आल-इमरान · 68/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَٰذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آمَنُوا ۗ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ ۝٦٨
Innaa awlan naasi bi Ibraaheema lallazeenat taba `oohu wa haazan nabiyyu wallazeena aamanoo; wallaahu waliyyul mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
इबराहीम से ज्यादा ख़ुसूसियत तो उन लोगों को थी जो ख़ास उनकी पैरवी करते थे और उस पैग़म्बर और ईमानदारों को (भी) है और मोमिनीन का ख़ुदा मालिक है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَوْلَى: सबसे अधिक निकट, सबसे अधिक हक़दार।
  • بِإِبْرَاهِيمَ: इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से संबंध रखने का।
  • اتَّبَعُوهُ: उनका अनुसरण किया, उनके मार्ग पर चले।
  • وَلِيُّ: सहायक, संरक्षक, मित्र।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के दावे का खंडन करती है जो यहूदियों और ईसाइयों में से दावा करते थे कि वे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबसे निकट हैं। अल्लाह तआला स्पष्ट करते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से सच्चा संबंध और निकटता उन लोगों को है जिन्होंने उनके मार्ग का अनुसरण किया, उनके लाए हुए दीन (एकेश्वरवाद) पर चले। फिर इस नबी (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का ज़िक्र किया गया, क्योंकि वे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की शिक्षाओं के सबसे सच्चे उत्तराधिकारी हैं, और उनके साथ वे सभी मोमिनीन (ईमानवाले) हैं जिन्होंने उन पर ईमान लाया और उनका अनुसरण किया। यही लोग इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के असली वारिस हैं, चाहे वे किसी भी जाति या क्षेत्र से हों। अंत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि अल्लाह मोमिनीन का वली (संरक्षक और सहायक) है, यानी वह उनकी मदद करता है, उन्हें संरक्षण देता है और उन्हें सफलता प्रदान करता है।

लाभ एवं शिक्षाएँ:

  1. किसी भी नबी या महान व्यक्ति से सच्चा संबंध केवल वंश या दावे से नहीं, बल्कि उनके मार्ग पर चलने और उनकी शिक्षाओं का पालन करने से स्थापित होता है।
  2. यह आयत मुसलमानों को यह विशेष गौरव प्रदान करती है कि वे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की सच्ची परंपरा के वारिस हैं, बशर्ते वे ईमान और अमल में सच्चे हों।
  3. अल्लाह तआला का मोमिनीन का वली होना एक बड़ी खुशखबरी है — जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसके आदेशों का पालन करे, अल्लाह उसका संरक्षक, सहायक और मित्र बन जाता है, और यही सबसे बड़ी सफलता है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि नस्ल, रंग, भाषा या देश के आधार पर श्रेष्ठता नहीं है, बल्कि असली श्रेष्ठता ईमान और अच्छे कर्मों में है।


📜 आयत 66-70 — आल-इमरान

66هَا أَنتُمْ هَٰؤُلَاءِ حَاجَجْتُمْ فِيمَا لَكُم بِهِ عِلْمٌ فَلِمَ تُحَاجُّونَ فِيمَا لَيْسَ لَكُم بِهِ عِلْمٌ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते? (ऐ लो अरे) तुम वही एहमक़ लोग हो कि जिस का तुम्हें कुछ इल्म था उसमें तो झगड़ा कर चुके (खैर) फिर तब उसमें क्या (ख्वाह मा ख्वाह) झगड़ने बैठे हो जिसकी (सिरे से) तुम्हें कुछ ख़बर नहीं और (हकॣक़ते हाल तो) खुदा जानता है और तुम नहीं जानते
67مَا كَانَ إِبْرَاهِيمُ يَهُودِيًّا وَلَا نَصْرَانِيًّا وَلَٰكِن كَانَ حَنِيفًا مُّسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
इबराहीम न तो यहूदी थे और न नसरानी बल्कि निरे खरे हक़ पर थे (और) फ़रमाबरदार (बन्दे) थे और मुशरिकों से भी न थे
68إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَٰذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آمَنُوا ۗ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ
इबराहीम से ज्यादा ख़ुसूसियत तो उन लोगों को थी जो ख़ास उनकी पैरवी करते थे और उस पैग़म्बर और ईमानदारों को (भी) है और मोमिनीन का ख़ुदा मालिक है
69وَدَّت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
(मुसलमानो) अहले किताब से एक गिरोह ने बहुत चाहा कि किसी तरह तुमको राहेरास्त से भटका दे हालॉकि वह (अपनी तदबीरों से तुमको तो नहीं मगर) अपने ही को भटकाते हैं
70يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और उसको समझते (भी) नहीं ऐ अहले किताब तुम ख़ुदा की आयतों से क्यों इन्कार करते हो, हालॉकि तुम ख़ुद गवाह बन सकते हो
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अनुवाद — आल-इमरान 68

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Tuesday, August 18, 2026

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