हूद · 53/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالُوا يَا هُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍ وَمَا نَحْنُ بِتَارِكِي آلِهَتِنَا عَن قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ ۝٥٣
Qaaloo yaa Hoodu maa ji`tanaa bibaiyinatinw wa maa nahnu bitaarikeee aalihatinaa `an qawlika wa maa nahnu laka bimu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
वह लोग कहने लगे ऐ हूद तुम हमारे पास कोई दलील लेकर तो आए नहीं और तुम्हारे कहने से अपने ख़ुदाओं को तो छोड़ने वाले नहीं और न हम तुम पर ईमान लाने वाले हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بِبَيِّنَةٍ: स्पष्ट प्रमाण, कोई ऐसा चमत्कार या दलील जो आपके दावे की सच्चाई को साबित करे।
  • آلِهَتِنَا: हमारे पूज्य, हमारे देवता (जिन्हें वे पूजते थे)।
  • عَن قَوْلِكَ: आपके कहने की वजह से, आपके कहे जाने मात्र से।
  • بِمُؤْمِنِينَ: आप पर ईमान लाने वाले, आपको सच्चा मानने वाले।

तफसीर (व्याख्या):

जब हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम 'आद' को एक ईश्वर की इबादत की ओर बुलाया और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया, तो उनकी क़ौम ने जवाब में ये कठोर शब्द कहे। उन्होंने कहा: "ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई स्पष्ट निशानी या चमत्कार लेकर नहीं आए जो ये साबित करे कि तुम सच में अल्लाह के पैग़म्बर हो। और हम तुम्हारे सिर्फ़ कहने से अपने उन देवताओं को नहीं छोड़ सकते जिन्हें हम पूजते आ रहे हैं। और न ही हम तुम पर ईमान लाने वाले हैं।"

यानी उन्होंने तीन बातें कहीं: पहली, उन्होंने हूद (अलैहिस्सलाम) पर ये इल्ज़ाम लगाया कि वो कोई चमत्कार या ठोस सबूत नहीं लाए। दूसरी, उन्होंने साफ़ कहा कि हम अपने पूर्वजों के धर्म और अपने देवताओं को नहीं छोड़ेंगे, चाहे तुम कितना भी कहो। तीसरी, उन्होंने खुले तौर पर ईमान लाने से इनकार कर दिया। ये उनकी हठधर्मिता और अहंकार का सबूत था कि उन्होंने सच्चाई को जानने की कोशिश ही नहीं की, बल्कि पहले से ही इनकार का फ़ैसला कर लिया था। उनका ये रवैया अल्लाह की नेमतों से नाइंशुक्री और अपने पैग़म्बर के प्रति सख़्त अदब-ए-मुख़ालिफ़त (बदतमीज़ी) पर आधारित था।


फ़ायदे (सबक):

  1. सबूत की ज़िम्मेदारी: पैग़म्बरों की सच्चाई के लिए अल्लाह की तरफ़ से निशानियाँ और चमत्कार होते हैं, लेकिन जिन लोगों का मक़सद सच्चाई को न मानना होता है, वो कितने ही सबूत देख लें, फिर भी इनकार करते रहते हैं। इससे हमें सीख मिलती है कि हमारा दिल सच्चाई के लिए खुला होना चाहिए।
  2. अंधी परंपरा का ख़तरा: अपने पूर्वजों के रास्ते पर आँखें बंद करके चलना और सच्चाई को ठुकरा देना, इंसान को हलाकत की तरफ़ ले जाता है। हमें हमेशा सच्चाई को क़बूल करने के लिए तैयार रहना चाहिए, चाहे वो किसी भी तरफ़ से आए।
  3. नबी की सब्र और हिम्मत: हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम की इस सख़्त गुफ़्तगू के बावजूद उन्हें दावत देते रहे। ये हमें सिखाता है कि सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों को मुख़ालिफ़त और तंज़ का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।
  4. ईमान की अहमियत: ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि दिल का यक़ीन और अमल की पाबंदी है। जो लोग सच्चाई को सुनकर भी उस पर अमल नहीं करते, वो उन्हीं लोगों की तरह हैं जिन्होंने हूद (अलैहिस्सलाम) को झुठलाया और आख़िरकार अल्लाह के अज़ाब का शिकार हुए।


📜 आयत 51-55 — हूद

51يَا قَوْمِ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى الَّذِي فَطَرَنِي ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
ऐ मेरी क़ौम मै उस (समझाने पर तुमसे कुछ मज़दूरी नहीं मॉगता मेरी मज़दूरी तो बस उस शख़्श के ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते
52وَيَا قَوْمِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ يُرْسِلِ السَّمَاءَ عَلَيْكُم مِّدْرَارًا وَيَزِدْكُمْ قُوَّةً إِلَىٰ قُوَّتِكُمْ وَلَا تَتَوَلَّوْا مُجْرِمِينَ
और ऐ मेरी क़ौम अपने परवरदिगार से मग़फिरत की दुआ मॉगों फिर उसकी बारगाह में अपने (गुनाहों से) तौबा करो तो वह तुम पर मूसलाधार मेह आसमान से बरसाएगा ख़ुश्क साली न होगी और तुम्हारी क़ूवत (ताक़त) में और क़ूवत बढ़ा देगा और मुजरिम बन कर उससे मुँह न मोड़ों
53قَالُوا يَا هُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍ وَمَا نَحْنُ بِتَارِكِي آلِهَتِنَا عَن قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ
वह लोग कहने लगे ऐ हूद तुम हमारे पास कोई दलील लेकर तो आए नहीं और तुम्हारे कहने से अपने ख़ुदाओं को तो छोड़ने वाले नहीं और न हम तुम पर ईमान लाने वाले हैं
54إِن نَّقُولُ إِلَّا اعْتَرَاكَ بَعْضُ آلِهَتِنَا بِسُوءٍ ۗ قَالَ إِنِّي أُشْهِدُ اللَّهَ وَاشْهَدُوا أَنِّي بَرِيءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ
हम तो बस ये कहते हैं कि हमारे ख़ुदाओं में से किसने तुम्हें मजनून (दीवाना) बना दिया है (इसी वजह से तुम) बहकी बहकी बातें करते हो हूद ने जवाब दिया बेशक मै ख़ुदा को गवाह करता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि तुम ख़ुदा के सिवा (दूसरों को) उसका शरीक बनाते हो
55مِن دُونِهِ ۖ فَكِيدُونِي جَمِيعًا ثُمَّ لَا تُنظِرُونِ
इसमे मै बेज़ार हूँ तो तुम सब के सब मेरे साथ मक्कारी करो और मुझे (दम मारने की) मोहलत भी न दो तो मुझे परवाह नहीं
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अनुवाद — हूद 53

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Tuesday, August 18, 2026

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