अश-शुआरा · 128/227
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शुआरा
أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ آيَةً تَعْبَثُونَ ۝١٢٨
Atabnoona bikulli ree`in aayatan ta`basoon
📖 हिंदी अर्थ
तो क्या तुम ऊँची जगह पर बेकार यादगारे बनाते फिरते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • رِيعٍ (रीअ): ऊँचा स्थान, पहाड़ी या ऊँची ज़मीन।
  • آيَةً (आयतन): यहाँ इसका अर्थ है निशानी या ऊँची इमारत/मीनार।
  • تَعْبَثُونَ (तअबसून): मज़ाक उड़ाना, खिलवाड़ करना, लोगों को नीचा दिखाना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम 'आद' के उन कुकर्मों का ज़िक्र कर रहे हैं, जो उन्होंने अपनी ताकत और दौलत के घमंड में आकर किए। वे हर ऊँचे स्थान पर, हर पहाड़ी या रास्ते के किनारे ऊँची-ऊँची इमारतें और मीनारें बनाते थे, लेकिन इन इमारतों का मक़सद कोई भलाई या ज़रूरत नहीं थी, बल्कि वे इन ऊँची जगहों पर चढ़कर राहगीरों का मज़ाक उड़ाते थे, उन पर हँसते थे और उन्हें नीचा दिखाते थे। यह उनका खिलवाड़ और बेहूदगी थी, जो न दुनिया के किसी काम की थी और न आख़िरत के लिए कोई फ़ायदा रखती थी। वे अपनी इस फ़िज़ूल खर्ची और ऊँची इमारतों पर इतराते थे, जैसे वे दुनिया में हमेशा रहने वाले हों और कभी मरने वाले न हों। यह उनकी नादानी और सरकशी की अंतिम मंज़िल थी कि उन्होंने अल्लाह की नेमतों का इस्तेमाल अपने घमंड और लोगों को तकलीफ़ देने के लिए किया।

दावत और नसीहत:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह ने हमें जो ताकत, दौलत और ज़राइए दिए हैं, उन्हें हमें अच्छे कामों में लगाना चाहिए, न कि दूसरों का मज़ाक उड़ाने या अपने घमंड में इतराने के लिए। ऊँची इमारतें बनाना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन अगर उनका मक़सद लोगों को नीचा दिखाना, उन पर हँसना या फ़िज़ूल खर्ची करना हो, तो यह अल्लाह की नाराज़गी का सबब बनता है। हमें चाहिए कि अपनी हर नेमत का शुक्र अदा करें और उसे अल्लाह की राह में, लोगों की भलाई के लिए और अपनी आख़िरत की कमाई के लिए इस्तेमाल करें। याद रखें, दुनिया की ये ऊँची इमारतें और शान-ओ-शौकत एक दिन मिट्टी में मिल जाएँगी, लेकिन अच्छे आमाल और नेक नीयत ही वह चीज़ है जो आख़िरत में हमारे काम आएगी। अल्लाह हमें घमंड और फ़िज़ूल खर्ची से बचाए और हमें अपनी नेमतों का सही इस्तेमाल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 126-130 — सूरा अश-शुआरा

126فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
तो ख़ुदा से डरो और मेरी इताअत करो
127وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ
मै तो तुम से इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ मज़दूरी भी नहीं माँगता मेरी उजरत तो बस सारी ख़ुदायी के पालने वाले (ख़ुदा) पर है
128أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ آيَةً تَعْبَثُونَ
तो क्या तुम ऊँची जगह पर बेकार यादगारे बनाते फिरते हो
129وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ
और बड़े बड़े महल तामीर करते हो गोया तुम हमेशा (यहीं) रहोगे
130وَإِذَا بَطَشْتُم بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ
और जब तुम (किसी पर) हाथ डालते हो तो सरकशी से हाथ डालते हो
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अनुवाद — अश-शुआरा 128

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Tuesday, September 8, 2026

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