अल-मोमिनुन · 55/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِ مِن مَّالٍ وَبَنِينَ ۝٥٥
A-yahsaboona annnamaa numiduhum bihee mimmaalinw wa baneen
📖 हिंदी अर्थ
क्या ये लोग ये ख्याल करते है कि हम जो उन्हें माल और औलाद में तरक्क़ी दे रहे है तो हम उनके साथ भलाईयाँ करने में जल्दी कर रहे है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَيَحْسَبُونَ – क्या वे समझते हैं
  • نُمِدُّهُم – हम उन्हें देते हैं / प्रदान करते हैं
  • مِن مَّالٍ وَبَنِينَ – धन और संतानों में से

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन काफ़िरों और अहले-ग़फ़लत लोगों के बारे में है जो दुनिया के धन-दौलत और औलाद पर इतराते हैं और समझते हैं कि यह सब कुछ उनकी ख़ूबी और क़ाबिलियत की वजह से उन्हें मिला है, और यह कि अल्लाह उन्हें इसलिए ये नेअमतें दे रहा है क्योंकि वे इसके हक़दार हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है: क्या ये लोग यह ग़लतफ़हमी पाले हुए हैं कि हम जो उन्हें धन और संतानों से नवाज़ रहे हैं, वह उनके लिए भलाई और इज़्ज़त का ज़रिया है?

हरगिज़ नहीं! अल्लाह तआला की यह देन उनके लिए रहमत नहीं, बल्कि एक इम्तिहान और उन्हें धीरे-धीरे ग़रक़ करने का ज़रिया है। जब कोई बंदा गुनाहों पर अड़ा रहे और अल्लाह उसे दुनिया की नेअमतें देता रहे, तो यह उसके लिए सज़ा का आग़ाज़ होता है, जिसे "इस्तिद्राज" कहते हैं। यानी अल्लाह उन्हें मोहलत देता है और नेअमतें बढ़ाता जाता है, ताकि वे और ग़ुरूर में आ जाएँ और अपनी सरकशी बढ़ाएँ, और फिर अचानक उन्हें पकड़ लिया जाए। लेकिन इन बेख़बर लोगों को इसका एहसास तक नहीं होता।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त से आगाह करती है कि दुनिया की नेअमतें किसी के लिए अल्लाह की मुहब्बत की निशानी नहीं हैं। बहुत से लोग दुनिया में खूब धन-दौलत और औलाद पाते हैं, लेकिन यह उनके लिए आख़िरत में हसरत और अफ़सोस का सबब बनता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम दुनिया की चमक-दमक पर नाज़ न करें, बल्कि अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा को अपना असली मक़सद बनाएँ। जब अल्लाह हमें नेअमतें दे, तो हमें शुक्र अदा करना चाहिए और यह दुआ करनी चाहिए कि ये नेअमतें हमारे लिए फितना न बनें, बल्कि हमारी भलाई का ज़रिया हों।

याद रखिए! अल्लाह तआला अपने नेक बंदों को भी दुनिया देता है, लेकिन उनके लिए यह नेअमत और रहमत होती है, क्योंकि वे उसका शुक्र अदा करते हैं और उसकी राह में ख़र्च करते हैं। और जो लोग अल्लाह से ग़ाफ़िल हैं, उनके लिए यही नेअमतें उनकी बरबादी का सामान बन जाती हैं। अल्लाह हम सबको समझने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 53-57 — अल-मोमिनुन

53فَتَقَطَّعُوا أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ زُبُرًا ۖ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
तो बस मुझी से डरते रहो फिर लोगों ने अपने काम (में एख़तिलाफ करके उस) को टुकड़े टुकड़े कर डाला हर गिरो जो कुछ उसके पास है उसी में निहाल निहाल है
54فَذَرْهُمْ فِي غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ
तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को उन की ग़फलत में एक ख़ास वक्त तक (पड़ा) छोड़ दो
55أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِ مِن مَّالٍ وَبَنِينَ
क्या ये लोग ये ख्याल करते है कि हम जो उन्हें माल और औलाद में तरक्क़ी दे रहे है तो हम उनके साथ भलाईयाँ करने में जल्दी कर रहे है
56نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ
(ऐसा नहीं) बल्कि ये लोग समझते नहीं
57إِنَّ الَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
उसमें शक नहीं कि जो लोग अपने परवरदिगार की वहशत से लरज़ रहे है
अल-मोमिनुनकुरान सूची
118आयत
मक्कीRevelation
55आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 55

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Tuesday, August 18, 2026

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