अल-क़सस · 42/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَأَتْبَعْنَاهُمْ فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ هُم مِّنَ الْمَقْبُوحِينَ ۝٤٢
Wa atba`naahum fee haazihid dunyaa la`natanw wa Yawmal Qiyaamati hum minal maqbooheen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने दुनिया में भी तो लानत उन के पीछे लगा दी है और क़यामत के दिन उनके चेहरे बिगाड़ दिए जायेंगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَعْنَةً: अभिशाप, फिटकार, रहमत से दूरी और अपमान।
  • الْمَقْبُوحِينَ: वे लोग जिनके चेहरे काले कर दिए जाएँ, आँखें नीली कर दी जाएँ, और वे बुरी सूरत के साथ उठाए जाएँ — यानी क़ियामत के दिन उनकी शक्ल विकृत कर दी जाएगी।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम के बारे में बताया कि उन्होंने हक़ को झुठलाया, मूसा (अलैहिस्सलाम) की दावत को नकारा और ज़ुल्म व सरकशी पर अड़े रहे। इसलिए अल्लाह ने उन्हें दुनिया में भी अपनी लानत और फिटकार का निशाना बनाया — यानी उन्हें रुसवाई, ज़िल्लत और रहमत से महरूमी का सामना करना पड़ा। यह सिर्फ़ एक एतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक सबक़ है कि जो लोग अल्लाह के दीन से मुँह मोड़ते हैं और अपने नफ़्स की पैरवी करते हैं, उन्हें दुनिया में भी रुसवाई उठानी पड़ती है और आख़िरत में भी वे अल्लाह की रहमत से दूर होंगे।

क़ियामत के दिन उनकी हालत और भी बदतर होगी — वे उन लोगों में से होंगे जिनके चेहरे सियाह होंगे, आँखें नीली होंगी, और वे बदसूरत हालत में उठाए जाएँगे। यह उनके कुकर्मों का नतीजा होगा। यह बात सिर्फ़ फ़िरऔनियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए नसीहत है जो अल्लाह की नाफ़रमानी में मशग़ूल है।

नसीहत और दावत:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नाराज़गी से बचना कितना ज़रूरी है। जो लोग दुनिया में भी अल्लाह की लानत और रुसवाई से बचना चाहते हैं और आख़िरत में भी कामयाब होना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि वे अल्लाह के हुक्मों की पैरवी करें, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत को अपनाएँ, और ज़ुल्म, सरकशी और हक़ से इनकार से दूर रहें। अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए है जो तौबा करें, ईमान लाएँ और नेक अमल करें। आज भी दरवाज़ा खुला है — जो भी सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ़ लौटेगा, अल्लाह उसे माफ़ कर देगा और उसे दुनिया व आख़िरत की बेहतरी अता करेगा। यही कामयाबी का रास्ता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 40-44 — अल-क़सस

40فَأَخَذْنَاهُ وَجُنُودَهُ فَنَبَذْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِمِينَ
तो हमने उसको और उसके लश्कर को ले डाला फिर उन सबको दरिया में डाल दिया तो (ऐ रसूल) ज़रा देखों तो कि ज़ालिमों का कैसा बुरा अन्जाम हुआ
41وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يُنصَرُونَ
और हमने उनको (गुमराहों का) पेशवा बनाया कि (लोगों को) जहन्नुम की तरफ बुलाते है और क़यामत के दिन (ऐसे बेकस होगें कि) उनको किसी तरह की मदद न दी जाएगी
42وَأَتْبَعْنَاهُمْ فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ هُم مِّنَ الْمَقْبُوحِينَ
और हमने दुनिया में भी तो लानत उन के पीछे लगा दी है और क़यामत के दिन उनके चेहरे बिगाड़ दिए जायेंगे
43وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ مِن بَعْدِ مَا أَهْلَكْنَا الْقُرُونَ الْأُولَىٰ بَصَائِرَ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَّعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
और हमने बहुतेरी अगली उम्मतों को हलाक कर डाला उसके बाद मूसा को किताब (तौरैत) अता की जो लोगों के लिए अजसरतापा बसीरत और हिदायत और रहमत थी ताकि वह लोग इबरत व नसीहत हासिल करें
44وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ الْغَرْبِيِّ إِذْ قَضَيْنَا إِلَىٰ مُوسَى الْأَمْرَ وَمَا كُنتَ مِنَ الشَّاهِدِينَ
और (ऐ रसूल) जिस वक्त हमने मूसा के पास अपना हुक्म भेजा था तो तुम (तूर के) मग़रिबी जानिब मौजूद न थे और न तुम उन वाक्यात को चश्मदीद देखने वालों में से थे
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अनुवाद — अल-क़सस 42

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Tuesday, August 18, 2026

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