यूसुफ · 57/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूसुफ
وَلَأَجْرُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ ۝٥٧
Wa la ajrul Aakhirati khairul lillazeena aamanoo wa kaanoo yattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग ईमान लाए और परहेज़गारी करते रहे उनके लिए आख़िरत का अज्र उसी से कही बेहतर है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَجْرُ الآخِرَةِ: आख़िरत का बदला और प्रतिफल, जो अल्लाह ने अपने नेक बंदों के लिए तैयार किया है।
  • خَيْرٌ: बेहतर, उत्तम और अधिक श्रेष्ठ।
  • يَتَّقُونَ: डरने वाले, अल्लाह के आदेशों का पालन करने वाले और उसकी मनाही से बचने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो लोग ईमान लाए और तक़वा (अल्लाह का डर) अपनाया, उनके लिए आख़िरत का बदला और इनाम दुनिया के किसी भी इनाम से कहीं बेहतर और श्रेष्ठ है। दुनिया का सुख-चैन, धन-दौलत और ऐशो-आराम चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह फ़ानी (नाशवान) है और एक दिन ख़त्म होने वाला है। लेकिन आख़िरत का अज्र वह है जो अल्लाह ने अपने मोमिन और मुत्तक़ी बंदों के लिए तैयार किया है — वह जन्नत है, जो हमेशा रहने वाली है, जिसकी नेअमतें कभी ख़त्म नहीं होतीं और जिसमें कोई कमी नहीं आती।

यहाँ "ईमान" से मुराद अल्लाह पर, उसके रसूल पर और उसकी लाई हुई हर चीज़ पर दिल से यक़ीन रखना है, और "तक़वा" से मुराद अल्लाह के हुक्मों को मानना और उसकी मनाही से बचना है। जो लोग इन दोनों सिफ़ात से मुत्तसिफ़ होंगे, उनके लिए आख़िरत का इनाम ही सबसे बड़ी कामयाबी है। यह बात हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के क़िस्से के सिलसिले में कही गई है, जब उन्होंने दुनिया के ऊँचे मक़ाम (मिस्र के ख़ज़ाने का मिनिस्टर बनने) को हासिल किया, तो अल्लाह ने यह बताया कि यह दुनिया का मक़ाम भले ही बड़ा है, लेकिन आख़िरत का अज्र उससे कहीं बढ़कर है।

फ़ायदे (सबक़):

  1. आख़िरत की तरजीह: यह आयत हमें सिखाती है कि मोमिन की नज़र हमेशा आख़िरत पर होनी चाहिए। दुनिया की चीज़ें भले ही आकर्षक लगें, लेकिन असली कामयाबी आख़िरत में है।
  2. ईमान और तक़वा का रिश्ता: ईमान और तक़वा दोनों साथ-साथ ज़रूरी हैं। सिर्फ़ ईमान का दावा काफ़ी नहीं, बल्कि अमल और अल्लाह से डरना भी ज़रूरी है।
  3. दुनिया की कमी: दुनिया की कोई भी नेअमत चाहे कितनी ही बड़ी हो, वह आख़िरत के इनाम के मुक़ाबले में बहुत छोटी है। इसलिए इंसान को दुनिया के लिए आख़िरत को नहीं बेचना चाहिए।
  4. सब्र और शुक्र: जब इंसान को दुनिया में कोई मक़ाम या नेअमत मिले, तो उसे घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि यह याद रखना चाहिए कि असली कामयाबी आख़िरत में है।
  5. अल्लाह का फ़ज़ल: यह आयत मोमिनों को उम्मीद देती है कि अल्लाह उनकी मेहनत और ईमान को बेकार नहीं जाने देगा, बल्कि उन्हें उसका पूरा बदला आख़िरत में देगा।


📜 आयत 55-59 — सूरा यूसुफ

55قَالَ اجْعَلْنِي عَلَىٰ خَزَائِنِ الْأَرْضِ ۖ إِنِّي حَفِيظٌ عَلِيمٌ
यूसुफ ने कहा (जब अपने मेरी क़दर की है तो) मुझे मुल्की ख़ज़ानों पर मुक़र्रर कीजिए क्योंकि मैं (उसका) अमानतदार ख़ज़ान्ची (और) उसके हिसाब व किताब से भी वाक़िफ हूँ
56وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْأَرْضِ يَتَبَوَّأُ مِنْهَا حَيْثُ يَشَاءُ ۚ نُصِيبُ بِرَحْمَتِنَا مَن نَّشَاءُ ۖ وَلَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ
(ग़रज़ यूसुफ शाही ख़ज़ानो के अफसर मुक़र्रर हुए) और हमने यूसुफ को युं मुल्क (मिस्र) पर क़ाबिज़ बना दिया कि उसमें जहाँ चाहें रहें हम जिस पर चाहते हैं अपना फज़ल करते हैं और हमने नेको कारो के अज्र को अकारत नहीं करते
57وَلَأَجْرُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ
और जो लोग ईमान लाए और परहेज़गारी करते रहे उनके लिए आख़िरत का अज्र उसी से कही बेहतर है
58وَجَاءَ إِخْوَةُ يُوسُفَ فَدَخَلُوا عَلَيْهِ فَعَرَفَهُمْ وَهُمْ لَهُ مُنكِرُونَ
(और चूंकि कनआन में भी कहत (सूखा) था इस वजह से) यूसुफ के (सौतेले भाई ग़ल्ला ख़रीदने को मिस्र में) आए और यूसुफ के पास गए तो उनको फौरन ही पहचान लिया और वह लोग उनको न पहचान सके
59وَلَمَّا جَهَّزَهُم بِجَهَازِهِمْ قَالَ ائْتُونِي بِأَخٍ لَّكُم مِّنْ أَبِيكُمْ ۚ أَلَا تَرَوْنَ أَنِّي أُوفِي الْكَيْلَ وَأَنَا خَيْرُ الْمُنزِلِينَ
और जब यूसुफ ने उनके (ग़ल्ले का) सामान दुरूस्त कर दिया और वह जाने लगे तो यूसुफ़ ने (उनसे कहा) कि (अबकी आना तो) अपने सौतेले भाई को (जिसे घर छोड़ आए हो) मेरे पास लेते आना क्या तुम नहीं देखते कि मै यक़ीनन नाप भी पूरी देता हूं और बहुत अच्छा मेहमान नवाज़ भी हूँ
यूसुफकुरान सूची
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57आयत

अनुवाद — यूसुफ 57

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Saturday, October 3, 2026

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