Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- يَا صَاحِبَيِ السِّجْنِ: ऐ जेल के मेरे दोनों साथियों!
- أَرْبَابٌ مُتَفَرِّقُونَ: अलग-अलग कई स्वामी (पूज्य)।
- الْوَاحِدُ: एक, जिसका कोई साझी न हो।
- الْقَهَّارُ: सब पर ग़ालिब, जो हर चीज़ को अपने वश में करने वाला हो।
तफ़सीर (व्याख्या):
हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने जेल में अपने साथ रहने वाले दो युवकों को सम्बोधित करते हुए उन्हें एक ऐसे प्रश्न के माध्यम से सत्य की ओर बुलाया जो उनकी अक़्ल और फ़ितरत दोनों को झकझोर दे। उन्होंने कहा: “ऐ जेल के मेरे दोनों साथियों! क्या यह बेहतर है कि तुम कई अलग-अलग पूज्यों की इबादत करो — जो बिखरे हुए हों, एक-दूसरे से कोई नाता न रखते हों, न तो वे तुम्हें नुक़सान पहुँचा सकें और न ही फ़ायदा — या फिर उस एक अल्लाह की इबादत करो जो अकेला है, जिसका कोई शरीक नहीं, और जो अपनी क़ुदरत से हर चीज़ पर ग़ालिब है, सब कुछ उसी के आगे झुका हुआ है, और कोई भी उस पर ग़ालिब नहीं आ सकता?”
यह प्रश्न एक तर्कपूर्ण और स्पष्ट उपदेश था। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें समझाना चाहा कि जो पूज्य बिखरे हुए और असमर्थ हों, वे किसी भी दृष्टि से पूजा के योग्य नहीं हो सकते। सच्ची इबादत तो उसी एक सर्वशक्तिमान अल्लाह के लिए है, जो अपनी वहदानियत (एकता) और क़हर (प्रभुत्व) में अद्वितीय है। इस प्रकार उन्होंने उन्हें शिर्क से बचाकर तौहीद की ओर बुलाया, और यह भी बताया कि उनके पूर्वजों की मान्यताएँ — जो अलग-अलग देवताओं की पूजा पर आधारित थीं — निराधार थीं, क्योंकि सृष्टि का स्वामी और पालनहार केवल एक ही है।
फ़ायदे और सबक़:
- यह आयत हमें सिखाती है कि सत्य की ओर बुलाने का सबसे प्रभावी तरीक़ा नर्मी और तर्कपूर्ण प्रश्न है, जो सामने वाले की अक़्ल को मुख़ातिब करे।
- तौहीद (एकेश्वरवाद) ही इस्लाम की जड़ है — जितने भी पैग़म्बर आए, उनका मूल संदेश यही रहा कि इबादत केवल एक अल्लाह की हो।
- बिखरे हुए और असमर्थ “रब” (पूज्य) कभी भी उस एक सर्वशक्तिमान अल्लाह के मुक़ाबले में बेहतर नहीं हो सकते; यह एक सार्वभौमिक तर्क है जो हर युग में लोगों को शिर्क से बचाता है।
- मुसीबत और जेल जैसी कठिन परिस्थिति में भी दीन की दावत (प्रचार) नहीं छोड़नी चाहिए — यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने जेल में रहकर भी लोगों को सत्य का पाठ पढ़ाया।
- अल्लाह का नाम “الْقَهَّار” हमें याद दिलाता है कि हर ताक़तवर उसके आगे बेबस है, इसलिए हमें किसी इंसान या मख़लूक़ से नहीं, बल्कि सिर्फ़ उसी से डरना और उम्मीद रखनी चाहिए।
📜 आयत 37-41 — सूरा यूसुफ
अनुवाद — यूसुफ 39
सूरा यूसुफ आयत 39 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ऐ मेरे कैद ख़ाने के दोनो रफीक़ों (साथियों) (ज़रा ग़ौर…सूरा आयत 39/111 — सूरा यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूसुफ सुनें, सूरा यूसुफ अनुवाद, सूरा यूसुफ mp3, सूरा यूसुफ pdf. आयत 37–41. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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