Qad makaral lazeena min qablihim fa atal laahu bunyaa nahum minal qawaa`idi fakharra `alaihimus saqfu min fawqihim wa ataahumul `azaabu min haisu laa yash`uroon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
बेशक जो लोग उनसे पहले थे उन्होंने भी मक्कारियाँ की थीं तो (ख़ुदा का हुक्म) उनके ख्यालात की इमारत की जड़ की तरफ से आ पड़ा (पस फिर क्या था) इस ख्याली इमारत की छत उन पर उनके ऊपर से धम से गिर पड़ी (और सब ख्याल हवा हो गए) और जिधर से उन पर अज़ाब आ पहुँचा उसकी उनको ख़बर तक न थी
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🌐 اردو
ان سے پہلے لوگوں نے بھی (ایسی ہی) مکاریاں کی تھیں تو خدا (کا حکم) ان کی عمارت کے ستونوں پر آپہنچا اور چھت ان پر ان کے اوپر سے گر پڑی اور (ایسی طرف سے) ان پر عذاب آ واقع ہوا جہاں سے ان کو خیال بھی نہ تھا
बेशक जो लोग उनसे पहले थे उन्होंने भी मक्कारियाँ की थीं तो (ख़ुदा का हुक्म) उनके ख्यालात की इमारत की जड़ की तरफ से आ पड़ा (पस फिर क्या था) इस ख्याली इमारत की छत उन पर उनके ऊपर से धम से गिर पड़ी (और सब ख्याल हवा हो गए) और जिधर से उन पर अज़ाब आ पहुँचा उसकी उनको ख़बर तक न थी
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
مَكَرَ: चालाकी करना, धोखा देना, फ़रेब करना।
بُنْيَانَهُم: उनकी इमारतें, उनके भवन।
الْقَوَاعِدِ: नींवें, बुनियादें।
فَخَرَّ: गिर पड़ा, ढह गया।
السَّقْفُ: छत।
لَا يَشْعُرُونَ: उन्हें एहसास नहीं होता, वे जानते नहीं।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों के हाल का ज़िक्र कर रहा है जो पहले गुज़रे हुए काफ़िरों और मुनकिरों ने अपने नबियों के खिलाफ़ मक्कारियाँ और साज़िशें रचीं। उन्होंने सोचा कि वे अपनी ताक़त, अपनी इमारतों और अपने हथियारों से सच्चाई को दबा देंगे, लेकिन अल्लाह का अज़ाब उनके पास उस रास्ते से आया जिसका उन्हें ज़रा भी गुमान नहीं था। अल्लाह ने उनकी इमारतों की नींव को ही जड़ से उखाड़ दिया, यानी उनकी तदबीरों और साज़िशों की बुनियाद ही तबाह कर दी। फिर उन्हीं की बनाई हुई इमारतें उन्हीं पर गिर पड़ीं — छतें उनके ऊपर ढह गईं और वे उन्हीं के नीचे दब कर हलाक हो गए। यानी जिस चीज़ से उन्हें अपनी हिफ़ाज़त की उम्मीद थी, वही उनके लिए बर्बादी का सबब बन गई। अज़ाब उन पर उस जगह से आया जहाँ से उन्हें किसी ख़तरे की उम्मीद नहीं थी — वे समझते थे कि उनकी इमारतें और किले उन्हें बचा लेंगे, लेकिन अल्लाह का फ़ैसला उनके सारे अनुमानों के उलट था। यह एक तारीख़ी हक़ीक़त है जो नमरूद और उसके जैसे दूसरे ज़ालिमों के साथ वाक़े हुई, और यह क़ुरआन का अंदाज़ है कि वह पिछली उम्मतों के हालात से सबक़ सिखाता है।
फ़ायदे (सबक़ और नसीहतें):
अल्लाह की क़ुदरत के आगे इंसान की तमाम तदबीरें और साज़िशें बेकार हैं — वह जिसे चाहता है उसकी योजनाओं को उलट देता है।
इंसान को कभी अपनी ताक़त, माल, इमारतों या हैसियत पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही चीज़ें उसके लिए अज़ाब का ज़रिया बन सकती हैं।
अल्लाह का अज़ाब अक्सर उस रास्ते से आता है जिसका इंसान को एहसास भी नहीं होता — इसलिए हर वक़्त अल्लाह से डरते रहना चाहिए और उसकी नाफ़रमानी से बचना चाहिए।
यह आयत नबियों के साथी मोमिनों के लिए तसल्ली है कि साज़िशें चाहे कितनी भी बड़ी हों, अल्लाह अपने नबियों की मदद ज़रूर करता है और ज़ालिमों को रसवा करता है।
इस्लाम सिखाता है कि इंसान को अपने अमल पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है — वह देर से पकड़ता है, लेकिन पकड़ता इस तरह है कि कोई बच नहीं सकता।
(उनको बकने दो ताकि क़यामत के दिन) अपने (गुनाहों) के पूरे बोझ और जिन लोगों को उन्होंने बे समझे बूझे गुमराह किया है उनके (गुनाहों के) बोझ भी उन्हीं को उठाने पड़ेगें ज़रा देखो तो कि ये लोग कैसा बुरा बोझ अपने ऊपर लादे चले जा रहें हैं
बेशक जो लोग उनसे पहले थे उन्होंने भी मक्कारियाँ की थीं तो (ख़ुदा का हुक्म) उनके ख्यालात की इमारत की जड़ की तरफ से आ पड़ा (पस फिर क्या था) इस ख्याली इमारत की छत उन पर उनके ऊपर से धम से गिर पड़ी (और सब ख्याल हवा हो गए) और जिधर से उन पर अज़ाब आ पहुँचा उसकी उनको ख़बर तक न थी
(फिर उसी पर इकतिफा नहीं) उसके बाद क़यामत के दिन ख़ुदा उनको रुसवा करेगा और फरमाएगा कि (अब बताओ) जिसको तुमने मेरा यशरीक बना रखा था और जिनके बारे में तुम (ईमानदारों से) झगड़ते थे कहाँ हैं (वह तो कुछ जवाब देगें नहीं मगर) जिन लोगों को (ख़ुदा की तरफ से) इल्म दिया गया है कहेगें कि आज के दिन रुसवाई और ख़राबी (सब कुछ) काफिरों पर ही है
वह लोग हैं कि जब फरिश्ते उनकी रुह क़ब्ज़ करने लगते हैं (और) ये लोग (कुफ्र करके) आप अपने ऊपर सितम ढ़ाते रहे तो इताअत पर आमादा नज़र आते हैं और (कहते हैं कि) हम तो (अपने ख्याल में) कोई बुराई नहीं करते थे (तो फरिश्ते कहते हैं) हाँ जो कुछ तुम्हारी करतूते थी ख़ुदा उससे खूब अच्छी तरह वाक़िफ हैं
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