आल-इमरान · 182/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ ۝١٨٢
Zaalika bimaa qaddamat aideekum wa annal laaha laisa bizallaamil lil`abeed
📖 हिंदी अर्थ
ये उन्हीं कामों का बदला है जिनको तुम्हारे हाथों ने (ज़ादे आख़ेरत बना कर) पहले से भेजा है वरना ख़ुदा तो कभी अपने बन्दों पर ज़ुल्म करने वाला नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذَٰلِكَ (यह): यहाँ से तात्पर्य उस कठोर यातना से है जिसका उल्लेख पिछली आयतों में किया गया।
  • بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ (उसके कारण जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा): अर्थात उन कर्मों के कारण जो तुमने अपने जीवन में किए।
  • لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ (बंदों पर ज़ुल्म करने वाला नहीं): अर्थात अल्लाह अपने बंदों पर किसी भी प्रकार का अन्याय नहीं करता।

व्याख्या:

यह आयत उस स्थिति का वर्णन कर रही है जब अल्लाह के नकारने वालों को नरक की आग में डाला जाएगा। उस समय उनसे कहा जाएगा: "यह यातना जो तुम्हें मिल रही है, यह उन कर्मों का परिणाम है जो तुमने अपने हाथों से दुनिया में किए थे।" यानी तुम्हारे गलत विश्वास, बुरे वचन और बुरे कर्म ही इसका कारण बने हैं।

अल्लाह तआला किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। वह पूर्ण न्याय करने वाला है। वह किसी को बिना अपराध के दंड नहीं देता, न ही किसी के अच्छे कर्म को बिना फल के छोड़ता है। जो व्यक्ति अच्छा कर्म करता है, उसे उसका पूरा बदला मिलता है, और जो बुरा कर्म करता है, उसे उसका उचित परिणाम भुगतना पड़ता है। यह अल्लाह की रहमत और अदालत का तकाज़ा है कि वह अपने बंदों के साथ कभी अन्याय नहीं करता।


फ़ायदे (सीख):

  1. जवाबदेही का एहसास: यह आयत हमें सिखाती है कि हमारे हर कर्म का हिसाब होगा। जो हम आज कर रहे हैं, उसका परिणाम हमें कल भुगतना होगा। यह एहसास इंसान को गलत कामों से रोकता है और अच्छे कामों की ओर प्रेरित करता है।
  2. अल्लाह की अदालत पर भरोसा: अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। यह हमें सिखाता है कि अगर दुनिया में कभी हम पर कोई मुसीबत आए या कोई नाइंसाफी हो, तो हमें अल्लाह की अदालत पर भरोसा रखना चाहिए। वह हर चीज़ का सही फैसला करेगा।
  3. कर्मों की ज़िम्मेदारी: यह आयत हमें बताती है कि हम अपने कर्मों के लिए खुद ज़िम्मेदार हैं। हम किसी और को दोष नहीं दे सकते। हमारी सफलता या असफलता हमारे अपने कर्मों पर निर्भर है।
  4. अल्लाह की रहमत की उम्मीद: चूँकि अल्लाह न्याय करने वाला है और ज़ुल्म नहीं करता, इसलिए हमें उम्मीद रखनी चाहिए कि हमारे अच्छे कर्म बेकार नहीं जाएँगे। हर अच्छाई का बदला मिलेगा, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो।


📜 आयत 180-184 — आल-इमरान

180وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ هُوَ خَيْرًا لَّهُم ۖ بَلْ هُوَ شَرٌّ لَّهُمْ ۖ سَيُطَوَّقُونَ مَا بَخِلُوا بِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ وَلِلَّهِ مِيرَاثُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
और जिन लोगों को ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल (व करम) से कुछ दिया है (और फिर) बुख्ल करते हैं वह हरगिज़ इस ख्याल में न रहें कि ये उनके लिए (कुछ) बेहतर होगा बल्कि ये उनके हक़ में बदतर है क्योंकि जिस (माल) का बुख्ल करते हैं अनक़रीब ही क़यामत के दिन उसका तौक़ बनाकर उनके गले में पहनाया जाएगा और सारे आसमान व ज़मीन की मीरास ख़ुदा ही की है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
181لَّقَدْ سَمِعَ اللَّهُ قَوْلَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ فَقِيرٌ وَنَحْنُ أَغْنِيَاءُ ۘ سَنَكْتُبُ مَا قَالُوا وَقَتْلَهُمُ الْأَنبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ وَنَقُولُ ذُوقُوا عَذَابَ الْحَرِيقِ
जो लोग (यहूद) ये कहते हैं कि ख़ुदा तो कंगाल है और हम बड़े मालदार हैं ख़ुदा ने उनकी ये बकवास सुनी उन लोगों ने जो कुछ किया उसको और उनका पैग़म्बरों को नाहक़ क़त्ल करना हम अभी से लिख लेते हैं और (आज तो जो जी में कहें मगर क़यामत के दिन) हम कहेंगे कि अच्छा तो लो (अपनी शरारत के एवज़ में) जलाने वाले अज़ाब का मज़ा चखो
182ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
ये उन्हीं कामों का बदला है जिनको तुम्हारे हाथों ने (ज़ादे आख़ेरत बना कर) पहले से भेजा है वरना ख़ुदा तो कभी अपने बन्दों पर ज़ुल्म करने वाला नहीं
183الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ عَهِدَ إِلَيْنَا أَلَّا نُؤْمِنَ لِرَسُولٍ حَتَّىٰ يَأْتِيَنَا بِقُرْبَانٍ تَأْكُلُهُ النَّارُ ۗ قُلْ قَدْ جَاءَكُمْ رُسُلٌ مِّن قَبْلِي بِالْبَيِّنَاتِ وَبِالَّذِي قُلْتُمْ فَلِمَ قَتَلْتُمُوهُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
(यह वही लोग हैं) जो कहते हैं कि ख़ुदा ने तो हमसे वायदा किया है कि जब तक कोई रसूल हमें ये (मौजिज़ा) न दिखा दे कि वह कुरबानी करे और उसको (आसमानी) आग आकर चट कर जाए उस वक्त तक हम ईमान न लाएंगें (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (भला) ये तो बताओ बहुतेरे पैग़म्बर मुझसे क़ब्ल तुम्हारे पास वाजे व रौशन मौजिज़ात और जिस चीज़ की तुमने (उस वक्त) फ़रमाइश की है (वह भी) लेकर आए फिर तुम अगर (अपने दावे में) सच्चे तो तुमने क्यों क़त्ल किया
184فَإِن كَذَّبُوكَ فَقَدْ كُذِّبَ رُسُلٌ مِّن قَبْلِكَ جَاءُوا بِالْبَيِّنَاتِ وَالزُّبُرِ وَالْكِتَابِ الْمُنِيرِ
(ऐ रसूल) अगर वह इस पर भी तुम्हें झुठलाएं तो (तुम आज़ुर्दा न हो क्योंकि) तुमसे पहले भी बहुत से पैग़म्बर रौशन मौजिज़े और सहीफे और नूरानी किताब लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर भी लोगों ने आख़िर झुठला ही छोड़ा
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अनुवाद — आल-इमरान 182

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Tuesday, August 18, 2026

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