بِإِبْرَاهِيمَ: इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से संबंध रखने का।
اتَّبَعُوهُ: उनका अनुसरण किया, उनके मार्ग पर चले।
وَلِيُّ: सहायक, संरक्षक, मित्र।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के दावे का खंडन करती है जो यहूदियों और ईसाइयों में से दावा करते थे कि वे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबसे निकट हैं। अल्लाह तआला स्पष्ट करते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से सच्चा संबंध और निकटता उन लोगों को है जिन्होंने उनके मार्ग का अनुसरण किया, उनके लाए हुए दीन (एकेश्वरवाद) पर चले। फिर इस नबी (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का ज़िक्र किया गया, क्योंकि वे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की शिक्षाओं के सबसे सच्चे उत्तराधिकारी हैं, और उनके साथ वे सभी मोमिनीन (ईमानवाले) हैं जिन्होंने उन पर ईमान लाया और उनका अनुसरण किया। यही लोग इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के असली वारिस हैं, चाहे वे किसी भी जाति या क्षेत्र से हों। अंत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि अल्लाह मोमिनीन का वली (संरक्षक और सहायक) है, यानी वह उनकी मदद करता है, उन्हें संरक्षण देता है और उन्हें सफलता प्रदान करता है।
लाभ एवं शिक्षाएँ:
किसी भी नबी या महान व्यक्ति से सच्चा संबंध केवल वंश या दावे से नहीं, बल्कि उनके मार्ग पर चलने और उनकी शिक्षाओं का पालन करने से स्थापित होता है।
यह आयत मुसलमानों को यह विशेष गौरव प्रदान करती है कि वे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की सच्ची परंपरा के वारिस हैं, बशर्ते वे ईमान और अमल में सच्चे हों।
अल्लाह तआला का मोमिनीन का वली होना एक बड़ी खुशखबरी है — जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसके आदेशों का पालन करे, अल्लाह उसका संरक्षक, सहायक और मित्र बन जाता है, और यही सबसे बड़ी सफलता है।
यह आयत हमें सिखाती है कि नस्ल, रंग, भाषा या देश के आधार पर श्रेष्ठता नहीं है, बल्कि असली श्रेष्ठता ईमान और अच्छे कर्मों में है।
तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते? (ऐ लो अरे) तुम वही एहमक़ लोग हो कि जिस का तुम्हें कुछ इल्म था उसमें तो झगड़ा कर चुके (खैर) फिर तब उसमें क्या (ख्वाह मा ख्वाह) झगड़ने बैठे हो जिसकी (सिरे से) तुम्हें कुछ ख़बर नहीं और (हकॣक़ते हाल तो) खुदा जानता है और तुम नहीं जानते
(मुसलमानो) अहले किताब से एक गिरोह ने बहुत चाहा कि किसी तरह तुमको राहेरास्त से भटका दे हालॉकि वह (अपनी तदबीरों से तुमको तो नहीं मगर) अपने ही को भटकाते हैं
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