आल-इमरान · 76/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
بَلَىٰ مَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِ وَاتَّقَىٰ فَإِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ ۝٧٦
Balaa man awfaa bi`ahdihee wattaqaa fainnal laaha yuhibbul muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
हाँ (अलबत्ता) जो शख्स अपने एहद को पूरा करे और परहेज़गारी इख्तेयार करे तो बेशक ख़ुदा परहेज़गारों को दोस्त रखता है
📜

अनुवाद — Tafsir

بَلَىٰ مَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِ وَاتَّقَىٰ فَإِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ

शब्दों के अर्थ:

  • بَلَىٰ: हाँ, अवश्य (यहाँ इसका अर्थ है कि जैसा उन्होंने सोचा था वैसा नहीं है, बल्कि उन पर दोष और पकड़ है)
  • أَوْفَىٰ: पूरा करे, निभाए
  • بِعَهْدِهِ: अपने वचन को, अपने अहद को
  • وَاتَّقَىٰ: और अल्लाह से डरे, तक़वा अपनाए
  • يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ: मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) से प्रेम करता है

विस्तृत तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों के झूठे दावों का खंडन कर रहे हैं जो कहते थे कि अनपढ़ (उम्मी) लोगों के मामले में हम पर कोई पकड़ नहीं है। अल्लाह फ़रमाता है: हाँ, अवश्य उन पर पकड़ है और उनके लिए दोष है। लेकिन असली बात यह है कि जो व्यक्ति अपने वचन को पूरा करे — चाहे वह वचन अल्लाह से हो या लोगों से — और अल्लाह से डरता हुआ उसकी आज्ञाओं का पालन करे और उसकी मनाही से बचे, तो अल्लाह ऐसे ही मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) से प्रेम करता है।

इस आयत में अल्लाह तआला हमें सिखा रहे हैं कि ईमान का दावा करना ही काफी नहीं है, बल्कि ईमान की असली पहचान यह है कि इंसान अपने अहद (वचन) को पूरा करे। अल्लाह से हमारा अहद है कि हम उस पर ईमान लाएं, उसके रसूलों पर ईमान लाएं, और उसके दीन (धर्म) का पालन करें। लोगों से हमारा अहद है कि हम अमानत (धरोहर) को अदा करें, वादों को निभाएं और किसी को धोखा न दें।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की मुहब्बत (प्रेम) पाने का सबसे बड़ा ज़रिया तक़वा है। तक़वा यानी अल्लाह का डर जो इंसान को हर बुराई से रोके और हर अच्छाई की तरफ ले जाए। जब इंसान अपने वचनों को पूरा करता है और अल्लाह से डरता है, तो वह अल्लाह का प्यारा बन जाता है।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें एक बहुत बड़ी खुशखबरी देती है। अल्लाह तआला ने यह नहीं कहा कि मैं केवल नबियों और औलिया से प्रेम करता हूं, बल्कि फ़रमाया: "अल्लाह मुत्तक़ियों से प्रेम करता है" — यानी जो कोई भी तक़वा अपनाए, चाहे वह किसी भी जाति, रंग या देश का हो, वह अल्लाह का महबूब (प्यारा) बन सकता है। यह कितनी बड़ी रहमत है!

तो आइए, हम अपने जीवन में इस आयत पर अमल करें — अपने अल्लाह से किए गए वचनों को पूरा करें, अपने वादों को निभाएं, अमानतों को अदा करें, और हर हाल में अल्लाह से डरते हुए उसकी रज़ा (प्रसन्नता) के लिए काम करें। यही रास्ता हमें अल्लाह की मुहब्बत तक पहुंचाएगा, और यही सबसे बड़ी कामयाबी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 74-78 — आल-इमरान

74يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ
जिसको चाहे अपनी रहमत के लिये ख़ास कर लेता है और ख़ुदा बड़ा फ़ज़लों करम वाला हे
75۞ وَمِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ إِن تَأْمَنْهُ بِقِنطَارٍ يُؤَدِّهِ إِلَيْكَ وَمِنْهُم مَّنْ إِن تَأْمَنْهُ بِدِينَارٍ لَّا يُؤَدِّهِ إِلَيْكَ إِلَّا مَا دُمْتَ عَلَيْهِ قَائِمًا ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا لَيْسَ عَلَيْنَا فِي الْأُمِّيِّينَ سَبِيلٌ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और अहले किताब कुछ ऐसे भी हैं कि अगर उनके पास रूपए की ढेर अमानत रख दो तो भी उसे (जब चाहो) वैसे ही तुम्हारे हवाले कर देंगे और बाज़ ऐसे हें कि अगर एक अशर्फ़ी भी अमानत रखो तो जब तक तुम बराबर (उनके सर) पर खड़े न रहोगे तुम्हें वापस न देंगे ये (बदमुआम लगी) इस वजह से है कि उन का तो ये क़ौल है कि (अरब के) जाहिलो (का हक़ मार लेने) में हम पर कोई इल्ज़ाम की राह ही नहीं और जान बूझ कर खुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
76بَلَىٰ مَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِ وَاتَّقَىٰ فَإِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ
हाँ (अलबत्ता) जो शख्स अपने एहद को पूरा करे और परहेज़गारी इख्तेयार करे तो बेशक ख़ुदा परहेज़गारों को दोस्त रखता है
77إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا أُولَٰئِكَ لَا خَلَاقَ لَهُمْ فِي الْآخِرَةِ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ وَلَا يَنظُرُ إِلَيْهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
बेशक जो लोग अपने एहद और (क़समे) जो ख़ुदा (से किया था उसके) बदले थोड़ा (दुनयावी) मुआवेज़ा ले लेते हैं उन ही लोगों के वास्ते आख़िरत में कुछ हिस्सा नहीं और क़यामत के दिन ख़ुदा उनसे बात तक तो करेगा नहीं ओर उनकी तरफ़ नज़र (रहमत) ही करेगा और न उनको (गुनाहों की गन्दगी से) पाक करेगा और उनके लिये दर्दनाम अज़ाब है
78وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُم بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और अहले किताब से बाज़ ऐसे ज़रूर हैं कि किताब (तौरेत) में अपनी ज़बाने मरोड़ मरोड़ के (कुछ का कुछ) पढ़ जाते हैं ताकि तुम ये समझो कि ये किताब का जुज़ है हालॉकि वह किताब का जुज़ नहीं और कहते हैं कि ये (जो हम पढ़ते हैं) ख़ुदा के यहॉ से (उतरा) है हालॉकि वह ख़ुदा के यहॉ से नहीं (उतरा) और जानबूझ कर ख़ुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
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अनुवाद — आल-इमरान 76

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Tuesday, August 18, 2026

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