अल-कहफ · 65/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
فَوَجَدَا عَبْدًا مِّنْ عِبَادِنَا آتَيْنَاهُ رَحْمَةً مِّنْ عِندِنَا وَعَلَّمْنَاهُ مِن لَّدُنَّا عِلْمًا ۝٦٥
Fa wajadaa `abdam min `ibaadinaaa aatainaahu Rahmatam min `indinaa wa `allamnaahu mil ladunnaa `ilmaa
📖 हिंदी अर्थ
तो (जहाँ मछली थी) दोनों ने हमारे बन्दों में से एक (ख़ास) बन्दा खिज्र को पाया जिसको हमने अपनी बारगाह से रहमत (विलायत) का हिस्सा अता किया था

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عَبْدًا – एक बंदा (ख़ास बंदा)
  • رَحْمَةً – रहमत (विशेष दया और अनुग्रह)
  • مِن لَّدُنَّا – अपने पास से (अपनी विशेष निकटता से)
  • عِلْمًا – ज्ञान (विशेष ज्ञान)

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनके साथी उस चट्टान के पास पहुँचे, जहाँ उन्होंने मछली को खोया था, तो वहाँ उन्हें हमारे बंदों में से एक विशेष बंदा मिला — यह ख़िज़्र (अलैहिस्सलाम) थे, जो अल्लाह के नबियों में से एक नबी थे। अल्लाह तआला ने उन्हें अपनी ओर से विशेष रहमत अता की थी — यानी नबुव्वत और अपने बंदों के प्रति शफ़्क़त (दया और हमदर्दी) का जज़्बा। साथ ही, अल्लाह ने उन्हें अपने पास से वह ज्ञान सिखाया था जो आम लोगों को नहीं दिया जाता — यह एक ख़ास इल्म था जो अल्लाह की मर्ज़ी से उन्हें बताया गया था, जिसमें कुछ ऐसे रहस्य और हिकमतें थीं जो ज़ाहिरी तौर पर लोगों की समझ से परे थीं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला अपने चुने हुए बंदों को अपनी ओर से ख़ास रहमत और इल्म अता करता है। यह रहमत और इल्म अल्लाह की मर्ज़ी से मिलता है, किसी की कमाई से नहीं। हमें चाहिए कि हम अल्लाह से उसकी रहमत और नेक इल्म की दुआ करें, और उसके नेक बंदों की सोहबत को ग़नीमत समझें — क्योंकि उनकी सोहबत से हमें दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई मिलती है। यह क़िस्सा हमें यह भी सिखाता है कि अल्लाह के इल्म की बहुत सी बातें हमारी समझ से परे होती हैं, लेकिन उनमें हिकमत और भलाई छिपी होती है। इसलिए हमें अल्लाह के फ़ैसलों पर भरोसा रखना चाहिए और उसके बंदों के साथ अदब और इहतिराम से पेश आना चाहिए।



📜 आयत 63-67 — अल-कहफ

63قَالَ أَرَأَيْتَ إِذْ أَوَيْنَا إِلَى الصَّخْرَةِ فَإِنِّي نَسِيتُ الْحُوتَ وَمَا أَنسَانِيهُ إِلَّا الشَّيْطَانُ أَنْ أَذْكُرَهُ ۚ وَاتَّخَذَ سَبِيلَهُ فِي الْبَحْرِ عَجَبًا
(यूशा ने) कहा क्या आप ने देखा भी कि जब हम लोग (दरिया के किनारे) उस पत्थर के पास ठहरे तो मै (उसी जगह) मछली छोड़ आया और मुझे आप से उसका ज़िक्र करना शैतान ने भुला दिया और मछली ने अजीब तरह से दरिया में अपनी राह ली
64قَالَ ذَٰلِكَ مَا كُنَّا نَبْغِ ۚ فَارْتَدَّا عَلَىٰ آثَارِهِمَا قَصَصًا
मूसा ने कहा वही तो वह (जगह) है जिसकी हम जुस्तजू (तलाश) में थे फिर दोनों अपने क़दम के निशानों पर देखते देखते उलटे पॉव फिरे
65فَوَجَدَا عَبْدًا مِّنْ عِبَادِنَا آتَيْنَاهُ رَحْمَةً مِّنْ عِندِنَا وَعَلَّمْنَاهُ مِن لَّدُنَّا عِلْمًا
तो (जहाँ मछली थी) दोनों ने हमारे बन्दों में से एक (ख़ास) बन्दा खिज्र को पाया जिसको हमने अपनी बारगाह से रहमत (विलायत) का हिस्सा अता किया था
66قَالَ لَهُ مُوسَىٰ هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَىٰ أَن تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًا
और हमने उसे इल्म लदुन्नी (अपने ख़ास इल्म) में से कुछ सिखाया था मूसा ने उन (ख़िज्र) से कहा क्या (आपकी इजाज़त है कि) मै इस ग़रज़ से आपके साथ साथ रहूँ
67قَالَ إِنَّكَ لَن تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا
कि जो रहनुमाई का इल्म आपको है (ख़ुदा की तरफ से) सिखाया गया है उसमें से कुछ मुझे भी सिखा दीजिए खिज्र ने कहा (मै सिखा दूँगा मगर) आपसे मेरे साथ सब्र न हो सकेगा
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अनुवाद — अल-कहफ 65

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Tuesday, August 18, 2026

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