आल-इमरान · 178/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ خَيْرٌ لِّأَنفُسِهِمْ ۚ إِنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ لِيَزْدَادُوا إِثْمًا ۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ ۝١٧٨
Wa laa yahsabannal lazeena kafarooo annamaa numlee lahum khairulli anfusihim; innamaa numlee lahum liyazdaadooo ismaa wa lahum `azaabum muheen
📖 हिंदी अर्थ
और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तियार किया वह हरगिज़ ये न ख्याल करें कि हमने जो उनको मोहलत व बेफिक्री दे रखी है वह उनके हक़ में बेहतर है (हालॉकि) हमने मोहल्लत व बेफिक्री सिर्फ इस वजह से दी है ताकि वह और ख़ूब गुनाह कर लें और (आख़िर तो) उनके लिए रूसवा करने वाला अज़ाब है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نُمْلِي: हम उन्हें मोहलत देते हैं, उनकी आयु बढ़ाते हैं और उन्हें दण्ड देने में देर करते हैं।
  • إِثْمًا: पाप, गुनाह।
  • مُهِينٌ: अपमानित करने वाला, ज़लील करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन काफ़िरों के बारे में है जो यह समझते हैं कि उन्हें दुनिया में जो सुख-सुविधाएँ, लंबी उम्र और ऐशो-आराम की ज़िंदगी मिल रही है, वह इस बात का सबूत है कि वे सही रास्ते पर हैं और उनके लिए यह अच्छा है। अल्लाह तआला उन्हें चेतावनी देते हुए फ़रमाता है कि ऐ काफ़िरो! तुम यह ग़लत ख़याल मत पालो कि तुम्हें दी गई यह मोहलत और दुनियावी सुख-सामग्री तुम्हारे लिए भलाई है। हरगिज़ नहीं! बल्कि यह अल्लाह की ओर से एक मोहलत है, जिसका उद्देश्य यह है कि तुम अपने कुफ्र और नाफ़रमानी में और बढ़ जाओ, अपने गुनाहों का बोझ और भारी कर लो। यह उनके लिए रहमत नहीं, बल्कि अज़ाब में इज़ाफ़े का ज़रिया है। क्योंकि जितना अधिक वे कुफ्र और गुनाह में डूबते जाएँगे, उतना ही उनका अंजाम बुरा होगा। आख़िरकार उनके लिए एक अपमानजनक और ज़लील करने वाला अज़ाब तैयार है, जिससे वे किसी तरह बच नहीं सकते। यह मोहलत उनके लिए सज़ा में ताख़ीर है, न कि उनकी भलाई के लिए।

फ़ायदे (सबक़):

  1. दुनिया में किसी को मिलने वाली सुख-सुविधाएँ और लंबी उम्र यह ज़रूरी नहीं कि उसके लिए अच्छी हो। यह अल्लाह की ओर से एक इम्तिहान और मोहलत हो सकती है।
  2. अल्लाह तआला ने इंसान को आज़ादी दी है, लेकिन हर काम का हिसाब होगा। जो लोग गुनाह में डूबे रहते हैं, उनकी मोहलत उनके लिए और अज़ाब का सबब बनती है।
  3. मुसलमान को चाहिए कि वह दुनिया के ऐशो-आराम पर नाज़ न करे, बल्कि अल्लाह की इबादत और नेक कामों में अपनी उम्र गुज़ारे, क्योंकि असली कामयाबी आख़िरत में है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। वह जब चाहता है, किसी को पकड़ लेता है। इसलिए इंसान को अपने गुनाहों से तौबा कर लेनी चाहिए, क्योंकि मोहलत का हर लम्हा कीमती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 176-180 — आल-इमरान

176وَلَا يَحْزُنكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ ۚ إِنَّهُمْ لَن يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا ۗ يُرِيدُ اللَّهُ أَلَّا يَجْعَلَ لَهُمْ حَظًّا فِي الْآخِرَةِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और (ऐ रसूल) जो लोग कुफ़्र की (मदद) में पेश क़दमी कर जाते हैं उनकी वजह से तुम रन्ज न करो क्योंकि ये लोग ख़ुदा को कुछ ज़रर नहीं पहुँचा सकते (बल्कि) ख़ुदा तो ये चाहता है कि आख़ेरत में उनका हिस्सा न क़रार दे और उनके लिए बड़ा (सख्त) अज़ाब है
177إِنَّ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْكُفْرَ بِالْإِيمَانِ لَن يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
बेशक जिन लोगों ने ईमान के एवज़ कुफ़्र ख़रीद किया वह हरगिज़ खुदा का कुछ भी नहीं बिगाड़ेंगे (बल्कि आप अपना) और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
178وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ خَيْرٌ لِّأَنفُسِهِمْ ۚ إِنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ لِيَزْدَادُوا إِثْمًا ۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ
और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तियार किया वह हरगिज़ ये न ख्याल करें कि हमने जो उनको मोहलत व बेफिक्री दे रखी है वह उनके हक़ में बेहतर है (हालॉकि) हमने मोहल्लत व बेफिक्री सिर्फ इस वजह से दी है ताकि वह और ख़ूब गुनाह कर लें और (आख़िर तो) उनके लिए रूसवा करने वाला अज़ाब है
179مَّا كَانَ اللَّهُ لِيَذَرَ الْمُؤْمِنِينَ عَلَىٰ مَا أَنتُمْ عَلَيْهِ حَتَّىٰ يَمِيزَ الْخَبِيثَ مِنَ الطَّيِّبِ ۗ وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُطْلِعَكُمْ عَلَى الْغَيْبِ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَجْتَبِي مِن رُّسُلِهِ مَن يَشَاءُ ۖ فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ ۚ وَإِن تُؤْمِنُوا وَتَتَّقُوا فَلَكُمْ أَجْرٌ عَظِيمٌ
(मुनाफ़िक़ो) ख़ुदा ऐसा नहीं कि बुरे भले की तमीज़ किए बगैर जिस हालत पर तुम हो उसी हालत पर मोमिनों को भी छोड़ दे और ख़ुदा ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें गैब की बातें बता दे मगर (हॉ) ख़ुदा अपने रसूलों में जिसे चाहता है (गैब बताने के वास्ते) चुन लेता है पस ख़ुदा और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और अगर तुम ईमान लाओगे और परहेज़गारी करोगे तो तुम्हारे वास्ते बड़ी जज़ाए ख़ैर है
180وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ هُوَ خَيْرًا لَّهُم ۖ بَلْ هُوَ شَرٌّ لَّهُمْ ۖ سَيُطَوَّقُونَ مَا بَخِلُوا بِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ وَلِلَّهِ مِيرَاثُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
और जिन लोगों को ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल (व करम) से कुछ दिया है (और फिर) बुख्ल करते हैं वह हरगिज़ इस ख्याल में न रहें कि ये उनके लिए (कुछ) बेहतर होगा बल्कि ये उनके हक़ में बदतर है क्योंकि जिस (माल) का बुख्ल करते हैं अनक़रीब ही क़यामत के दिन उसका तौक़ बनाकर उनके गले में पहनाया जाएगा और सारे आसमान व ज़मीन की मीरास ख़ुदा ही की है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
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अनुवाद — आल-इमरान 178

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Tuesday, August 18, 2026

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