अल-बकरा · 201/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ ۝٢٠١
Wa minhum mai yaqoolu rabbanaaa aatina fid dunyaa hasanatawn wa fil aakhirati hasanatanw wa qinaa azaaban Naar
📖 हिंदी अर्थ
और बाज़ बन्दे ऐसे हैं कि जो दुआ करते हैं कि ऐ मेरे पालने वाले मुझे दुनिया में नेअमत दे और आख़िरत में सवाब दे और दोज़ख़ की बाग से बचा

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abdurrahman As-Sudais ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَسَنَةً (हसनह): भलाई, उत्तम चीज़, सुख-शांति, और हर वह चीज़ जो इंसान के लिए अच्छी और पसंदीदा हो।
  • آتِنَا (आतिना): हमें दे, प्रदान कर।
  • وَقِنَا (वक़िना): हमें बचा, हमें सुरक्षित रख।

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला मोमिन बंदों के एक समूह का ज़िक्र कर रहा है जो दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई की दुआ माँगते हैं। ये लोग अपने रब से कहते हैं: "ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई दे — यानी अच्छा जीवन, हलाल रोज़ी, अच्छा ज्ञान, नेक अमल करने की तौफ़ीक़, अच्छी पत्नी और संतान, और हर वह चीज़ जो दुनिया में इंसान के लिए बेहतर हो। और आख़िरत में भी भलाई दे — यानी जन्नत, माफ़ी, और अल्लाह की रज़ा। और हमें जहन्नम की आग के अज़ाब से बचा ले।"

यह दुआ बहुत ही व्यापक और सम्पूर्ण दुआ है, जिसमें इंसान अपने रब से दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई माँगता है। यही दुआ नबी करीम ﷺ की सबसे अधिक पसंदीदा दुआओं में से थी, और आप ﷺ अक्सर यही दुआ माँगा करते थे। यह दुआ इंसान को यह सिखाती है कि वह केवल दुनिया के लिए नहीं जीए, बल्कि आख़िरत को भी अपना लक्ष्य बनाए, और दोनों जहान की भलाई की तलब करे।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि दुआ में दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई माँगनी चाहिए, न कि केवल दुनिया की चीज़ें।
  2. इस दुआ में "आख़िरत की भलाई" का मतलब जन्नत, माफ़ी और अल्लाह की रज़ा है, और "दुनिया की भलाई" में अच्छा ज्ञान, नेक अमल, हलाल रोज़ी और अच्छी ज़िंदगी शामिल है।
  3. यह दुआ हमें सिखाती है कि इंसान को हर हाल में अल्लाह से जुड़ा रहना चाहिए और उसी से अपनी ज़रूरतें माँगनी चाहिए।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि मोमिन की पहचान यह है कि वह दुनिया में भी नेकी और भलाई चाहता है और आख़िरत की कामयाबी का भी ख़्वाहाँ होता है — यही संतुलित जीवन है जो इस्लाम सिखाता है।
  5. यह दुआ हमें जहन्नम के अज़ाब से बचने की तालीम देती है, जो हर मोमिन की सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए।


📜 आयत 199-203 — सूरा अल-बकरा

199ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ وَاسْتَغْفِرُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
फिर जहाँ से लोग चल खड़े हों वहीं से तुम भी चल खड़े हो और उससे मग़फिरत की दुआ माँगों बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
200فَإِذَا قَضَيْتُم مَّنَاسِكَكُمْ فَاذْكُرُوا اللَّهَ كَذِكْرِكُمْ آبَاءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًا ۗ فَمِنَ النَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا وَمَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ
फिर जब तुम अरक़ाने हज बजा ला चुको तो तुम इस तरह ज़िक्रे ख़ुदा करो जिस तरह तुम अपने बाप दादाओं का ज़िक्र करते हो बल्कि उससे बढ़ कर के फिर बाज़ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि ऐ मेरे परवरदिगार हमको जो (देना है) दुनिया ही में दे दे हालाकि (फिर) आख़िरत में उनका कुछ हिस्सा नहीं
201وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
और बाज़ बन्दे ऐसे हैं कि जो दुआ करते हैं कि ऐ मेरे पालने वाले मुझे दुनिया में नेअमत दे और आख़िरत में सवाब दे और दोज़ख़ की बाग से बचा
202أُولَٰئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّمَّا كَسَبُوا ۚ وَاللَّهُ سَرِيعُ الْحِسَابِ
यही वह लोग हैं जिनके लिए अपनी कमाई का हिस्सा चैन है
203۞ وَاذْكُرُوا اللَّهَ فِي أَيَّامٍ مَّعْدُودَاتٍ ۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ لِمَنِ اتَّقَىٰ ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
और ख़ुदा बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है (निस्फ़) और इन गिनती के चन्द दिनों तक (तो) ख़ुदा का ज़िक्र करो फिर जो शख्स जल्दी कर बैठै और (मिना) से और दो ही दिन में चल ख़ड़ा हो तो उस पर भी गुनाह नहीं है और जो (तीसरे दिन तक) ठहरा रहे उस पर भी कुछ गुनाह नही लेकिन यह रियायत उसके वास्ते है जो परहेज़गार हो, और खुदा से डरते रहो और यक़ीन जानो कि एक दिन तुम सब के सब उसकी तरफ क़ब्रों से उठाए जाओगे
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
201आयत

अनुवाद — अल-बकरा 201

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Monday, September 28, 2026

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