अन-नमल · 42/93
अनुवाद उच्चारण — अन-नमल
فَلَمَّا جَاءَتْ قِيلَ أَهَٰكَذَا عَرْشُكِ ۖ قَالَتْ كَأَنَّهُ هُوَ ۚ وَأُوتِينَا الْعِلْمَ مِن قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِمِينَ ۝٤٢
Falammaa jaaa`at qeela ahaakaza `arshuki qaalat kaanna hoo; wa ooteenal `ilma min qablihaa wa kunnaa muslimeen
📖 हिंदी अर्थ
(चुनान्चे ऐसा ही किया गया) फिर जब बिलक़ीस (सुलेमान के पास) आयी तो पूछा गया कि तुम्हारा तख्त भी ऐसा ही है वह बोली गोया ये वही है (फिर कहने लगी) हमको तो उससे पहले ही (आपकी नुबूवत) मालूम हो गयी थी और हम तो आपके फ़रमाबरदार थे ही
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَهَٰكَذَا عَرْشُكِ – "क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है?"
  • كَأَنَّهُ هُوَ – "यह तो गोया वही है" (यानी बिल्कुल उसी जैसा लगता है)
  • أُوتِينَا الْعِلْمَ – "हमें ज्ञान दिया गया"
  • مِن قَبْلِهَا – "इससे पहले" (यानी उसके इस उत्तर से पहले)
  • وَكُنَّا مُسْلِمِينَ – "और हम आज्ञाकारी (मुस्लिम) थे"

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मलिका बिल्क़ीस (सबा की रानी) हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के दरबार में पहुँचीं, तो उनकी परीक्षा लेने के लिए उनसे पूछा गया: "क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है?" यह प्रश्न इसलिए किया गया कि उनकी बुद्धि और समझ का अंदाज़ा लगाया जा सके। मलिका बिल्क़ीस ने बड़ी समझदारी और सूझ-बूझ से उत्तर दिया: "यह तो गोया वही है।" उन्होंने न तो स्पष्ट रूप से पुष्टि की और न ही इनकार किया, बल्कि ऐसा उत्तर दिया जो सत्य के करीब था और उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता था।

यह देखकर हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने उनकी बुद्धिमत्ता और सूझ-बूझ की प्रशंसा की और अल्लाह की महान शक्ति को याद करते हुए कहा: "हमें इससे पहले ही सच्चा ज्ञान दे दिया गया था, और हम अल्लाह के आज्ञाकारी (मुस्लिम) थे।" यानी उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उन्हें अल्लाह की कुदरत और उसकी हर चीज़ पर पूर्ण शक्ति का ज्ञान पहले से ही था, और वे हमेशा से अल्लाह के हुक्म के सामने सिर झुकाने वाले और उसके दीन पर चलने वाले थे।

यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान और समझ अल्लाह की ओर से मिलती है, और जो लोग अल्लाह के आज्ञाकारी बन जाते हैं, अल्लाह उन्हें ऐसी समझ और विवेक प्रदान करता है जिससे वे हर परिस्थिति में सही निर्णय ले सकें। साथ ही, यह भी सीख मिलती है कि बुद्धिमानी और विनम्रता से बात करनी चाहिए, क्योंकि मलिका बिल्क़ीस के नर्म और समझदारी भरे उत्तर ने उन्हें सत्य की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया।

यह क़िस्सा हमें यह भी बताता है कि अल्लाह की कुदरत के आगे हर चीज़ मुमकिन है — सिंहासन को पल भर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाना उसकी शक्ति के आगे कुछ भी नहीं है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अल्लाह पर पूर्ण विश्वास रखें, उसके दीन को अपनाएँ, और अपने जीवन में उसकी आज्ञाकारिता को सर्वोपरि बनाएँ। यही सच्ची सफलता और सच्ची बुद्धिमानी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 40-44 — अन-नमल

40قَالَ الَّذِي عِندَهُ عِلْمٌ مِّنَ الْكِتَابِ أَنَا آتِيكَ بِهِ قَبْلَ أَن يَرْتَدَّ إِلَيْكَ طَرْفُكَ ۚ فَلَمَّا رَآهُ مُسْتَقِرًّا عِندَهُ قَالَ هَٰذَا مِن فَضْلِ رَبِّي لِيَبْلُوَنِي أَأَشْكُرُ أَمْ أَكْفُرُ ۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبِّي غَنِيٌّ كَرِيمٌ
इस पर अभी सुलेमान कुछ कहने न पाए थे कि वह शख्स (आसिफ़ बिन बरख़िया) जिसके पास किताबे (ख़ुदा) का किस कदर इल्म था बोला कि मै आप की पलक झपकने से पहले तख्त को आप के पास हाज़िर किए देता हूँ (बस इतने ही में आ गया) तो जब सुलेमान ने उसे अपने पास मौजूद पाया तो कहने लगे ये महज़ मेरे परवरदिगार का फज़ल व करम है ताकि वह मेरा इम्तेहान ले कि मै उसका शुक्र करता हूँ या नाशुक्री करता हूँ और जो कोई शुक्र करता है वह अपनी ही भलाई के लिए शुक्र करता है और जो शख्स ना शुक्री करता है तो (याद रखिए) मेरा परवरदिगार यक़ीनन बेपरवा और सख़ी है
41قَالَ نَكِّرُوا لَهَا عَرْشَهَا نَنظُرْ أَتَهْتَدِي أَمْ تَكُونُ مِنَ الَّذِينَ لَا يَهْتَدُونَ
(उसके बाद) सुलेमान ने कहा कि उसके तख्त में (उसकी अक्ल के इम्तिहान के लिए) तग़य्युर तबददुल कर दो ताकि हम देखें कि फिर भी वह समझ रखती है या उन लोगों में है जो कुछ समझ नहीं रखते
42فَلَمَّا جَاءَتْ قِيلَ أَهَٰكَذَا عَرْشُكِ ۖ قَالَتْ كَأَنَّهُ هُوَ ۚ وَأُوتِينَا الْعِلْمَ مِن قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِمِينَ
(चुनान्चे ऐसा ही किया गया) फिर जब बिलक़ीस (सुलेमान के पास) आयी तो पूछा गया कि तुम्हारा तख्त भी ऐसा ही है वह बोली गोया ये वही है (फिर कहने लगी) हमको तो उससे पहले ही (आपकी नुबूवत) मालूम हो गयी थी और हम तो आपके फ़रमाबरदार थे ही
43وَصَدَّهَا مَا كَانَت تَّعْبُدُ مِن دُونِ اللَّهِ ۖ إِنَّهَا كَانَتْ مِن قَوْمٍ كَافِرِينَ
और ख़ुदा के सिवा जिसे वह पूजती थी सुलेमान ने उससे उसे रोक दिया क्योंकि वह काफिर क़ौम की थी (और आफताब को पूजती थी)
44قِيلَ لَهَا ادْخُلِي الصَّرْحَ ۖ فَلَمَّا رَأَتْهُ حَسِبَتْهُ لُجَّةً وَكَشَفَتْ عَن سَاقَيْهَا ۚ قَالَ إِنَّهُ صَرْحٌ مُّمَرَّدٌ مِّن قَوَارِيرَ ۗ قَالَتْ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي وَأَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمَانَ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
फिर उससे कहा गया कि आप अब महल मे चलिए तो जब उसने महल (में शीशे के फर्श) को देखा तो उसको गहरा पानी समझी (और गुज़रने के लिए इस तरह अपने पाएचे उठा लिए कि) अपनी दोनों पिन्डलियाँ खोल दी सुलेमान ने कहा (तुम डरो नहीं) ये (पानी नहीं है) महल है जो शीशे से मढ़ा हुआ है (उस वक्त तम्बीह हुई और) अर्ज़ की परवरदिगार मैने (आफताब को पूजा कर) यक़ीनन अपने ऊपर ज़ुल्म किया
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अनुवाद — अन-नमल 42

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Tuesday, August 18, 2026

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