आल-इमरान · 19/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ ۗ وَمَا اخْتَلَفَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ إِلَّا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِآيَاتِ اللَّهِ فَإِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ ۝١٩
Innad deena `indal laahil Islaam; wa makhtalafal lazeena ootul Kitaaba illaa mim ba`di maa jaaa`ahumul `ilmu baghyam bainahum; wa mai yakfur bi Aayaatil laahi fa innal laaha saree`ul hisaab
📖 हिंदी अर्थ
और अहले किताब ने जो उस दीने हक़ से इख्तेलाफ़ किया तो महज़ आपस की शरारत और असली (अम्र) मालूम हो जाने के बाद (ही क्या है) और जिस शख्स ने ख़ुदा की निशानियों से इन्कार किया तो (वह समझ ले कि यक़ीनन ख़ुदा (उससे) बहुत जल्दी हिसाब लेने वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الدِّين: धर्म, आज्ञापालन और दीन का वह नियम जिसे अल्लाह ने अपने बन्दों के लिए निर्धारित किया है।
  • الإسلام: अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण, उसकी आज्ञा का पालन और उसकी एकता को स्वीकार करना।
  • بَغْيًا: अत्याचार, विद्रोह, ईर्ष्या और सांसारिक लाभ की चाहत।
  • سَرِيعُ الْحِسَابِ: शीघ्र हिसाब लेने वाला, अर्थात अल्लाह का हिसाब बहुत जल्दी होगा।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत धर्म के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करती है कि अल्लाह के यहाँ स्वीकार्य धर्म केवल इस्लाम है, जिसका अर्थ है अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण, उसकी आज्ञाओं का पालन और उसकी इबादत में किसी को साझी न बनाना। यही वह धर्म है जिसे अल्लाह ने अपने सभी पैग़म्बरों के माध्यम से भेजा, और अंतिम पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने के बाद केवल उन्हीं का मार्ग स्वीकार्य है।

इसके बाद अल्लाह तआला यहूद और ईसाइयों के मतभेद की ओर संकेत करता है। वे लोग जिन्हें तौरात और इंजील जैसी किताबें दी गईं, उन्होंने अपने धर्म में मतभेद नहीं किया, बल्कि उनके पास स्पष्ट ज्ञान और प्रमाण आने के बाद भी वे आपसी ईर्ष्या, अत्याचार और सांसारिक लाभ की चाहत के कारण अलग-अलग गुटों में बँट गए। उन्होंने सच्चाई को जानते हुए भी उसे छिपाया और अपनी मनमानी की।

अंत में अल्लाह तआला चेतावनी देता है कि जो कोई अल्लाह की आयतों (उसकी निशानियों और उतारी गई किताबों) को नकारेगा या उनका इनकार करेगा, तो अल्लाह उसका हिसाब लेने में बिल्कुल देर नहीं करेगा। वह हर किसी को उसके कर्मों का पूरा बदला देगा।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. धर्म का एकमात्र स्रोत: इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह के यहाँ स्वीकार्य धर्म केवल इस्लाम है, जो सभी पैग़म्बरों की शिक्षाओं का सार है। यह हमें अपने जीवन को अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण करने की प्रेरणा देता है।
  2. मतभेद का कारण: यह आयत हमें बताती है कि धार्मिक मतभेद अज्ञानता से नहीं, बल्कि ज्ञान आने के बाद ईर्ष्या और सांसारिक लालच से पैदा होते हैं। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें सच्चाई को स्वीकार करने में ईर्ष्या या स्वार्थ को बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
  3. अल्लाह की शीघ्र न्याय व्यवस्था: यह आयत हमें यह विश्वास दिलाती है कि अल्लाह का न्याय बहुत शीघ्र होगा, इसलिए हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत रहना चाहिए और अल्लाह की आयतों को नकारने से बचना चाहिए।
  4. एकता की पुकार: यह आयत मुसलमानों को एकजुट रहने और उन कारणों से बचने की शिक्षा देती है जो पिछली उम्मतों में मतभेद का कारण बने — अर्थात ईर्ष्या, अत्याचार और सांसारिक लालच।
  5. अल्लाह की रहमत की ओर बुलावा: इस्लाम को स्वीकार करना अल्लाह की रहमत और उसके मार्गदर्शन को पाने का सबसे सरल और सीधा रास्ता है, जो हर युग में सभी मनुष्यों के लिए खुला है।
🎧 सुनें

📜 आयत 17-21 — आल-इमरान

17الصَّابِرِينَ وَالصَّادِقِينَ وَالْقَانِتِينَ وَالْمُنفِقِينَ وَالْمُسْتَغْفِرِينَ بِالْأَسْحَارِ
(यही लोग हैं) सब्र करने वाले और सच बोलने वाले और (ख़ुदा के) फ़रमाबरदार और (ख़ुदा की राह में) ख़र्च करने वाले और पिछली रातों में (ख़ुदा से तौबा) इस्तग़फ़ार करने वाले
18شَهِدَ اللَّهُ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ وَالْمَلَائِكَةُ وَأُولُو الْعِلْمِ قَائِمًا بِالْقِسْطِ ۚ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
ज़रूर ख़ुदा और फ़रिश्तों और इल्म वालों ने गवाही दी है कि उसके सिवा कोई माबूद क़ाबिले परसतिश नहीं है और वह ख़ुदा अद्ल व इन्साफ़ के साथ (कारख़ानाए आलम का) सॅभालने वाला है उसके सिवा कोई माबूद नहीं (वही हर चीज़ पर) ग़ालिब और दाना है (सच्चा) दीन तो ख़ुदा के नज़दीक यक़ीनन (बस यही) इस्लाम है
19إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ ۗ وَمَا اخْتَلَفَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ إِلَّا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِآيَاتِ اللَّهِ فَإِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ
और अहले किताब ने जो उस दीने हक़ से इख्तेलाफ़ किया तो महज़ आपस की शरारत और असली (अम्र) मालूम हो जाने के बाद (ही क्या है) और जिस शख्स ने ख़ुदा की निशानियों से इन्कार किया तो (वह समझ ले कि यक़ीनन ख़ुदा (उससे) बहुत जल्दी हिसाब लेने वाला है
20فَإِنْ حَاجُّوكَ فَقُلْ أَسْلَمْتُ وَجْهِيَ لِلَّهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِ ۗ وَقُل لِّلَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَالْأُمِّيِّينَ أَأَسْلَمْتُمْ ۚ فَإِنْ أَسْلَمُوا فَقَدِ اهْتَدَوا ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ ۗ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِالْعِبَادِ
(ऐ रसूल) पस अगर ये लोग तुमसे (ख्वाह मा ख्वाह) हुज्जत करे तो कह दो मैंने ख़ुदा के आगे अपना सरे तस्लीम ख़म कर दिया है और जो मेरे ताबे है (उन्होंने) भी) और ऐ रसूल तुम अहले किताब और जाहिलों से पूंछो कि क्या तुम भी इस्लाम लाए हो (या नही) पस अगर इस्लाम लाए हैं तो बेख़टके राहे रास्त पर आ गए और अगर मुंह फेरे तो (ऐ रसूल) तुम पर सिर्फ़ पैग़ाम (इस्लाम) पहुंचा देना फ़र्ज़ है (बस) और ख़ुदा (अपने बन्दों) को देख रहा है
21إِنَّ الَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ حَقٍّ وَيَقْتُلُونَ الَّذِينَ يَأْمُرُونَ بِالْقِسْطِ مِنَ النَّاسِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
बेशक जो लोग ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते हैं और नाहक़ पैग़म्बरों को क़त्ल करते हैं और उन लोगों को (भी) क़त्ल करते हैं जो (उन्हें) इन्साफ़ करने का हुक्म करते हैं तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो
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अनुवाद — आल-इमरान 19

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Tuesday, August 18, 2026

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