अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- ظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ: उन्होंने स्वयं अपनी आत्माओं पर अत्याचार किया (अर्थात अपने कुकर्मों से स्वयं को हानि पहुँचाई)।
- فَمَا أَغْنَتْ: तो कुछ भी काम न आई, न तो बचा सकी और न ही कोई लाभ पहुँचा सकी।
- تَتْبِيبٍ: विनाश, हानि, घाटा और तबाही।
व्याख्या:
अल्लाह तआला ने इन आयतों में उन ज़ालिम क़ौमों (आद, समूद आदि) की कहानी बयान की है जिन्हें उनके पैग़म्बरों ने सचेत किया, लेकिन उन्होंने इनकार किया और अंततः अल्लाह का अज़ाब आकर उन्हें घेर लिया। इस आयत में अल्लाह तआला स्पष्ट कर रहे हैं कि जब हमने उन क़ौमों को हलाक किया, तो यह हमारी ओर से कोई ज़ुल्म नहीं था, न ही हमने उनके साथ कोई अन्याय किया। बल्कि उन्होंने स्वयं अपनी आत्माओं पर ज़ुल्म किया — अपने शिर्क, कुफ्र और ज़मीन में फ़साद फैलाने के कारण उन्होंने स्वयं को विनाश के रास्ते पर डाल दिया।
जब अल्लाह का फ़ैसला (अज़ाब) आया, तो उनके वे माबूद जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते थे — चाहे वे मूर्तियाँ हों, पुजारी हों या कोई और — उनके किसी काम न आए। उन्होंने न तो उन्हें अज़ाब से बचाया और न ही उनकी कोई मदद कर सके। बल्कि उन माबूदों का उन्हें कोई फ़ायदा नहीं पहुँचा, उल्टे उनका नुक़सान ही बढ़ा — क्योंकि उनकी पूजा और उनसे उम्मीदें ही उनके विनाश और घाटे का कारण बनीं। यानी उन्होंने अपने झूठे माबूदों की वजह से न तो कोई भलाई पाई और न ही कोई सुरक्षा मिली, बल्कि केवल तबाही और हानि ही हाथ लगी।
शिक्षाएँ और लाभ:
- अल्लाह कभी ज़ुल्म नहीं करता — यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला अपने बंदों पर कभी अन्याय नहीं करता। जो भी सज़ा या परीक्षा आती है, वह बंदे के अपने कर्मों का परिणाम होती है। यह अल्लाह की पूर्ण न्यायप्रियता को दर्शाता है।
- स्वयं की ज़िम्मेदारी — इंसान अपने कर्मों के लिए स्वयं ज़िम्मेदार है। यदि वह गुमराही और पाप का रास्ता चुनता है, तो उसका अंजाम भुगतने के लिए वही ज़िम्मेदार होगा, न कि कोई और।
- झूठे सहारों की नाकामी — जो लोग अल्लाह को छोड़कर किसी और पर भरोसा करते हैं — चाहे वह मूर्तियाँ हों, इंसान हों, धन-दौलत हो या कोई और चीज़ — वे मुसीबत के समय कुछ भी काम नहीं आ सकते। सच्चा सहारा और मदद केवल अल्लाह ही है।
- शिर्क का अंजाम — शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को साझीदार बनाना) न केवल आत्मा पर ज़ुल्म है, बल्कि यह इंसान को विनाश और घाटे के अलावा कुछ नहीं देता। यह आयत हमें शिर्क से बचने और एकेश्वरवाद (तौहीद) पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।
- अल्लाह की रहमत का द्वार — यदि इंसान अपनी गलतियों से तौबा कर ले और अल्लाह की ओर लौट आए, तो अल्लाह क्षमा करने वाला और दयालु है। यह आयत हमें यह भी याद दिलाती है कि जब तक अल्लाह का फ़ैसला न आए, तौबा का दरवाज़ा खुला है।
- क़ुरआन की शिक्षा — यह आयत हमें सिखाती है कि क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उस पर अमल करने और उससे सीख लेने के लिए है। पिछली क़ौमों के हालात से हमें सबक़ लेना चाहिए ताकि हम उनकी गलतियों को न दोहराएँ।
📜 आयत 99-103 — हूद
अनुवाद — हूद 101
सूरा हूद आयत 101 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और हमने किसी तरह उन पर ज़ल्म नहीं किया बल्कि…सूरा आयत 101/123 — हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: हूद सुनें, हूद अनुवाद, हूद mp3, हूद pdf. आयत 99–103. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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