अल-कहफ · 66/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
قَالَ لَهُ مُوسَىٰ هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَىٰ أَن تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًا ۝٦٦
Qaala lahoo Moosaa hal attabi`uka `alaaa an tu`allimani mimmaa `ullimta rushdaa
📖 हिंदी अर्थ
और हमने उसे इल्म लदुन्नी (अपने ख़ास इल्म) में से कुछ सिखाया था मूसा ने उन (ख़िज्र) से कहा क्या (आपकी इजाज़त है कि) मै इस ग़रज़ से आपके साथ साथ रहूँ

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अनुवाद — Tafsir

मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उस बन्दे (ख़िज़र) से अत्यन्त विनम्रता और नरमी के साथ कहा: "क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ, इस शर्त पर कि आप मुझे उस ज्ञान में से कुछ सिखाएँ जो अल्लाह ने आपको प्रदान किया है, जो मेरे लिए मार्गदर्शन और भलाई का साधन बने?"

शब्दों के अर्थ:

  • أَتَّبِعُكَ — मैं आपका अनुसरण करूँ, आपके साथ चलूँ।
  • مِمَّا عُلِّمْتَ — उसमें से जो आपको सिखाया गया है (अल्लाह की ओर से विशेष ज्ञान)।
  • رُشْدًا — ऐसा ज्ञान जो सत्य और सही मार्ग की ओर मार्गदर्शन करे, हिदायत और भलाई वाला ज्ञान।

व्याख्या:

यह वह अद्भुत दृश्य है जब अल्लाह के पैग़म्बर मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के एक विशेष बन्दे (ख़िज़र) से मुलाक़ात की। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें सलाम किया और पूरे अदब के साथ यह अनुरोध किया कि क्या वे उन्हें अपने साथ रहने की अनुमति देंगे, ताकि वे उस ज्ञान में से कुछ सीख सकें जो अल्लाह ने उन्हें विशेष रूप से प्रदान किया है — एक ऐसा ज्ञान जो उन्हें सत्य की ओर मार्गदर्शन करे और जीवन में सही निर्णय लेने में सहायता करे।

यह आयत हमें सीख देती है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए विनम्रता आवश्यक है। मूसा जैसे महान पैग़म्बर ने भी सीखने के लिए अपने से छोटे या कम प्रसिद्ध व्यक्ति के सामने नम्रता दिखाई। यह हमें बताता है कि इल्म (ज्ञान) की तलाश में इंसान को कभी घमंड नहीं करना चाहिए, चाहे वह कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो। अल्लाह ने ज्ञान को कई लोगों में बाँट रखा है, और हर इंसान के पास कुछ न कुछ विशेष ज्ञान हो सकता है जो हमसे सीखा जा सकता है।

इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो इंसान को अल्लाह के करीब ले जाए और उसके जीवन को सही दिशा दे। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने "रुश्द" (मार्गदर्शन वाला ज्ञान) माँगा — यानी ऐसा ज्ञान जो केवल जानकारी न हो, बल्कि अमल में लाने योग्य हो और दिल को रोशन करे। यह हमारे लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है कि हम जो ज्ञान प्राप्त करें, वह हमें अच्छाई की ओर ले जाए और हमारे दिलों को अल्लाह की याद से जोड़े।



📜 आयत 64-68 — अल-कहफ

64قَالَ ذَٰلِكَ مَا كُنَّا نَبْغِ ۚ فَارْتَدَّا عَلَىٰ آثَارِهِمَا قَصَصًا
मूसा ने कहा वही तो वह (जगह) है जिसकी हम जुस्तजू (तलाश) में थे फिर दोनों अपने क़दम के निशानों पर देखते देखते उलटे पॉव फिरे
65فَوَجَدَا عَبْدًا مِّنْ عِبَادِنَا آتَيْنَاهُ رَحْمَةً مِّنْ عِندِنَا وَعَلَّمْنَاهُ مِن لَّدُنَّا عِلْمًا
तो (जहाँ मछली थी) दोनों ने हमारे बन्दों में से एक (ख़ास) बन्दा खिज्र को पाया जिसको हमने अपनी बारगाह से रहमत (विलायत) का हिस्सा अता किया था
66قَالَ لَهُ مُوسَىٰ هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَىٰ أَن تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًا
और हमने उसे इल्म लदुन्नी (अपने ख़ास इल्म) में से कुछ सिखाया था मूसा ने उन (ख़िज्र) से कहा क्या (आपकी इजाज़त है कि) मै इस ग़रज़ से आपके साथ साथ रहूँ
67قَالَ إِنَّكَ لَن تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا
कि जो रहनुमाई का इल्म आपको है (ख़ुदा की तरफ से) सिखाया गया है उसमें से कुछ मुझे भी सिखा दीजिए खिज्र ने कहा (मै सिखा दूँगा मगर) आपसे मेरे साथ सब्र न हो सकेगा
68وَكَيْفَ تَصْبِرُ عَلَىٰ مَا لَمْ تُحِطْ بِهِ خُبْرًا
और (सच तो ये है) जो चीज़ आपके इल्मी अहाते से बाहर हो
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अनुवाद — अल-कहफ 66

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Tuesday, August 18, 2026

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