अन-नहल · 100/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
إِنَّمَا سُلْطَانُهُ عَلَى الَّذِينَ يَتَوَلَّوْنَهُ وَالَّذِينَ هُم بِهِ مُشْرِكُونَ ۝١٠٠
Innnamaa sultaanuhoo `alal lazeena yatawallawnahoo wallazeena hum bihee mushrikoon
📖 हिंदी अर्थ
उसका क़ाबू चलता है तो बस उन्हीं लोगों पर जो उसको दोस्त बनाते हैं और जो लोग उसको ख़ुदा का शरीक बनाते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سُلْطَانُهُ: उसका अधिकार, प्रभाव या नियंत्रण।
  • يَتَوَلَّوْنَهُ: उसे (शैतान को) अपना मित्र, संरक्षक और सहायक बनाते हैं, उसकी आज्ञा मानते हैं।
  • مُشْرِكُونَ: बहुदेववादी, अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार ठहराने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत बताती है कि शैतान का प्रभाव और अधिकार केवल उन्हीं लोगों पर होता है जो उसे अपना संरक्षक और मित्र बनाते हैं, उसके बहकावे में आकर उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। ऐसे लोग उसकी पैरवी करते हैं और उसके इशारों पर चलते हैं। इसके अलावा, शैतान का नियंत्रण उन लोगों पर भी होता है जो उसके बहकावे में आकर अल्लाह के साथ शिर्क करते हैं—अर्थात् अल्लाह के साथ किसी और की पूजा या उपासना करते हैं, या उसके गुणों में किसी और को साझीदार ठहराते हैं।

दूसरी ओर, यह आयत स्पष्ट करती है कि जो लोग अल्लाह पर सच्चा ईमान रखते हैं, उसकी रस्सी को मजबूती से थामते हैं और केवल उसी पर भरोसा करते हैं, उन पर शैतान का कोई अधिकार नहीं चलता। वह उन्हें बहका नहीं सकता, न ही उनके दिलों में बुरे ख्याल डाल सकता है, क्योंकि उनका सहारा अल्लाह है और अल्लाह उनकी रक्षा करता है।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. ईमान की ताकत: यह आयत मुसलमानों को यह विश्वास दिलाती है कि शैतान की कोई वास्तविक ताकत नहीं है। उसका असर केवल उन पर होता है जो खुद उसके पीछे चलने का फैसला करते हैं। अगर हम अल्लाह पर भरोसा रखें, तो शैतान हमें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।
  2. सच्ची मित्रता: यह हमें सिखाती है कि हमें अपने मित्र और सहायक केवल अल्लाह और उसके नेक बंदों को बनाना चाहिए। शैतान को मित्र बनाना—चाहे वह किसी भी रूप में हो—हमारे लिए विनाश का कारण बनता है।
  3. शिर्क से बचाव: यह आयत शिर्क की गंभीरता को उजागर करती है। शिर्क वह कृत्य है जो इंसान को शैतान के नियंत्रण में ला देता है। इसलिए हमें अपने अकेले अल्लाह की इबादत करनी चाहिए और उसके साथ किसी को साझीदार नहीं बनाना चाहिए।
  4. आत्मविश्वास और सुरक्षा: यह आयत मुसलमानों को यह आश्वासन देती है कि जो लोग अल्लाह पर भरोसा करते हैं, वे शैतान के हमलों से सुरक्षित हैं। यह उन्हें आत्मविश्वास देता है कि वे बुराई और गुमराही से बचे रहेंगे, बशर्ते वे अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करें।
🎧 सुनें

📜 आयत 98-102 — अन-नहल

98فَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآنَ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
और जब तुम क़ुरान पढ़ने लगो तो शैतान मरदूद (के वसवसो) से ख़ुदा की पनाह तलब कर लिया करो
99إِنَّهُ لَيْسَ لَهُ سُلْطَانٌ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
इसमें शक नहीं कि जो लोग ईमानदार हैं और अपने परवरदिगार पर भरोसा रखते हैं उन पर उसका क़ाबू नहीं चलता
100إِنَّمَا سُلْطَانُهُ عَلَى الَّذِينَ يَتَوَلَّوْنَهُ وَالَّذِينَ هُم بِهِ مُشْرِكُونَ
उसका क़ाबू चलता है तो बस उन्हीं लोगों पर जो उसको दोस्त बनाते हैं और जो लोग उसको ख़ुदा का शरीक बनाते हैं
101وَإِذَا بَدَّلْنَا آيَةً مَّكَانَ آيَةٍ ۙ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوا إِنَّمَا أَنتَ مُفْتَرٍ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
और (ऐ रसूल) हम जब एक आयत के बदले दूसरी आयत नाज़िल करते हैं तो हालॉकि ख़ुदा जो चीज़ नाज़िल करता है उस (की मसलहतों) से खूब वाक़िफ है मगर ये लोग (तुम को) कहने लगते हैं कि तुम बस बिल्कुल मुज़तरी (ग़लत बयान करने वाले) हो बल्कि खुद उनमें के बहुतेरे (मसालेह को) नहीं जानते
102قُلْ نَزَّلَهُ رُوحُ الْقُدُسِ مِن رَّبِّكَ بِالْحَقِّ لِيُثَبِّتَ الَّذِينَ آمَنُوا وَهُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ
(ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि इस (क़ुरान) को तो रुहलकुदूस (जिबरील) ने तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ नाज़िल किया है ताकि जो लोग ईमान ला चुके हैं उनको साबित क़दम रखे और मुसलमानों के लिए (अज़सरतापा) खुशखबरी है
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Tuesday, August 18, 2026

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