और यहूद कहते हैं कि नसारा का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं और नसारा कहते हैं कि यहूद का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं हालाँकि ये दोनों फरीक़ किताबे (खुदा) पढ़ते रहते हैं इसी तरह उन्हीं जैसी बातें वह (मुशरेकीन अरब) भी किया करते हैं जो (खुदा के एहकाम) कुछ नहीं जानते तो जिस बात में ये लोग पड़े झगड़ते हैं (दुनिया में तो तय न होगा) क़यामत के दिन खुदा उनके दरमियान ठीक फैसला कर देगा
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اور یہودی کہتے ہیں کہ عیسائی رستے پر نہیں اور عیسائی کہتے ہیں کہ یہودی رستے پر نہیں۔ حالانکہ وہ کتاب (الہٰی) پڑھتے ہیں۔ اسی طرح بالکل انہی کی سی بات وہ لوگ کہتے ہیں جو (کچھ) نہیں جانتے (یعنی مشرک) تو جس بات میں یہ لوگ اختلاف کر رہے خدا قیامت کے دن اس کا ان میں فیصلہ کر دے گا
لَيْسَتِ النَّصَارَىٰ عَلَىٰ شَيْءٍ: अर्थात नसारा (ईसाई) किसी सच्चे धर्म पर नहीं हैं।
يَتْلُونَ الْكِتَابَ: वे अपनी किताब (तौरात और इंजील) पढ़ते हैं।
الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ: वे लोग जो ज्ञान नहीं रखते, अर्थात अज्ञानी मुशरिकीन (बुतपरस्त अरब)।
तफसीर (व्याख्या):
यहूदियों ने कहा कि ईसाई किसी सच्चे धर्म पर नहीं हैं, और ईसाइयों ने यही कहा कि यहूदी किसी सच्चे धर्म पर नहीं हैं, जबकि दोनों अपनी-अपनी किताबें (तौरात और इंजील) पढ़ते हैं, और उन्हीं किताबों में यह आदेश मौजूद है कि सभी नबियों पर ईमान लाना अनिवार्य है और उनके बीच कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए। उनकी यह परस्पर झूठी तोहमत और बुराई उनके अपने धर्मग्रंथों के विपरीत थी। यही बात, जो उन्होंने कही, उनसे पहले उन अज्ञानी लोगों ने भी कही थी जो किताबों से वाकिफ नहीं थे, जैसे मुशरिकीन अरब, जिन्होंने हर धर्म वाले को बेबुनियाद कहा। अतः अल्लाह तआला क़ियामत के दिन उन सबके बीच न्याय करेगा और उनके उन मतभेदों का फैसला करेगा जो वे धर्म के मामले में करते थे, और हर एक को उसके कर्मों के अनुसार बदला देगा।
फ़ायदे (सबक):
यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों के धर्म या विश्वास के बारे में बिना ज्ञान और प्रमाण के बुराई करना या उन्हें बेबुनियाद कहना गलत है, क्योंकि यह अज्ञानता की निशानी है।
सच्चा ईमान यह है कि अल्लाह के सभी नबियों और उनकी किताबों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान लाया जाए, और किसी नबी या किताब को अस्वीकार करना सच्चे धर्म से बाहर होना है।
अंतिम न्याय और सच्चे फैसले का दिन क़ियामत है, जहाँ अल्लाह हर विवाद का सही समाधान करेगा, इसलिए हमें अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए अल्लाह की ओर रुजू करना चाहिए और उसके फैसले पर संतुष्ट रहना चाहिए।
यह आयत हमें यह भी बताती है कि किताब पढ़ना या धार्मिक दावा करना काफी नहीं है, बल्कि असली कसौटी किताब पर अमल करना और उसकी शिक्षाओं को अपनाना है।
और यहूद कहते हैं कि नसारा का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं और नसारा कहते हैं कि यहूद का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं हालाँकि ये दोनों फरीक़ किताबे (खुदा) पढ़ते रहते हैं इसी तरह उन्हीं जैसी बातें वह (मुशरेकीन अरब) भी किया करते हैं जो (खुदा के एहकाम) कुछ नहीं जानते तो जिस बात में ये लोग पड़े झगड़ते हैं (दुनिया में तो तय न होगा) क़यामत के दिन खुदा उनके दरमियान ठीक फैसला कर देगा
और (यहूद) कहते हैं कि यहूद (के सिवा) और (नसारा कहते हैं कि) नसारा के सिवा कोई बेहिश्त में जाने ही न पाएगा ये उनके ख्याली पुलाव है (ऐ रसूल) तुम उन से कहो कि भला अगर तुम सच्चे हो कि हम ही बेहिश्त में जाएँगे तो अपनी दलील पेश करो
हाँ अलबत्ता जिस शख्स ने खुदा के आगे अपना सर झुका दिया और अच्छे काम भी करता है तो उसके लिए उसके परवरदिगार के यहाँ उसका बदला (मौजूद) है और (आख़ेरत में) ऐसे लोगों पर न किसी तरह का ख़ौफ़ होगा और न ऐसे लोग ग़मग़ीन होगे
और यहूद कहते हैं कि नसारा का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं और नसारा कहते हैं कि यहूद का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं हालाँकि ये दोनों फरीक़ किताबे (खुदा) पढ़ते रहते हैं इसी तरह उन्हीं जैसी बातें वह (मुशरेकीन अरब) भी किया करते हैं जो (खुदा के एहकाम) कुछ नहीं जानते तो जिस बात में ये लोग पड़े झगड़ते हैं (दुनिया में तो तय न होगा) क़यामत के दिन खुदा उनके दरमियान ठीक फैसला कर देगा
और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो खुदा की मसजिदों में उसका नाम लिए जाने से (लोगों को) रोके और उनकी बरबादी के दर पे हो, ऐसों ही को उसमें जाना मुनासिब नहीं मगर सहमे हुए ऐसे ही लोगों के लिए दुनिया में रूसवाई है और ऐसे ही लोगों के लिए आख़ेरत में बड़ा भारी अज़ाब है
(तुम्हारे मसजिद में रोकने से क्या होता है क्योंकि सारी ज़मीन) खुदा ही की है (क्या) पूरब (क्या) पश्चिम बस जहाँ कहीं क़िब्ले की तरफ रूख़ करो वही खुदा का सामना है बेशक खुदा बड़ी गुन्जाइश वाला और खूब वाक़िफ है
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