Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الدِّين: धर्म, आज्ञापालन और दीन का वह नियम जिसे अल्लाह ने अपने बन्दों के लिए निर्धारित किया है।
- الإسلام: अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण, उसकी आज्ञा का पालन और उसकी एकता को स्वीकार करना।
- بَغْيًا: अत्याचार, विद्रोह, ईर्ष्या और सांसारिक लाभ की चाहत।
- سَرِيعُ الْحِسَابِ: शीघ्र हिसाब लेने वाला, अर्थात अल्लाह का हिसाब बहुत जल्दी होगा।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत धर्म के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करती है कि अल्लाह के यहाँ स्वीकार्य धर्म केवल इस्लाम है, जिसका अर्थ है अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण, उसकी आज्ञाओं का पालन और उसकी इबादत में किसी को साझी न बनाना। यही वह धर्म है जिसे अल्लाह ने अपने सभी पैग़म्बरों के माध्यम से भेजा, और अंतिम पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने के बाद केवल उन्हीं का मार्ग स्वीकार्य है।
इसके बाद अल्लाह तआला यहूद और ईसाइयों के मतभेद की ओर संकेत करता है। वे लोग जिन्हें तौरात और इंजील जैसी किताबें दी गईं, उन्होंने अपने धर्म में मतभेद नहीं किया, बल्कि उनके पास स्पष्ट ज्ञान और प्रमाण आने के बाद भी वे आपसी ईर्ष्या, अत्याचार और सांसारिक लाभ की चाहत के कारण अलग-अलग गुटों में बँट गए। उन्होंने सच्चाई को जानते हुए भी उसे छिपाया और अपनी मनमानी की।
अंत में अल्लाह तआला चेतावनी देता है कि जो कोई अल्लाह की आयतों (उसकी निशानियों और उतारी गई किताबों) को नकारेगा या उनका इनकार करेगा, तो अल्लाह उसका हिसाब लेने में बिल्कुल देर नहीं करेगा। वह हर किसी को उसके कर्मों का पूरा बदला देगा।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- धर्म का एकमात्र स्रोत: इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह के यहाँ स्वीकार्य धर्म केवल इस्लाम है, जो सभी पैग़म्बरों की शिक्षाओं का सार है। यह हमें अपने जीवन को अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण करने की प्रेरणा देता है।
- मतभेद का कारण: यह आयत हमें बताती है कि धार्मिक मतभेद अज्ञानता से नहीं, बल्कि ज्ञान आने के बाद ईर्ष्या और सांसारिक लालच से पैदा होते हैं। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें सच्चाई को स्वीकार करने में ईर्ष्या या स्वार्थ को बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
- अल्लाह की शीघ्र न्याय व्यवस्था: यह आयत हमें यह विश्वास दिलाती है कि अल्लाह का न्याय बहुत शीघ्र होगा, इसलिए हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत रहना चाहिए और अल्लाह की आयतों को नकारने से बचना चाहिए।
- एकता की पुकार: यह आयत मुसलमानों को एकजुट रहने और उन कारणों से बचने की शिक्षा देती है जो पिछली उम्मतों में मतभेद का कारण बने — अर्थात ईर्ष्या, अत्याचार और सांसारिक लालच।
- अल्लाह की रहमत की ओर बुलावा: इस्लाम को स्वीकार करना अल्लाह की रहमत और उसके मार्गदर्शन को पाने का सबसे सरल और सीधा रास्ता है, जो हर युग में सभी मनुष्यों के लिए खुला है।
📜 आयत 17-21 — सूरा आल-इमरान
अनुवाद — आल-इमरान 19
सूरा आल-इमरान आयत 19 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अहले किताब ने जो उस दीने हक़ से इख्तेलाफ़…सूरा आयत 19/200 — सूरा आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा आल-इमरान सुनें, सूरा आल-इमरान अनुवाद, सूरा आल-इमरान mp3, सूरा आल-इमरान pdf. आयत 17–21. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा आल-इमरान
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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