْهَقَ — निकल जाएँ, प्राण निकल जाएँ।

व्याख्या:

ऐ नबी! इन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के धन-दौलत और औलाद को देखकर तू आश्चर्य में न पड़, और न ही उनकी ये चीज़ें तुझे लुभाएँ। ये चीज़ें उनके लिए कोई सम्मान या भलाई नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की ओर से उनके लिए एक छिपी हुई सज़ा का ज़रिया हैं। अल्लाह चाहता है कि इन्हीं चीज़ों के ज़रिए उन्हें दुनिया में सज़ा दे — यानी वे इन्हीं के पीछे भागते-भागते मुश्किलों, परेशानियों, मेहनत और मसीबतों में फँसे रहें, और इन्हीं के कारण उन्हें तरह-तरह के दुख और कष्ट झेलने पड़ें। यहाँ तक कि उनकी जानें भी इसी हालत में निकलें कि वे कुफ़्र (अल्लाह और उसके रसूल का इनकार) पर ही मरे रहें। इस तरह उनका धन और औलाद दुनिया में भी उनके लिए अज़ाब का सबब बनता है, और आख़िरत में भी वे कुफ़्र की हालत में मरने के कारण सख्त अज़ाब के हक़दार बनते हैं।

फ़ायदे और सबक़:

  1. धन और औलाद का होना किसी की इज़्ज़त या अल्लाह की मुहब्बत की निशानी नहीं है। अल्लाह किसी को दुनिया की चीज़ें देकर उसे आज़मा रहा होता है, और कभी ये चीज़ें उसके लिए सज़ा का ज़रिया बन जाती हैं।
  2. मोमिन (सच्चे ईमान वाले) को दुनिया की चमक-दमक और काफ़िरों की तरक्की देखकर रश्क (ईर्ष्या) नहीं करना चाहिए। ये चीज़ें उनके लिए अज़ाब का सामान हैं, न कि इज़्ज़त का।
  3. अल्लाह की राह में दी गई मुसीबतें और परेशानियाँ सच्चे मोमिन के लिए रहमत हैं, जबकि काफ़िरों के लिए उनकी दुनियावी चीज़ें ही अज़ाब का सबब बनती हैं।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने दिल को दुनिया की चीज़ों से नहीं लगाना चाहिए, बल्कि अल्लाह की रज़ा और उसकी मुहब्बत को सबसे बड़ी दौलत समझना चाहिए। जो शख्स अल्लाह की राह पर चलता है, उसकी ज़िंदगी और मौत दोनों बरकत वाली होती है।
  5. सबसे बड़ी सफलता यह है कि इंसान ईमान की हालत में जिए और ईमान की हालत में ही मरे। धन-दौलत और औलाद की कसरत उस शख्स के काम नहीं आएगी जो कुफ़्र और नाफ़रमानी की हालत में दुनिया से जाएगा।


📜 आयत 83-87 — अत-तौबा

83فَإِن رَّجَعَكَ اللَّهُ إِلَىٰ طَائِفَةٍ مِّنْهُمْ فَاسْتَأْذَنُوكَ لِلْخُرُوجِ فَقُل لَّن تَخْرُجُوا مَعِيَ أَبَدًا وَلَن تُقَاتِلُوا مَعِيَ عَدُوًّا ۖ إِنَّكُمْ رَضِيتُم بِالْقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةٍ فَاقْعُدُوا مَعَ الْخَالِفِينَ
तो (ऐ रसूल) अगर ख़ुदा तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ (जिहाद से सहीसालिम) वापस लाए फिर तुमसे (जिहाद के वास्ते) निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ (जिहाद के वास्ते) हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा (घर में) बैठे रहना पसन्द किया तो (अब भी) पीछे रह जाने वालों के साथ (घर में) बैठे रहो
84وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ
और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खडे होना इन लोगों ने यक़ीनन ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए
85وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَأَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ
और उनके माल और उनकी औलाद (की कसरत) तुम्हें ताज्जुब (हैरत) में न डाले (क्योकि) ख़ुदा तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक्त भी ये काफ़िर (के काफ़िर ही) रहें
86وَإِذَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ آمِنُوا بِاللَّهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَأْذَنَكَ أُولُو الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُن مَّعَ الْقَاعِدِينَ
और जब कोई सूरा इस बारे में नाज़िल हुआ कि ख़ुदा को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें (यहीं छोड़ दीजिए) कि हम भी (घर बैठने वालो के साथ (बैठे) रहें
87رَضُوا بِأَن يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ
ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों (औरतों, बच्चों, बीमारो के साथ बैठे) रहें और (गोया) उनके दिल पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें
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अनुवाद — अत-तौबा 85

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Tuesday, August 18, 2026

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