यूसुफ · 38/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ آبَائِي إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ ۚ مَا كَانَ لَنَا أَن نُّشْرِكَ بِاللَّهِ مِن شَيْءٍ ۚ ذَٰلِكَ مِن فَضْلِ اللَّهِ عَلَيْنَا وَعَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ ۝٣٨
Wattab`tu millata aabaaa`eee Ibraaheema wa Ishaaqa wa Ya`qoob; maa kaana lanaaa an nushrika billaahi min shai` zaalikamin fadlil laahi `alainaa wa `alan naasi wa laakinna aksaran naasi laa yashkuroon
📖 हिंदी अर्थ
और मैं तो अपने बाप दादा इबराहीम व इसहाक़ व याक़ूब के मज़हब पर चलने वाला हूँ मुनासिब नहीं कि हम ख़ुदा के साथ किसी चीज़ को (उसका) शरीक बनाएँ ये भी ख़ुदा की एक बड़ी मेहरबानी है हम पर भी और तमाम लोगों पर मगर बहुतेरे लोग उसका शुक्रिया (भी) अदा नहीं करते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مِلَّةَ: धर्म, पद्धति, मार्ग।
  • آبَائِي: मेरे पूर्वज, बाप-दादा।
  • مَا كَانَ لَنَا: हमारे लिए उचित नहीं, हमें शोभा नहीं देता।
  • مِن شَيْءٍ: किसी भी प्रकार की (शिर्क)।
  • فَضْلِ اللَّهِ: अल्लाह की कृपा और अनुग्रह।

तफसीर (व्याख्या):

हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने उस समय यह बात कही जब वे मिस्र के अज़ीज़ (शासक) के दरबार में थे और वहाँ के लोगों ने उन्हें बड़ा पद दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि मैंने अपने पूर्वजों — इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब (अलैहिमुस्सलाम) — के धर्म का अनुसरण किया है, जो पूर्ण एकेश्वरवाद (तौहीद) का धर्म है। मैंने उन्हीं के मार्ग को अपनाया है, जो अल्लाह की इबादत में किसी को भी उसका साझी नहीं बनाता।

यह हमारे लिए कभी उचित नहीं था कि हम अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी ठहराएँ। यह बात हमारे परिवार की पहचान रही है — नबियों की संतान होने के नाते हम शिर्क से पाक और मासूम रहे हैं। यह तौहीद और ईमान, जो हमें प्राप्त है, अल्लाह की ओर से हम पर और सभी लोगों पर एक बड़ी कृपा है। उसने हमें यह मार्ग दिखाया और अपने नबियों के माध्यम से लोगों तक यही संदेश पहुँचाया। लेकिन अधिकांश लोग इस कृपा का शुक्र अदा नहीं करते — वे अल्लाह की नेमतों को भूल जाते हैं और उसकी इबादत के बजाय दूसरों की ओर मुड़ जाते हैं।


फ़ायदे (सबक):

  1. तौहीद ही सच्चा धर्म है: यह आयत सिखाती है कि अल्लाह की एकता (तौहीद) ही वह मूल सिद्धांत है जिस पर सभी नबियों का धर्म टिका है। इब्राहीम से लेकर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तक सभी नबियों का संदेश एक ही था — केवल अल्लाह की इबादत करो।
  2. नबियों की संतान होना गर्व की बात नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी है: हज़रत यूसुफ़ ने अपने पूर्वजों का ज़िक्र करके यह नहीं दिखाया कि हम बड़े ख़ानदान से हैं, बल्कि यह बताया कि हमारा परिवार हमेशा से शिर्क से दूर रहा है। यह हमें सिखाता है कि अच्छे ख़ानदान की पहचान अमल से होती है, सिर्फ़ नाम से नहीं।
  3. शुक्रगुज़ारी की कमी: अधिकांश लोग अल्लाह की नेमतों को भूल जाते हैं। यह आयत हमें याद दिलाती है कि ईमान और तौहीद की नेमत सबसे बड़ी नेमत है, और हमें इसका शुक्र अदा करना चाहिए — न केवल ज़ुबान से, बल्कि अमल से भी।
  4. हर हाल में अल्लाह पर भरोसा: जब हज़रत यूसुफ़ जेल से निकलकर शाही दरबार में पहुँचे, तब भी उन्होंने अपनी पहचान अल्लाह के धर्म से जोड़ी। यह सिखाता है कि कठिनाई और आसानी — हर हाल में हमें अपने ईमान पर क़ायम रहना चाहिए और उसे छिपाना नहीं चाहिए।
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📜 आयत 36-40 — यूसुफ

36وَدَخَلَ مَعَهُ السِّجْنَ فَتَيَانِ ۖ قَالَ أَحَدُهُمَا إِنِّي أَرَانِي أَعْصِرُ خَمْرًا ۖ وَقَالَ الْآخَرُ إِنِّي أَرَانِي أَحْمِلُ فَوْقَ رَأْسِي خُبْزًا تَأْكُلُ الطَّيْرُ مِنْهُ ۖ نَبِّئْنَا بِتَأْوِيلِهِ ۖ إِنَّا نَرَاكَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ
कि कुछ मियाद के लिए उनको क़ैद ही करे दें और यूसुफ के साथ और भी दो जवान आदमी (क़ैद ख़ाने) में दाख़िल हुए (चन्द दिन के बाद) उनमें से एक ने कहा कि मैने ख्वाब में देखा है कि मै (शराब बनाने के वास्ते अंगूर) निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहा (मै ने भी ख्वाब में) अपने को देखा कि मै अपने सर पर रोटिया उठाए हुए हूँ और चिड़ियाँ उसे खा रही हैं (यूसुफ) हमको उसकी ताबीर (मतलब) बताओ क्योंकि हम तुमको यक़ीनन नेकी कारों से समझते हैं
37قَالَ لَا يَأْتِيكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِهِ إِلَّا نَبَّأْتُكُمَا بِتَأْوِيلِهِ قَبْلَ أَن يَأْتِيَكُمَا ۚ ذَٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَنِي رَبِّي ۚ إِنِّي تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَهُم بِالْآخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ
यूसुफ ने कहा जो खाना तुम्हें (क़ैद ख़ाने से) दिया जाता है वह आने भी न पाएगा कि मै उसके तुम्हारे पास आने के क़ब्ल ही तुम्हे उसकी ताबीर बताऊँगा ये ताबीरे ख्वाब भी उन बातों के साथ है जो मेरे परवरदिगार ने मुझे तालीम फरमाई है मैं उन लोगों का मज़हब छोड़ बैठा हूँ जो ख़ुदा पर ईमान नहीं लाते और वह लोग आख़िरत के भी मुन्किर है
38وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ آبَائِي إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ ۚ مَا كَانَ لَنَا أَن نُّشْرِكَ بِاللَّهِ مِن شَيْءٍ ۚ ذَٰلِكَ مِن فَضْلِ اللَّهِ عَلَيْنَا وَعَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
और मैं तो अपने बाप दादा इबराहीम व इसहाक़ व याक़ूब के मज़हब पर चलने वाला हूँ मुनासिब नहीं कि हम ख़ुदा के साथ किसी चीज़ को (उसका) शरीक बनाएँ ये भी ख़ुदा की एक बड़ी मेहरबानी है हम पर भी और तमाम लोगों पर मगर बहुतेरे लोग उसका शुक्रिया (भी) अदा नहीं करते
39يَا صَاحِبَيِ السِّجْنِ أَأَرْبَابٌ مُّتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ أَمِ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
ऐ मेरे कैद ख़ाने के दोनो रफीक़ों (साथियों) (ज़रा ग़ौर तो करो कि) भला जुदा जुदा माबूद अच्छे या ख़ुदाए यकता ज़बरदस्त (अफसोस)
40مَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِهِ إِلَّا أَسْمَاءً سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَآبَاؤُكُم مَّا أَنزَلَ اللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَانٍ ۚ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۚ أَمَرَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
तुम लोग तो ख़ुदा को छोड़कर बस उन चन्द नामों ही को परसतिश करते हो जिन को तुमने और तुम्हारे बाप दादाओं ने गढ़ लिया है ख़ुदा ने उनके लिए कोई दलील नहीं नाज़िल की हुकूमत तो बस ख़ुदा ही के वास्ते ख़ास है उसने तो हुक्म दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो यही साीधा दीन है मगर (अफसोस) बहुतेरे लोग नहीं जानते हैं
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अनुवाद — यूसुफ 38

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Tuesday, August 18, 2026

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