अल-अंकबूत · 6/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
وَمَن جَاهَدَ فَإِنَّمَا يُجَاهِدُ لِنَفْسِهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ ۝٦
Wa man jaahada fainnamaa yujaahidu linafsih; innal laaha laghaniyyun `anil `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
और जो शख्स (इबादत में) कोशिश करता है तो बस अपने ही वास्ते कोशिश करता है (क्योंकि) इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा सारे जहाँन (की इबादत) से बेनियाज़ है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • जाहदा (जिहाद किया): अपने आप को अल्लाह की आज्ञा का पालन करने और उसकी नापसंदगी से बचने पर मजबूर करना, और अल्लाह के दीन की सर्वोच्चता के लिए प्रयास करना।
  • लिनफ़्सिही (अपने लिए): इसका लाभ और पुरस्कार उसी को मिलेगा।
  • लग़नीयुन (बेनियाज़ है): अल्लाह किसी का मोहताज नहीं, वह सबसे बेनियाज़ है।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला हमें बताते हैं कि जो कोई भी जिहाद करता है—चाहे वह दुश्मन से लड़ाई हो, या अपने नफ्स (अपनी इच्छाओं) के खिलाफ संघर्ष हो, यानी अपने आप को अल्लाह की आज्ञा मानने और गुनाहों से बचने पर मजबूर करना हो—तो इस जिहाद का सारा फायदा उसी को मिलता है। क्योंकि अल्लाह तआला को किसी के जिहाद या इबादत की कोई ज़रूरत नहीं है। वह तो बेनियाज़ है, सबसे परे है। उसके लिए न तो किसी की आज्ञाकारिता कोई नफा पहुंचाती है और न किसी की नाफरमानी उसे कोई नुकसान पहुंचा सकती है।

अल्लाह तआला ने यह सब कुछ हमारी भलाई के लिए निर्धारित किया है। जब हम जिहाद करते हैं, अपने नफ्स को काबू में करते हैं, अल्लाह की राह में मेहनत करते हैं, तो असल में हम अपने ही भले के लिए कर रहे होते हैं। यह हमारे ईमान को मजबूत करता है, हमारे दिल को साफ करता है, और हमें अल्लाह की रहमत और जन्नत के करीब ले जाता है।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी खुशखबरी देती है कि अल्लाह तआला हमारे अच्छे कामों का पूरा-पूरा बदला देने वाला है। वह हमारी छोटी से छोटी कोशिश को भी जाया नहीं करता। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में जिहाद करते रहें—चाहे वह नमाज़ की पाबंदी हो, रोज़े रखना हो, सच बोलना हो, या बुराई से बचना हो। यह सब हमारे अपने ही लिए है। अल्लाह तआला हमें इस तरह की तौफीक़ अता करें, आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 4-8 — अल-अंकबूत

4أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ السَّيِّئَاتِ أَن يَسْبِقُونَا ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ
क्या जो लोग बुरे बुरे काम करते हैं उन्होंने ये समझ लिया है कि वह हमसे (बचकर) निकल जाएँगे (अगर ऐसा है तो) ये लोग क्या ही बुरे हुक्म लगाते हैं
5مَن كَانَ يَرْجُو لِقَاءَ اللَّهِ فَإِنَّ أَجَلَ اللَّهِ لَآتٍ ۚ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
जो शख्स ख़ुदा से मिलने (क़यामत के आने) की उम्मीद रखता है तो (समझ रखे कि) ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) मीयाद ज़रुर आने वाली है और वह (सबकी) सुनता (और) जानता है
6وَمَن جَاهَدَ فَإِنَّمَا يُجَاهِدُ لِنَفْسِهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ
और जो शख्स (इबादत में) कोशिश करता है तो बस अपने ही वास्ते कोशिश करता है (क्योंकि) इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा सारे जहाँन (की इबादत) से बेनियाज़ है
7وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَنُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَحْسَنَ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए हम यक़ीनन उनके गुनाहों की तरफ से कफ्फारा क़रार देगें और ये (दुनिया में) जो आमाल करते थे हम उनके आमाल की उन्हें अच्छी से अच्छी जज़ा अता करेंगे
8وَوَصَّيْنَا الْإِنسَانَ بِوَالِدَيْهِ حُسْنًا ۖ وَإِن جَاهَدَاكَ لِتُشْرِكَ بِي مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۚ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
और हमने इन्सान को अपने माँ बाप से अच्छा बरताव करने का हुक्म दिया है और (ये भी कि) अगर तुझे तेरे माँ बाप इस बात पर मजबूर करें कि ऐसी चीज़ को मेरा शरीक बना जिन (के शरीक होने) का मुझे इल्म तक नहीं तो उनका कहना न मानना तुम सबको (आख़िर एक दिन) मेरी तरफ लौट कर आना है मै जो कुछ तुम लोग (दुनिया में) करते थे बता दूँगा
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अनुवाद — अल-अंकबूत 6

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Tuesday, August 18, 2026

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