अश-शुआरा · 14/227
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शुआरा
وَلَهُمْ عَلَيَّ ذَنبٌ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ ۝١٤
Wa lahum `alaiya zambun fa akhaafu ai yaqtuloon
📖 हिंदी अर्थ
(और इसके अलावा) उनका मेरे सर एक जुर्म भी है (कि मैने एक शख्स को मार डाला था)

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذَنبٌ (ज़न्बुन): अपराध, गुनाह, या क़सूर।
  • فَأَخَافُ (फ़अख़ाफ़ु): तो मुझे डर है।
  • أَن يَقْتُلُونِ (अन यक़्तुलूनि): कि वे मुझे मार डालेंगे।

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से यह विनती की कि हे मेरे पालनहार! मुझे डर है कि कहीं मेरी क़ौम (फ़िरऔन और उसकी क़ौम) मुझे झुठला न दे, और मेरा सीना तंग न हो जाए, और मेरी ज़बान न चले, इसलिए मेरे भाई हारून (अलैहिस्सलाम) को मेरे साथ भेज दे, ताकि वे मेरी मदद करें। फिर उन्होंने अपनी एक और कमज़ोरी का ज़िक्र किया: "और उनका मुझ पर एक अपराध का दावा है, क्योंकि मैंने उनमें से एक क़िब्ती (मिस्री) व्यक्ति को मार डाला था, जो एक झगड़े के दौरान हुआ था। इसलिए मुझे डर है कि वे मुझे इसी के बदले में क़त्ल कर देंगे।"

यहाँ यह बात समझनी चाहिए कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) का यह डर कोई कायरता या नबुव्वत के काम से पीछे हटने की वजह नहीं थी, बल्कि वह एक स्वाभाविक इंसानी जज़्बा था और साथ ही वह चाहते थे कि रिसालत (पैग़ाम) का काम पूरी तरह से अंजाम दिया जाए, बिना किसी रुकावट के। उन्होंने अपने भाई हारून (अलैहिस्सलाम) को साथ देने की दरख़्वास्त इसलिए की ताकि अगर कोई बाधा आए, तो वे उसका सामना कर सकें और पैग़ाम-ए-हक़ लोगों तक पहुँच सके। यह उनकी ज़िम्मेदारी और अल्लाह के काम के प्रति उनकी सच्ची लगन को दर्शाता है।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह के रास्ते में काम करने वाले को अपनी कमज़ोरियों और डर को छिपाना नहीं चाहिए, बल्कि उसे अल्लाह के सामने अपनी हालत पेश करनी चाहिए और उससे मदद माँगनी चाहिए। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने यह नहीं कहा कि "मैं नहीं कर सकता", बल्कि उन्होंने अल्लाह से सहायता और साथी की दरख़्वास्त की। यह हमें सिखाता है कि जब हम किसी नेक काम की शुरुआत करें, तो अल्लाह पर भरोसा रखें, अपनी कमियों का एहसास रखें, और अल्लाह से दुआ करें कि वह हमारे लिए रास्ता आसान करे। अल्लाह ने उनकी दुआ क़ुबूल की और हारून (अलैहिस्सलाम) को उनका साथी बनाया, और फिर फ़िरऔन जैसे ज़ालिम के सामने भी सच्चाई की जीत हुई। यह हमारे लिए एक बड़ी तसल्ली है कि अल्लाह अपने बंदों की मदद करता है, बशर्ते वे सच्चे दिल से उसकी तरफ रुजू करें।



📜 आयत 12-16 — सूरा अश-शुआरा

12قَالَ رَبِّ إِنِّي أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ
मूसा ने अर्ज़ कि परवरदिगार मैं डरता हूँ कि (मुबादा) वह लोग मुझे झुठला दे
13وَيَضِيقُ صَدْرِي وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِي فَأَرْسِلْ إِلَىٰ هَارُونَ
और (उनके झुठलाने से) मेरा दम रुक जाए और मेरी ज़बान (अच्छी तरह) न चले तो हारुन के पास पैग़ाम भेज दे (कि मेरा साथ दे)
14وَلَهُمْ عَلَيَّ ذَنبٌ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
(और इसके अलावा) उनका मेरे सर एक जुर्म भी है (कि मैने एक शख्स को मार डाला था)
15قَالَ كَلَّا ۖ فَاذْهَبَا بِآيَاتِنَا ۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسْتَمِعُونَ
तो मैं डरता हूँ कि (शायद) मुझे ये लाग मार डालें ख़ुदा ने कहा हरगिज़ नहीं अच्छा तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ हम तुम्हारे साथ हैं
16فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَا إِنَّا رَسُولُ رَبِّ الْعَالَمِينَ
और (सारी गुफ्तगू) अच्छी तरह सुनते हैं ग़रज़ तुम दोनों फिरऔन के पास जाओ और कह दो कि हम सारे जहाँन के परवरदिगार के रसूल हैं (और पैग़ाम लाएँ हैं)
अश-शुआराकुरान सूची
227आयत
मक्कीअवतरण स्थान
14आयत

अनुवाद — अश-शुआरा 14

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Saturday, October 3, 2026

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