Wa maa takoonu fee shaaninw wa maa tatloo minhu min quraaninw wa laa ta`maloona min `amalin illaa kunnaa `alaikum shuhoodan iz tufeedoona feeh; wa maa ya`zubu `ar Rabbika mim mis qaali zarratin fil ardi wa laa fis samaaa`i wa laaa asghara min zaalika wa laaa akbara illaa fee Kitaabim Mubeen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(और ऐ रसूल) तुम (चाहे) किसी हाल में हो और क़ुरान की कोई सी भी आयत तिलावत करते हो और (लोगों) तुम कोई सा भी अमल कर रहे हो हम (हम सर वक़त) जब तुम उस काम में मशग़ूल होते हो तुम को देखते रहते हैं और तुम्हारे परवरदिगार से ज़र्रा भी कोई चीज़ ग़ायब नहीं रह सकती न ज़मीन में और न आसमान में और न कोई चीज़ ज़र्रे से छोटी है और न उससे बढ़ी चीज़ मगर वह रौशन किताब लौहे महफूज़ में ज़रुर है
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اور تم جس حال میں ہوتے ہو یا قرآن میں کچھ پڑھتے ہو یا تم لوگ کوئی (اور) کام کرتے ہو جب اس میں مصروف ہوتے ہو ہم تمہارے سامنے ہوتے ہیں اور تمہارے پروردگار سے ذرہ برابر بھی کوئی چیز پوشیدہ نہیں ہے نہ زمین میں نہ آسمان میں اور نہ کوئی چیز اس سے چھوٹی ہے یا بڑی مگر کتاب روشن میں (لکھی ہوئی) ہے
(और ऐ रसूल) तुम (चाहे) किसी हाल में हो और क़ुरान की कोई सी भी आयत तिलावत करते हो और (लोगों) तुम कोई सा भी अमल कर रहे हो हम (हम सर वक़त) जब तुम उस काम में मशग़ूल होते हो तुम को देखते रहते हैं और तुम्हारे परवरदिगार से ज़र्रा भी कोई चीज़ ग़ायब नहीं रह सकती न ज़मीन में और न आसमान में और न कोई चीज़ ज़र्रे से छोटी है और न उससे बढ़ी चीज़ मगर वह रौशन किताब लौहे महफूज़ में ज़रुर है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
شَأْنٍ: कार्य, मामला, उद्देश्य।
تَتْلُو: पढ़ना, पाठ करना।
شُهُودًا: गवाह, उपस्थित, देखने वाले।
تُفِيضُونَ: उसमें प्रवेश करना, डूब जाना, गहराई से लग जाना।
يَعْزُبُ: दूर होना, छिपा रहना, ओझल होना।
مِثْقَالِ ذَرَّةٍ: एक चींटी के बराबर वज़न, अत्यंत सूक्ष्म कण।
كِتَابٍ مُبِينٍ: स्पष्ट और खुली किताब, जिसका अर्थ यहाँ लौह-ए-महफ़ूज़ (सुरक्षित पट्टिका) है।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी! तुम जिस भी कार्य में लगे होते हो, और तुम जो भी क़ुरआन की आयतें पढ़ते हो, और (ऐ ईमानवालों!) तुम जो भी अच्छा या बुरा काम करते हो — वह सब हमारी निगरानी में होता है। जिस समय तुम उस काम में गहराई से प्रवेश करते हो और उसमें लग जाते हो, उसी समय हम तुम्हारे गवाह होते हैं, हम सब कुछ देखते और सुनते हैं। हम तुम्हारे हर अमल को अपने ज्ञान से घेरे हुए हैं और उसे अपने रिकॉर्ड में दर्ज करते हैं, ताकि उसका पूरा-पूरा बदला दिया जा सके।
और ऐ रसूल! तुम्हारे रब के ज्ञान से कोई चीज़ दूर नहीं है — न धरती में, न आसमान में। एक छोटी चींटी के बराबर वज़न भी उससे छिपा नहीं है, और न ही उससे छोटी कोई चीज़ और न ही उससे बड़ी कोई चीज़ — बल्कि यह सब कुछ एक स्पष्ट और खुली किताब (लौह-ए-महफ़ूज़) में लिखा हुआ है। उसके ज्ञान ने हर चीज़ को घेर रखा है और उसके लिखने का क़लम हर चीज़ को दर्ज कर चुका है।
फ़ायदे (उपदेश):
इस आयत से हमें यह विश्वास होता है कि अल्लाह हमारे हर काम, हर बात और हर हरकत को देख रहा है। यह एहसास इंसान को गुनाहों से रोकता है और नेक कामों की तरफ प्रेरित करता है, क्योंकि जब हमें पता हो कि हमारा रब हमें देख रहा है, तो हम उसकी नाराज़गी से बचने की कोशिश करते हैं।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह का ज्ञान असीमित है — वह हर छोटी-बड़ी चीज़ से वाकिफ है, यहाँ तक कि एक चींटी के कदम से भी। यह हमारे दिल में अल्लाह की अज़मत और क़ुदरत का एहसास पैदा करता है और हमें उसके सामने नम्र और विनम्र बनाता है।
इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि अल्लाह की किताब (लौह-ए-महफ़ूज़) में हर चीज़ का हिसाब दर्ज है। यह हमें यक़ीन दिलाता है कि क़यामत के दिन हमारे साथ कोई ज़ुल्म नहीं होगा, क्योंकि हर अच्छे और बुरे काम का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है। यह इंसान को ज़िम्मेदारी का एहसास कराता है और उसे अपने कर्मों के प्रति सचेत करता है।
यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह का दीन (इस्लाम) एक ऐसा दीन है जो इंसान को पूरी तरह से ज़िम्मेदार और जागरूक बनाता है। यहाँ कोई काम बेहिसाब नहीं है, और यही चीज़ इंसान को एक बेहतर इंसान बनाती है — जो अपने रब की निगरानी का एहसास रखते हुए जीवन गुज़ारता है।
और जो कुछ वह जमा कर रहे हैं उससे कहीं बेहतर है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम्हारा क्या ख्याल है कि ख़ुदा ने तुम पर रोज़ी नाज़िल की तो अब उसमें से बाज़ को हराम बाज़ को हलाल बनाने लगे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या ख़ुदा ने तुम्हें इजाज़त दी है या तुम ख़ुदा पर बोहतान बाँधते हो
और जो लोग ख़ुदा पर झूठ मूठ बोहतान बॉधा करते हैं रोजे क़यामत का क्या ख्याल करते हैं उसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा तो लोगों पर बड़ा फज़ल व (करम) है मगर उनमें से बहुतेरे शुक्र गुज़ार नहीं हैं
(और ऐ रसूल) तुम (चाहे) किसी हाल में हो और क़ुरान की कोई सी भी आयत तिलावत करते हो और (लोगों) तुम कोई सा भी अमल कर रहे हो हम (हम सर वक़त) जब तुम उस काम में मशग़ूल होते हो तुम को देखते रहते हैं और तुम्हारे परवरदिगार से ज़र्रा भी कोई चीज़ ग़ायब नहीं रह सकती न ज़मीन में और न आसमान में और न कोई चीज़ ज़र्रे से छोटी है और न उससे बढ़ी चीज़ मगर वह रौशन किताब लौहे महफूज़ में ज़रुर है
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