अल-इसरा · 22/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
لَّا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًا مَّخْذُولًا ۝٢٢
Laa taj`al ma`al laahi ilaahan aakhara fataq`uda mazoomam makhzoolaa
📖 हिंदी अर्थ
और देखो कहीं ख़ुदा के साथ दूसरे को (उसका) शरीक न बनाना वरना तुम बुरे हाल में ज़लील रुसवा बैठै के बैठें रह जाओगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مَذْمُومًا: निन्दित, बुराई के साथ याद किया जाने वाला।
  • مَخْذُولًا: अपमानित, जिसे छोड़ दिया गया हो और कोई सहायक न हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ इंसान! अल्लाह के साथ किसी और को पूजा का भागीदार मत बना। यह आदेश सीधा और स्पष्ट है—अल्लाह के साथ किसी दूसरे को माबूद (पूज्य) न ठहराओ, न किसी मूर्ति को, न किसी इंसान को, न किसी देवता को। जो कोई ऐसा करेगा, उसका अंजाम यह होगा कि वह अल्लाह की दृष्टि में निन्दित होगा—उसकी कोई प्रशंसा नहीं की जाएगी, बल्कि उसे बुराई के साथ याद किया जाएगा। साथ ही, वह अल्लाह की ओर से अपमानित और त्यागा हुआ होगा, कोई उसकी मदद करने वाला नहीं होगा, न दुनिया में न आख़िरत में। यहाँ "बैठना" (فَتَقْعُدَ) का अर्थ है—तुम ऐसी हालत में रहोगे कि तुम्हारे पास कोई सहारा न होगा, तुम अकेले और बेबस हो जाओगे। यह एक ऐसी चेतावनी है जो इंसान को शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार बनाने) के विनाशकारी परिणाम से सचेत करती है।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. यह आयत तौहीद (एकेश्वरवाद) की सबसे बड़ी शिक्षा देती है—अल्लाह की इबादत में किसी को शामिल करना सबसे बड़ा अन्याय है, क्योंकि यह अल्लाह के अधिकार का उल्लंघन है।
  2. शिर्क इंसान को दुनिया में भी बेइज़्ज़ती और अपमान में डालता है, और आख़िरत में भी उसे कोई मददगार नहीं मिलेगा। यह जीवन की हर समस्या में इंसान को अकेला छोड़ देता है।
  3. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची इज़्ज़त और सहारा केवल अल्लाह से जुड़ने में है। जो अल्लाह से जुड़ा, वह कभी निराश नहीं होता; और जो उससे कटा, वह हर तरफ से बेसहारा रहता है।
  4. यह आयत मुसलमानों को यह भी बताती है कि अपने जीवन के हर पहलू—चाहे वह इबादत हो, व्यवहार हो, या इरादे—को अल्लाह के लिए शुद्ध रखें, ताकि हम उन लोगों में से न हों जो निन्दित और अपमानित हों।


📜 आयत 20-24 — सूरा अल-इसरा

20كُلًّا نُّمِدُّ هَٰؤُلَاءِ وَهَٰؤُلَاءِ مِنْ عَطَاءِ رَبِّكَ ۚ وَمَا كَانَ عَطَاءُ رَبِّكَ مَحْظُورًا
(ऐ रसूल) उनको (ग़रज़ सबको) हम ही तुम्हारे परवरदिगार की (अपनी) बख़्शिस से मदद देते हैं और तुम्हारे परवरदिगार की बख़्शिस तो (आम है) किसी पर बन्द नहीं
21انظُرْ كَيْفَ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ وَلَلْآخِرَةُ أَكْبَرُ دَرَجَاتٍ وَأَكْبَرُ تَفْضِيلًا
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो कि हमने बाज़ लोगों को बाज़ पर कैसी फज़ीलत दी है और आख़िरत के दर्जे तो यक़ीनन (यहाँ से) कहीं बढ़के है और वहाँ की फज़ीलत भी तो कैसी बढ़ कर है
22لَّا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًا مَّخْذُولًا
और देखो कहीं ख़ुदा के साथ दूसरे को (उसका) शरीक न बनाना वरना तुम बुरे हाल में ज़लील रुसवा बैठै के बैठें रह जाओगे
23۞ وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا ۚ إِمَّا يَبْلُغَنَّ عِندَكَ الْكِبَرَ أَحَدُهُمَا أَوْ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُل لَّهُمَا أُفٍّ وَلَا تَنْهَرْهُمَا وَقُل لَّهُمَا قَوْلًا كَرِيمًا
और तुम्हारे परवरदिगार ने तो हुक्म ही दिया है कि उसके सिवा किसी दूसरे की इबादत न करना और माँ बाप से नेकी करना अगर उनमें से एक या दोनों तेरे सामने बुढ़ापे को पहुँचे (और किसी बात पर खफा हों) तो (ख़बरदार उनके जवाब में उफ तक) न कहना और न उनको झिड़कना और जो कुछ कहना सुनना हो तो बहुत अदब से कहा करो
24وَاخْفِضْ لَهُمَا جَنَاحَ الذُّلِّ مِنَ الرَّحْمَةِ وَقُل رَّبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا
और उनके सामने नियाज़ (रहमत) से ख़ाकसारी का पहलू झुकाए रखो और उनके हक़ में दुआ करो कि मेरे पालने वाले जिस तरह इन दोनों ने मेरे छोटेपन में मेरी मेरी परवरिश की है
अल-इसराकुरान सूची
111आयत
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22आयत

अनुवाद — अल-इसरा 22

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Thursday, October 1, 2026

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