हूद · 101/123
अनुवाद उच्चारण — सूरा हूद
وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَٰكِن ظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ ۖ فَمَا أَغْنَتْ عَنْهُمْ آلِهَتُهُمُ الَّتِي يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مِن شَيْءٍ لَّمَّا جَاءَ أَمْرُ رَبِّكَ ۖ وَمَا زَادُوهُمْ غَيْرَ تَتْبِيبٍ ۝١٠١
Wa maa zalamnaahum wa laakin zalamooo anfusahum famaaa aghnat `anhum aalihatuhumul latee yad`oona min doonil laahi min shai`il lammaa jaaa`a amru Rabbika wa maa zaadoohum ghaira tatbeeb
📖 हिंदी अर्थ
और हमने किसी तरह उन पर ज़ल्म नहीं किया बल्कि उन लोगों ने आप अपने ऊपर (नाफरमानी करके) ज़ुल्म किया फिर जब तुम्हारे परवरदिगार का (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो न उसके वह माबूद ही काम आए जिन्हें ख़ुदा को छोड़कर पुकारा करते थें और न उन माबूदों ने हलाक करने के सिवा कुछ फायदा ही पहुँचाया बल्कि उन्हीं की परसतिश की बदौलत अज़ाब आया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ: उन्होंने स्वयं अपनी आत्माओं पर अत्याचार किया (अर्थात अपने कुकर्मों से स्वयं को हानि पहुँचाई)।
  • فَمَا أَغْنَتْ: तो कुछ भी काम न आई, न तो बचा सकी और न ही कोई लाभ पहुँचा सकी।
  • تَتْبِيبٍ: विनाश, हानि, घाटा और तबाही।

व्याख्या:

अल्लाह तआला ने इन आयतों में उन ज़ालिम क़ौमों (आद, समूद आदि) की कहानी बयान की है जिन्हें उनके पैग़म्बरों ने सचेत किया, लेकिन उन्होंने इनकार किया और अंततः अल्लाह का अज़ाब आकर उन्हें घेर लिया। इस आयत में अल्लाह तआला स्पष्ट कर रहे हैं कि जब हमने उन क़ौमों को हलाक किया, तो यह हमारी ओर से कोई ज़ुल्म नहीं था, न ही हमने उनके साथ कोई अन्याय किया। बल्कि उन्होंने स्वयं अपनी आत्माओं पर ज़ुल्म किया — अपने शिर्क, कुफ्र और ज़मीन में फ़साद फैलाने के कारण उन्होंने स्वयं को विनाश के रास्ते पर डाल दिया।

जब अल्लाह का फ़ैसला (अज़ाब) आया, तो उनके वे माबूद जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते थे — चाहे वे मूर्तियाँ हों, पुजारी हों या कोई और — उनके किसी काम न आए। उन्होंने न तो उन्हें अज़ाब से बचाया और न ही उनकी कोई मदद कर सके। बल्कि उन माबूदों का उन्हें कोई फ़ायदा नहीं पहुँचा, उल्टे उनका नुक़सान ही बढ़ा — क्योंकि उनकी पूजा और उनसे उम्मीदें ही उनके विनाश और घाटे का कारण बनीं। यानी उन्होंने अपने झूठे माबूदों की वजह से न तो कोई भलाई पाई और न ही कोई सुरक्षा मिली, बल्कि केवल तबाही और हानि ही हाथ लगी।


शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह कभी ज़ुल्म नहीं करता — यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला अपने बंदों पर कभी अन्याय नहीं करता। जो भी सज़ा या परीक्षा आती है, वह बंदे के अपने कर्मों का परिणाम होती है। यह अल्लाह की पूर्ण न्यायप्रियता को दर्शाता है।
  2. स्वयं की ज़िम्मेदारी — इंसान अपने कर्मों के लिए स्वयं ज़िम्मेदार है। यदि वह गुमराही और पाप का रास्ता चुनता है, तो उसका अंजाम भुगतने के लिए वही ज़िम्मेदार होगा, न कि कोई और।
  3. झूठे सहारों की नाकामी — जो लोग अल्लाह को छोड़कर किसी और पर भरोसा करते हैं — चाहे वह मूर्तियाँ हों, इंसान हों, धन-दौलत हो या कोई और चीज़ — वे मुसीबत के समय कुछ भी काम नहीं आ सकते। सच्चा सहारा और मदद केवल अल्लाह ही है।
  4. शिर्क का अंजाम — शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को साझीदार बनाना) न केवल आत्मा पर ज़ुल्म है, बल्कि यह इंसान को विनाश और घाटे के अलावा कुछ नहीं देता। यह आयत हमें शिर्क से बचने और एकेश्वरवाद (तौहीद) पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।
  5. अल्लाह की रहमत का द्वार — यदि इंसान अपनी गलतियों से तौबा कर ले और अल्लाह की ओर लौट आए, तो अल्लाह क्षमा करने वाला और दयालु है। यह आयत हमें यह भी याद दिलाती है कि जब तक अल्लाह का फ़ैसला न आए, तौबा का दरवाज़ा खुला है।
  6. क़ुरआन की शिक्षा — यह आयत हमें सिखाती है कि क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उस पर अमल करने और उससे सीख लेने के लिए है। पिछली क़ौमों के हालात से हमें सबक़ लेना चाहिए ताकि हम उनकी गलतियों को न दोहराएँ।


📜 आयत 99-103 — सूरा हूद

99وَأُتْبِعُوا فِي هَٰذِهِ لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ ۚ بِئْسَ الرِّفْدُ الْمَرْفُودُ
और (इस दुनिया) में भी लानत उनके पीछे पीछे लगा दी गई और क़यामत के दिन भी (लगी रहेगी) क्या बुरा इनाम है जो उन्हें मिला
100ذَٰلِكَ مِنْ أَنبَاءِ الْقُرَىٰ نَقُصُّهُ عَلَيْكَ ۖ مِنْهَا قَائِمٌ وَحَصِيدٌ
(ऐ रसूल) ये चन्द बस्तियों के हालात हैं जो हम तुम से बयान करते हैं उनमें से बाज़ तो (उस वक्त तक) क़ायम हैं और बाज़ का तहस नहस हो गया
101وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَٰكِن ظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ ۖ فَمَا أَغْنَتْ عَنْهُمْ آلِهَتُهُمُ الَّتِي يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مِن شَيْءٍ لَّمَّا جَاءَ أَمْرُ رَبِّكَ ۖ وَمَا زَادُوهُمْ غَيْرَ تَتْبِيبٍ
और हमने किसी तरह उन पर ज़ल्म नहीं किया बल्कि उन लोगों ने आप अपने ऊपर (नाफरमानी करके) ज़ुल्म किया फिर जब तुम्हारे परवरदिगार का (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो न उसके वह माबूद ही काम आए जिन्हें ख़ुदा को छोड़कर पुकारा करते थें और न उन माबूदों ने हलाक करने के सिवा कुछ फायदा ही पहुँचाया बल्कि उन्हीं की परसतिश की बदौलत अज़ाब आया
102وَكَذَٰلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَا أَخَذَ الْقُرَىٰ وَهِيَ ظَالِمَةٌ ۚ إِنَّ أَخْذَهُ أَلِيمٌ شَدِيدٌ
और (ऐ रसूल) बस्तियों के लोगों की सरकशी से जब तुम्हारा परवरदिगार अज़ाब में पकड़ता है तो उसकी पकड़ ऐसी ही होती है बेशक पकड़ तो दर्दनाक (और सख्त) होती है
103إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّمَنْ خَافَ عَذَابَ الْآخِرَةِ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمٌ مَّجْمُوعٌ لَّهُ النَّاسُ وَذَٰلِكَ يَوْمٌ مَّشْهُودٌ
इसमें तो शक़ नहीं कि उस शख़्श के वास्ते जो अज़ाब आख़िरत से डरता है (हमारी कुदरत की) एक निशानी है ये वह रोज़ होगा कि सारे (जहाँन) के लोग जमा किए जाएंगें और यही वह दिन होगा कि (हमारी बारगाह में) सब हाज़िर किए जाएंगें
हूदकुरान सूची
123आयत
मक्कीअवतरण स्थान
101आयत

अनुवाद — हूद 101

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Monday, September 28, 2026

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