अश-शुआरा · 127/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ۝١٢٧
Wa maa as`alukum `alaihi min ajrin in ajriya illaa `alaa Rabbil `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
मै तो तुम से इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ मज़दूरी भी नहीं माँगता मेरी उजरत तो बस सारी ख़ुदायी के पालने वाले (ख़ुदा) पर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَسْأَلُكُمْ – मैं तुमसे माँगता हूँ
  • أَجْرٍ – बदला, पारिश्रमिक, प्रतिफल
  • إِنْ – नहीं (यहाँ नकार के अर्थ में)
  • أَجْرِيَ – मेरा बदला, मेरा प्रतिफल
  • رَبِّ الْعَالَمِينَ – सारे संसारों का पालनहार

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत नबी हूद अलैहिस्सलाम की वह पवित्र वाणी है, जो उन्होंने अपनी क़ौम 'आद' से कही। वे अपनी क़ौम को एकेश्वरवाद (तौहीद) की ओर बुला रहे थे और उन्हें अल्लाह की याद दिला रहे थे। इस आयत में उन्होंने अपने दावत के सबसे बड़े सिद्धांत को स्पष्ट किया — कि वे इस हिदायत और नसीहत के बदले लोगों से कोई दुनियावी मेहनताना या पारिश्रमिक नहीं माँगते।

हज़रत हूद अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं: "मैं तुमसे इस (दावत, नसीहत और हिदायत) के बदले कोई बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल उस अल्लाह पर है, जो सारे जहानों का पालनहार है।"

इस वाक्य में एक गहरी शिक्षा छिपी है — दावत और नसीहत का उद्देश्य कभी दुनियावी फ़ायदा नहीं होना चाहिए, बल्कि केवल अल्लाह की रज़ा और उसकी मर्ज़ी होनी चाहिए। नबी हूद अलैहिस्सलाम ने यह साबित कर दिया कि वे अपने दावत में सच्चे हैं, क्योंकि जो व्यक्ति स्वार्थ के लिए बोलता है, वह ऐसी बात नहीं कह सकता। उन्होंने अपनी बेगरज़ी (निःस्वार्थता) को अपनी सच्चाई का प्रमाण बनाया।

यह आयत हमें सिखाती है कि दीन की ख़िदमत, इल्म की तब्लीग़ और लोगों को नेकी की तरफ बुलाना — यह सब वह अमल हैं, जिनका अज्र अल्लाह के पास महफ़ूज़ है। अल्लाह किसी नेक अमल करने वाले का अज्र ज़ाइए नहीं करता। जो लोग अल्लाह की राह में अपना वक़्त, माल और मेहनत खर्च करते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास बेहतरीन इनाम है।

इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि दावत और नसीहत के काम में ख़ुलूस (निष्ठा) कितनी अहम है। जब एक दाई (बुलाने वाला) अपनी दावत में सच्चा और मुख़लिस होता है, तो अल्लाह उसकी बात को लोगों के दिलों में असर पैदा करता है। और जो लोग अल्लाह के लिए काम करते हैं, उन्हें अल्लाह की तरफ से दुनिया में भी इज़्ज़त मिलती है और आख़िरत में भी।

याद रखिए! जब हम किसी नेक काम के लिए लोगों से कोई उम्मीद नहीं रखते, तो अल्लाह खुद हमारा हिमायती बन जाता है। अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो सिर्फ उसकी रज़ा के लिए काम करते हैं। यही वह रास्ता है, जिस पर चलकर नबी, सिद्दीक़ीन और सालिहीन चले — और यही रास्ता हमारे लिए भी कामयाबी का ज़रिया है।

🎧 सुनें

📜 आयत 125-129 — अश-शुआरा

125إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ
मैं तो यक़ीनन तुम्हारा अमानतदार पैग़म्बर हूँ
126فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
तो ख़ुदा से डरो और मेरी इताअत करो
127وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ
मै तो तुम से इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ मज़दूरी भी नहीं माँगता मेरी उजरत तो बस सारी ख़ुदायी के पालने वाले (ख़ुदा) पर है
128أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ آيَةً تَعْبَثُونَ
तो क्या तुम ऊँची जगह पर बेकार यादगारे बनाते फिरते हो
129وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ
और बड़े बड़े महल तामीर करते हो गोया तुम हमेशा (यहीं) रहोगे
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अनुवाद — अश-शुआरा 127

सूरा अश-शुआरा आयत 127 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मै तो तुम से इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ मज़दूरी…

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Tuesday, August 18, 2026

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