अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- قَوْلٌ مَّعْرُوفٌ: अच्छी और नरम बात, जो सुनने वाले के दिल को सुकून दे।
- مَغْفِرَةٌ: क्षमा करना, दरगुज़र करना, किसी की गलती या तकलीफ़ को नज़रअंदाज़ करना।
- صَدَقَةٌ: दान, खैरात।
- أَذًى: तकलीफ़ देना, जलील करना, एहसान जताना, बुरा भला कहना।
- غَنِيٌّ: बेनियाज़, जो किसी का मोहताज न हो।
- حَلِيمٌ: बहुत ही सहनशील, जो जल्दी सज़ा न दे।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत हमें सिखाती है कि एक अच्छा और नरम बोल, और किसी की गलती या बदतमीज़ी को माफ कर देना, उस दान से कहीं बेहतर है जिसके बाद सामने वाले को तकलीफ़ दी जाए — जैसे एहसान जताना, उसे जलील करना, या उसकी ज़रूरत का मज़ाक उड़ाना।
जब कोई सवाल करने वाला इंसान ज़्यादा तकलीफ़ दे या बार-बार माँगे, तो उसे नरमी से जवाब देना और उसकी बेअदबी को माफ कर देना, उस दान से बेहतर है जो देकर उसे शर्मिंदा किया जाए या उस पर एहसान जताया जाए।
अल्लाह तआला बेनियाज़ है — उसे हमारे दान की कोई ज़रूरत नहीं। वह चाहता है कि हमारा दान खालिस नीयत से हो, बिना किसी दिखावे या एहसान जताने के। वह हलीम है — बहुत सहनशील है, वह जल्दी सज़ा नहीं देता, बल्कि लोगों को मौका देता है कि वे अपनी गलती सुधार लें।
यानी अल्लाह के यहाँ वही दान क़बूल है जो सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए दिया जाए, बिना किसी के दिल को ठेस पहुँचाए। और अगर इंसान के पास दान देने की हैसियत नहीं, तो एक अच्छी बात और माफ़ी भी उसके लिए सदक़े का दर्जा रखती है।
फ़ायदे (सीख):
- अच्छा बोल भी सदक़ा है: इस आयत से पता चलता है कि केवल पैसे से ही नेकी नहीं होती, बल्कि एक प्यारा और नरम बोल भी बहुत बड़ी नेकी है। इससे इंसान बिना किसी लागत के अल्लाह की रज़ा हासिल कर सकता है।
- माफ़ी की अज़मत: माफ़ करना और दरगुज़र करना अल्लाह को बहुत पसंद है। यह इंसान के दिल को साफ़ करता है और समाज में मुहब्बत बढ़ाता है।
- दान की पाकीज़गी: दान का असली मक़सद सिर्फ अल्लाह की रज़ा है। अगर दान के बाद एहसान जताया जाए या किसी को तकलीफ़ दी जाए, तो वह दान अल्लाह के यहाँ बेकार है। इसलिए दान देते वक़्त सिर्फ अल्लाह की खुशी का ख़याल रखना चाहिए।
- अल्लाह की बेनियाज़ी: अल्लाह को हमारे दान की ज़रूरत नहीं, बल्कि हमें उसकी ज़रूरत है। यह बात इंसान को नम्र बनाती है और उसे दिखावे से बचाती है।
- अल्लाह की सहनशीलता: अल्लाह हलीम है — वह हमारी गलतियों पर जल्दी सज़ा नहीं देता, बल्कि हमें तौबा और सुधार का मौका देता है। यह हमें सिखाता है कि हमें भी लोगों के साथ सहनशीलता और नरमी से पेश आना चाहिए।
- इस्लाम में अख़लाक़ की अहमियत: यह आयत इस्लाम के उस खूबसूरत पहलू को दिखाती है कि इसमें सिर्फ इबादत ही नहीं, बल्कि अच्छे अख़लाक़ और दूसरों के दिलों की देखभाल भी बहुत अहम है।
📜 आयत 261-265 — अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 263
सूरा अल-बकरा आयत 263 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (सायल को) नरमी से जवाब दे देना और (उसके इसरार…सूरा आयत 263/286 — अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-बकरा सुनें, अल-बकरा अनुवाद, अल-बकरा mp3, अल-बकरा pdf. आयत 261–265. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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