अश-शुआरा · 197/227
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शुआरा
أَوَلَمْ يَكُن لَّهُمْ آيَةً أَن يَعْلَمَهُ عُلَمَاءُ بَنِي إِسْرَائِيلَ ۝١٩٧
Awalam yakul lahum Aayatan ai ya`lamahoo `ulamaaa`u Baneee Israaa`eel
📖 हिंदी अर्थ
क्या उनके लिए ये कोई (काफ़ी) निशानी नहीं है कि इसको उलेमा बनी इसराइल जानते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • آيَةً: निशानी, प्रमाण, सबूत
  • يَعْلَمَهُ: उसे जाने (अर्थात् इस क़ुरआन की सच्चाई को जाने)
  • عُلَمَاءُ بَنِي إِسْرَائِيلَ: बनी इस्राईल के विद्वान (यहूदी धर्मगुरु और आलिम)

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में मक्का के काफ़िरों को सम्बोधित करते हुए फ़रमाते हैं कि क्या उनके लिए यह कोई निशानी और प्रमाण नहीं है कि बनी इस्राईल के विद्वान—जो पहले की किताबों (तौरात आदि) के जानकार हैं—इस क़ुरआन की सच्चाई को जानते हैं? अर्थात् यहूदी आलिमों ने अपनी किताबों में पढ़ा था कि अंतिम नबी का आगमन होगा, और उनकी विशेषताएँ उनकी किताबों में लिखी हुई थीं। जब मुहम्मद (ﷺ) नबी बनकर आए, तो उनमें से कई विद्वानों ने—जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु)—पहचान लिया कि यह वही नबी हैं जिनका ज़िक्र उनकी किताबों में है, और उन्होंने ईमान ले आए।

यह बात मक्का के काफ़िरों के लिए एक बड़ा प्रमाण थी, क्योंकि ये यहूदी विद्वान उनके पड़ोस में रहते थे और उनसे मेल-जोल था। जब ये आलिम खुद मान गए कि यह क़ुरआन अल्लाह की ओर से है और मुहम्मद (ﷺ) सच्चे नबी हैं, तो यह उनके लिए स्पष्ट दलील थी। फिर भी वे अहंकार और हठ के कारण ईमान नहीं लाए।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई के प्रमाण हर युग में मौजूद रहते हैं, और अल्लाह अपने नबियों की सच्चाई को विभिन्न तरीकों से सिद्ध करता है। जो लोग सच्चाई की तलाश में रहते हैं, अल्लाह उनके लिए रास्ते खोल देता है। यह हमारे लिए भी एक सबक है कि हमें अपने ज्ञान और समझ को बढ़ाना चाहिए, क्योंकि ज्ञान ही वह चीज़ है जो इंसान को सच्चाई तक पहुँचाता है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन को आसान बनाया है और उसकी सच्चाई के सबूत हर जगह मौजूद हैं—बस ज़रूरत है खुले दिल और सच्ची नीयत की।

इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि अहले-किताब के विद्वानों की गवाही भी नबी (ﷺ) की सच्चाई पर एक प्रमाण है, और यह उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो जानबूझकर सच्चाई को छिपाते हैं। अल्लाह हमें सच्चाई को पहचानने और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 195-199 — सूरा अश-शुआरा

195بِلِسَانٍ عَرَبِيٍّ مُّبِينٍ
लोगों को अज़ाबे ख़ुदा से डराओ
196وَإِنَّهُ لَفِي زُبُرِ الْأَوَّلِينَ
और बेशक इसकी ख़बर अगले पैग़म्बरों की किताबों मे (भी मौजूद) है
197أَوَلَمْ يَكُن لَّهُمْ آيَةً أَن يَعْلَمَهُ عُلَمَاءُ بَنِي إِسْرَائِيلَ
क्या उनके लिए ये कोई (काफ़ी) निशानी नहीं है कि इसको उलेमा बनी इसराइल जानते हैं
198وَلَوْ نَزَّلْنَاهُ عَلَىٰ بَعْضِ الْأَعْجَمِينَ
और अगर हम इस क़ुरान को किसी दूसरी ज़बान वाले पर नाज़िल करते
199فَقَرَأَهُ عَلَيْهِم مَّا كَانُوا بِهِ مُؤْمِنِينَ
और वह उन अरबो के सामने उसको पढ़ता तो भी ये लोग उस पर ईमान लाने वाले न थे
अश-शुआराकुरान सूची
227आयत
मक्कीअवतरण स्थान
197आयत

अनुवाद — अश-शुआरा 197

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Saturday, October 3, 2026

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