مَذْمُومًا: निन्दित, बुराई के साथ याद किया जाने वाला।
مَخْذُولًا: अपमानित, जिसे छोड़ दिया गया हो और कोई सहायक न हो।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ इंसान! अल्लाह के साथ किसी और को पूजा का भागीदार मत बना। यह आदेश सीधा और स्पष्ट है—अल्लाह के साथ किसी दूसरे को माबूद (पूज्य) न ठहराओ, न किसी मूर्ति को, न किसी इंसान को, न किसी देवता को। जो कोई ऐसा करेगा, उसका अंजाम यह होगा कि वह अल्लाह की दृष्टि में निन्दित होगा—उसकी कोई प्रशंसा नहीं की जाएगी, बल्कि उसे बुराई के साथ याद किया जाएगा। साथ ही, वह अल्लाह की ओर से अपमानित और त्यागा हुआ होगा, कोई उसकी मदद करने वाला नहीं होगा, न दुनिया में न आख़िरत में। यहाँ "बैठना" (فَتَقْعُدَ) का अर्थ है—तुम ऐसी हालत में रहोगे कि तुम्हारे पास कोई सहारा न होगा, तुम अकेले और बेबस हो जाओगे। यह एक ऐसी चेतावनी है जो इंसान को शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार बनाने) के विनाशकारी परिणाम से सचेत करती है।
फ़ायदे (उपदेश):
यह आयत तौहीद (एकेश्वरवाद) की सबसे बड़ी शिक्षा देती है—अल्लाह की इबादत में किसी को शामिल करना सबसे बड़ा अन्याय है, क्योंकि यह अल्लाह के अधिकार का उल्लंघन है।
शिर्क इंसान को दुनिया में भी बेइज़्ज़ती और अपमान में डालता है, और आख़िरत में भी उसे कोई मददगार नहीं मिलेगा। यह जीवन की हर समस्या में इंसान को अकेला छोड़ देता है।
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची इज़्ज़त और सहारा केवल अल्लाह से जुड़ने में है। जो अल्लाह से जुड़ा, वह कभी निराश नहीं होता; और जो उससे कटा, वह हर तरफ से बेसहारा रहता है।
यह आयत मुसलमानों को यह भी बताती है कि अपने जीवन के हर पहलू—चाहे वह इबादत हो, व्यवहार हो, या इरादे—को अल्लाह के लिए शुद्ध रखें, ताकि हम उन लोगों में से न हों जो निन्दित और अपमानित हों।
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो कि हमने बाज़ लोगों को बाज़ पर कैसी फज़ीलत दी है और आख़िरत के दर्जे तो यक़ीनन (यहाँ से) कहीं बढ़के है और वहाँ की फज़ीलत भी तो कैसी बढ़ कर है
और तुम्हारे परवरदिगार ने तो हुक्म ही दिया है कि उसके सिवा किसी दूसरे की इबादत न करना और माँ बाप से नेकी करना अगर उनमें से एक या दोनों तेरे सामने बुढ़ापे को पहुँचे (और किसी बात पर खफा हों) तो (ख़बरदार उनके जवाब में उफ तक) न कहना और न उनको झिड़कना और जो कुछ कहना सुनना हो तो बहुत अदब से कहा करो
और उनके सामने नियाज़ (रहमत) से ख़ाकसारी का पहलू झुकाए रखो और उनके हक़ में दुआ करो कि मेरे पालने वाले जिस तरह इन दोनों ने मेरे छोटेपन में मेरी मेरी परवरिश की है
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।