अश-शुआरा · 107/227
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शुआरा
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ ۝١٠٧
Innee lakum Rasoolun ameen
📖 हिंदी अर्थ
तुम खुदा से डरो और मेरी इताअत करो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • रसूल: संदेशवाहक, जिसे अल्लाह ने अपने बंदों की ओर भेजा हो।
  • अमीन: विश्वसनीय, अमानतदार, जो अल्लाह का संदेश बिना किसी कमी-बेशी के पहुँचाए।

तफ़सीर:

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से कहा: "मैं तुम्हारे लिए अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूँ, और मैं अमीन हूँ—यानी पूर्ण रूप से विश्वसनीय हूँ।" यह एक बहुत बड़ी गवाही है जो एक नबी अपनी क़ौम के सामने पेश करता है।

इसका मतलब यह है कि मैं अल्लाह की ओर से जो वही (प्रकाशना) लेकर आया हूँ, उसमें न कोई कमी करता हूँ, न उसमें कुछ बढ़ाता हूँ, और न ही उसे छिपाता हूँ। मैं वही पहुँचाता हूँ जो मुझे सौंपा गया है, और इस अमानत को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ अदा करता हूँ।

यहाँ "अमीन" शब्द बहुत गहरा अर्थ रखता है—यह नबी की सच्चाई, उनकी पाकीज़गी, और उनके मिशन की पवित्रता की गवाही है। जब कोई व्यक्ति अपने समाज में सच्चा और अमानतदार हो, तो उसकी बात पर लोग विश्वास करते हैं। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) अपनी क़ौम में इसी पहचान के लिए जाने जाते थे, और यही उनकी दावत की सबसे बड़ी दलील थी।

यह आयत हमें सिखाती है कि दावत-ए-दीन (इस्लाम की पुकार) में सबसे पहली चीज़ सच्चाई और अमानतदारी है। जब एक दावत देने वाला खुद सच्चा और भरोसेमंद होता है, तो उसकी बात दिलों में उतरती है। अल्लाह के रसूल हमेशा अपनी क़ौम के बीच "अमीन" (विश्वसनीय) के नाम से जाने जाते थे, और यही उनकी नबुव्वत की सबसे बड़ी पुष्टि थी।

आज हमें भी चाहिए कि हम अपने जीवन में सच्चाई और अमानतदारी को अपनाएँ, क्योंकि यही वह गुण है जो इंसान को दूसरों के बीच सम्मान दिलाता है और अल्लाह की रहमत का ज़रिया बनता है। जब हम सच्चे और भरोसेमंद होंगे, तो हमारी बातों का असर भी होगा और हमारा दीन भी मज़बूत होगा।

याद रखिए, अल्लाह का हर नबी अपनी क़ौम के लिए सबसे अच्छा इंसान था—सच्चा, अमानतदार और नेक। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी दे सकता है।



📜 आयत 105-109 — सूरा अश-शुआरा

105كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ الْمُرْسَلِينَ
(यूँ ही) नूह की क़ौम ने पैग़म्बरो को झुठलाया
106إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ
कि जब उनसे उन के भाई नूह ने कहा कि तुम लोग (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरते मै तो तुम्हारा यक़ीनी अमानत दार पैग़म्बर हूँ
107إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ
तुम खुदा से डरो और मेरी इताअत करो
108فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
और मैं इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ उजरत तो माँगता नहीं
109وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ
मेरी उजरत तो बस सारे जहाँ के पालने वाले ख़ुदा पर है
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107आयत

अनुवाद — अश-शुआरा 107

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Saturday, October 3, 2026

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