आल-इमरान · 69/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَدَّت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ ۝٦٩
Waddat taaa`ifatum min Ahlil Kitaabi law yudil loonakum wa maa yudilloona illaaa anfusahum wa maa yash`uroon
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानो) अहले किताब से एक गिरोह ने बहुत चाहा कि किसी तरह तुमको राहेरास्त से भटका दे हालॉकि वह (अपनी तदबीरों से तुमको तो नहीं मगर) अपने ही को भटकाते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَدَّتْ: उसने इच्छा की, चाहा।
  • طَائِفَةٌ: एक समूह, एक गिरोह।
  • لَوْ يُضِلُّونَكُمْ: काश वे तुम्हें पथभ्रष्ट कर देते।
  • يَشْعُرُونَ: वे जानते हैं, महसूस करते हैं।

व्याख्या:

अहले-किताब (यहूदी और ईसाई) में से एक गिरोह ने दिल से यह तमन्ना की कि काश वे तुम मुसलमानों को तुम्हारे धर्म से भटका सकें और तुम्हें सत्य के मार्ग से हटा सकें। वे अपनी इस कोशिश में लगे रहे, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि उनका यह प्रयास वास्तव में उनके अपने नुकसान का कारण बन रहा है। वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह उन्हें और उनके साथियों को ही गुमराही में डाल रहा है, क्योंकि सत्य को झुठलाने और दूसरों को सत्य से रोकने की साजिश करने वाला स्वयं सबसे बड़ा पथभ्रष्ट होता है। उन्हें अपने इस कुकर्म की वास्तविकता और उसके बुरे परिणाम का ज़रा भी एहसास नहीं है। वे यह नहीं जानते कि उनकी यह चाल उल्टी पड़ेगी और उन्हीं को नुकसान उठाना पड़ेगा।

लाभ और शिक्षाएँ:

  1. यह आयत मुसलमानों को सतर्क करती है कि दुश्मनों की साजिशों से घबराएँ नहीं, क्योंकि उनकी साजिशें अंततः उन्हीं पर भारी पड़ती हैं।
  2. सच्चे मोमिन को अपने धर्म पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि अल्लाह अपने बंदों की हिफ़ाज़त करता है और उन्हें गुमराह होने से बचाता है।
  3. यह हमें सिखाती है कि बुराई की कोशिश करने वाला व्यक्ति सबसे पहले खुद को नुकसान पहुँचाता है, भले ही उसे इसका एहसास न हो।
  4. इस आयत में मुसलमानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है कि अल्लाह उन्हें दुश्मनों के मक्र (चाल) से बचाए रखता है, और यह इस्लाम की सच्चाई और सुरक्षा का प्रमाण है।
  5. यह हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने दुश्मनों की चालों से सावधान रहना चाहिए, लेकिन साथ ही अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वही सबसे अच्छा रक्षक है।
🎧 सुनें

📜 आयत 67-71 — आल-इमरान

67مَا كَانَ إِبْرَاهِيمُ يَهُودِيًّا وَلَا نَصْرَانِيًّا وَلَٰكِن كَانَ حَنِيفًا مُّسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
इबराहीम न तो यहूदी थे और न नसरानी बल्कि निरे खरे हक़ पर थे (और) फ़रमाबरदार (बन्दे) थे और मुशरिकों से भी न थे
68إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَٰذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آمَنُوا ۗ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ
इबराहीम से ज्यादा ख़ुसूसियत तो उन लोगों को थी जो ख़ास उनकी पैरवी करते थे और उस पैग़म्बर और ईमानदारों को (भी) है और मोमिनीन का ख़ुदा मालिक है
69وَدَّت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
(मुसलमानो) अहले किताब से एक गिरोह ने बहुत चाहा कि किसी तरह तुमको राहेरास्त से भटका दे हालॉकि वह (अपनी तदबीरों से तुमको तो नहीं मगर) अपने ही को भटकाते हैं
70يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और उसको समझते (भी) नहीं ऐ अहले किताब तुम ख़ुदा की आयतों से क्यों इन्कार करते हो, हालॉकि तुम ख़ुद गवाह बन सकते हो
71يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ अहले किताब तुम क्यो हक़ व बातिल को गड़बड़ करते और हक़ को छुपाते हो हालॉकि तुम जानते हो
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अनुवाद — आल-इमरान 69

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Tuesday, August 18, 2026

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