अल-इसरा · 75/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
إِذًا لَّأَذَقْنَاكَ ضِعْفَ الْحَيَاةِ وَضِعْفَ الْمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيْنَا نَصِيرًا ۝٧٥
Izal la azaqnaaka di`falhayaati wa di`fal mamaati summa laa tajidu laka `alainaa naseeraa
📖 हिंदी अर्थ
और (अगर तुम ऐसा करते तो) उस वक्त हम तुमको ज़िन्दगी में भी और मरने पर भी दोहरे (अज़ाब) का मज़ा चखा देते और फिर तुम को हमारे मुक़ाबले में कोई मददगार भी न मिलता
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ضِعْفَ الْحَيَاةِ: जीवन (दुनिया) का दोगुना (अर्थात् दुनिया में दोगुना अज़ाब)।
  • ضِعْفَ الْمَمَاتِ: मृत्यु (आख़िरत) का दोगुना (अर्थात् आख़िरत में दोगुना अज़ाब)।
  • نَصِيرًا: मददगार, सहायक, बचाने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! अगर आप उन मुशरिकों की बातों की ओर ज़रा सा भी झुकाव करते, जो वे आपसे माँग रहे थे (जैसे कि कुछ समझौते या रियायतें), तो हम आपको दुनिया की ज़िंदगी में भी दोगुना अज़ाब चखाते और मरने के बाद (आख़िरत में) भी दोगुना अज़ाब देते। यह इसलिए कि अल्लाह ने आपको बहुत बड़ी नेमत (रिसालत, इल्म और हिदायत) अता की थी, और आपकी मारिफ़त (पहचान) पूरी थी, इसलिए आपसे इससे बड़ी सख़्ती का तक़ाज़ा था। फिर आपको अल्लाह की पकड़ से बचाने वाला कोई मददगार और सहायक न मिलता, न दुनिया में और न आख़िरत में। यह बात दिखाती है कि अल्लाह के नबी की हिफ़ाज़त और उनका मक़ाम कितना बुलंद है, और साथ ही यह भी कि हक़ से ज़रा सा भी हटना कितना बड़ा ख़तरा है।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के दीन में साबित क़दम रहना कितनी बड़ी नेमत है। अल्लाह अपने नबी को भी हक़ से हटने से रोकता है, तो हमें और कितना सावधान रहना चाहिए कि हम अपने ईमान और अमल में किसी भी तरह की ढील न करें। यह भी याद दिलाती है कि अल्लाह की पकड़ से बचाने वाला कोई नहीं, इसलिए हमेशा उसी की राह पर चलें और उसी से मदद माँगें। यह आयत हमें इस बात की ख़ुशख़बरी देती है कि जो अल्लाह की राह पर साबित रहता है, अल्लाह उसे अपनी ख़ास हिफ़ाज़त में रखता है और उसे कामयाबी देता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 73-77 — अल-इसरा

73وَإِن كَادُوا لَيَفْتِنُونَكَ عَنِ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ لِتَفْتَرِيَ عَلَيْنَا غَيْرَهُ ۖ وَإِذًا لَّاتَّخَذُوكَ خَلِيلًا
और (ऐ रसूल) हमने तो (क़ुरान) तुम्हारे पास 'वही' के ज़रिए भेजा अगर चे लोग तो तुम्हें इससे बहकाने ही लगे थे ताकि तुम क़ुरान के अलावा फिर (दूसरी बातों का) इफ़तेरा बाँधों और (जब तुम ये कर गुज़रते उस वक्त ये लोग तुम को अपना सच्चा दोस्त बना लेते
74وَلَوْلَا أَن ثَبَّتْنَاكَ لَقَدْ كِدتَّ تَرْكَنُ إِلَيْهِمْ شَيْئًا قَلِيلًا
और अगर हम तुमको साबित क़दम न रखते तो ज़रुर तुम भी ज़रा (ज़हूर) झुकने ही लगते
75إِذًا لَّأَذَقْنَاكَ ضِعْفَ الْحَيَاةِ وَضِعْفَ الْمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيْنَا نَصِيرًا
और (अगर तुम ऐसा करते तो) उस वक्त हम तुमको ज़िन्दगी में भी और मरने पर भी दोहरे (अज़ाब) का मज़ा चखा देते और फिर तुम को हमारे मुक़ाबले में कोई मददगार भी न मिलता
76وَإِن كَادُوا لَيَسْتَفِزُّونَكَ مِنَ الْأَرْضِ لِيُخْرِجُوكَ مِنْهَا ۖ وَإِذًا لَّا يَلْبَثُونَ خِلَافَكَ إِلَّا قَلِيلًا
और ये लोग तो तुम्हें (सर ज़मीन मक्के) से दिल बर्दाश्त करने ही लगे थे ताकि तुम को वहाँ से (शाम की तरफ) निकाल बाहर करें और ऐसा होता तो तुम्हारे पीछे में ये लोग चन्द रोज़ के सिवा ठहरने भी न पाते
77سُنَّةَ مَن قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِن رُّسُلِنَا ۖ وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا
तुमसे पहले जितने रसूल हमने भेजे हैं उनका बराबर यही दस्तूर रहा है और जो दस्तूर हमारे (ठहराए हुए) हैं उनमें तुम तग्य्युर तबद्दुल (रद्दो बदल) न पाओगे
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अनुवाद — अल-इसरा 75

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Tuesday, August 18, 2026

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