अल-मोमिनुन · 54/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
فَذَرْهُمْ فِي غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ ۝٥٤
Fazarhum fee ghamratihim hattaa heen
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को उन की ग़फलत में एक ख़ास वक्त तक (पड़ा) छोड़ दो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَذَرْهُمْ: उन्हें छोड़ दो।
  • غَمْرَتِهِمْ: उनकी अज्ञानता, भटकाव और गुमराही में डूबे होने की स्थिति।
  • حَتَّىٰ حِينٍ: एक निश्चित समय तक, अर्थात जब तक उन पर अज़ाब न आ जाए।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप उन लोगों को उनकी उस हालत पर छोड़ दीजिए, जिसमें वे अज्ञानता और भटकाव के अंधेरे में डूबे हुए हैं। वे सत्य को नहीं समझ रहे, अपनी जिद और हठ पर अड़े हैं, और आपके द्वारा लाए गए मार्गदर्शन को ठुकरा रहे हैं। उन्हें उनकी इस गुमराही पर कुछ समय के लिए छोड़ दें, क्योंकि उनका अंजाम निकट है। जब उन पर अल्लाह का अज़ाब आ जाएगा, तो वे स्वयं अपनी गलती को महसूस करेंगे, लेकिन तब पछतावा किसी काम नहीं आएगा।

यह आयत नबी करीम ﷺ को एक ओर जहाँ धैर्य और सब्र की शिक्षा देती है, वहीं दूसरी ओर उन लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो सत्य को सुनकर भी उससे मुँह मोड़ते हैं। अल्लाह तआला ने अपने नबी को यह निर्देश दिया कि वे उनसे बहस न करें और न ही उनके लिए पछतावा करें, बल्कि अपना काम जारी रखें और अल्लाह पर भरोसा रखें।

इस आयत में एक बड़ी नसीहत है कि इंसान को अपनी अक्ल और समझ पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञानता और हठधर्मी इंसान को अंधा बना देती है। जो लोग हक़ (सत्य) को सुनकर भी उसे नहीं मानते, वे अपने ही हाथों अपना नुक़सान करते हैं। अल्लाह की रहमत और हिदायत उन्हीं को मिलती है जो सच्चे दिल से सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं।

याद रखिए, अल्लाह की मेहरबानी से जो व्यक्ति अपने दिल को साफ रखता है और सत्य की तलाश में रहता है, अल्लाह उसे कभी गुमराह नहीं करता। और जो लोग हक़ से दूर भागते हैं, उनके लिए अल्लाह की ओर से एक निश्चित समय निर्धारित है, जब वे अपनी गलती का फल भुगतेंगे। इसलिए हमें चाहिए कि हम हमेशा सत्य को अपनाएँ, अपनी जिद और हठ को छोड़ें, और अल्लाह के दीन की ओर दौड़ें, क्योंकि यही हमारी भलाई का रास्ता है।



📜 आयत 52-56 — अल-मोमिनुन

52وَإِنَّ هَٰذِهِ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَأَنَا رَبُّكُمْ فَاتَّقُونِ
(लोगों ये दीन इस्लाम) तुम सबका मज़हब एक ही मज़हब है और मै तुम लोगों का परवरदिगार हूँ
53فَتَقَطَّعُوا أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ زُبُرًا ۖ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
तो बस मुझी से डरते रहो फिर लोगों ने अपने काम (में एख़तिलाफ करके उस) को टुकड़े टुकड़े कर डाला हर गिरो जो कुछ उसके पास है उसी में निहाल निहाल है
54فَذَرْهُمْ فِي غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ
तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को उन की ग़फलत में एक ख़ास वक्त तक (पड़ा) छोड़ दो
55أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِ مِن مَّالٍ وَبَنِينَ
क्या ये लोग ये ख्याल करते है कि हम जो उन्हें माल और औलाद में तरक्क़ी दे रहे है तो हम उनके साथ भलाईयाँ करने में जल्दी कर रहे है
56نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ
(ऐसा नहीं) बल्कि ये लोग समझते नहीं
अल-मोमिनुनकुरान सूची
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मक्कीRevelation
54आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 54

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Tuesday, August 18, 2026

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